in , ,

केबीसी में काम कर चुकी प्रियंवदा सिंह अब 143 वर्ष पुराने किले में अकेले रहती है; जानिए क्यों!

मेजा राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में लगभग 10,000 लोगों की आबादी वाला एक छोटा सा गांव है। पुरुष आमतौर पर खेती करते हैं या भीलवाड़ा के पास शहर के कपड़ा कारखानों में मजदूरों के रूप में काम करते हैं। महिलाएं घर के काम में व्यस्त रहती हैं।

इस गांव से ताल्लुक रखने वाली प्रियंवदा सिंह मुंबई में धारावाहिकों के लिए फ्रीलांसर के रूप में काम करती थी। वे अक्सर छुट्टियों के दौरान ही बहुत कम समय के लिए मेजा अपने परिवार से मिलने जाती थीं।

एक बार ऐसे ही छुट्टियों में वे अपने गांव गयीं थी। लेकिन इस बार उन्हें एक बहाना मिला मुंबई वापिस न जाने का और उन्होंने अपनी नौकरी भी छोड़ दी। वजह थी उनका पैतृक किला।

साल 1870 में प्रियंवदा के पूर्वज रावत अमर सिंह को जागीरदारी प्रणाली के अंतर्गत यह जमीन मिली। जल्द ही इस जमीन पर निर्माण शुरू हो गया और पांच साल में यह किला बनकर पूरा हुआ। यह किला प्रियम्वदा के परिवार की संपत्ति है। इसके वर्तमान संरक्षक उनके पिता रावत जितेंद्र सिंह हैं।

हालाँकि यह किला सालों तक नजरअंदाज पड़ा रहा।

“मेरे दादाजी इंडियन रेलवे में काम करते थे और मेरे पिता राज्य सरकार में अधिकारी हैं। उनके काम के चलते वे गांव से बाहर ही रहे। जिस वजह से किले पर कोई ध्यान नही गया। इसके चलते हमने बहुत परेशानियां झेली। लोगों का गैराधिकारिक कब्ज़ा, इसे कूड़ा फेंकने के लिए इस्तेमाल करना आदि,” प्रियंवदा ने द बेटर इंडिया को बताया।

उन्होंने कहा कि किले को दीवारों में पौधे उगने लगे थे और छत में भी बहुत सीलन आ गयी थी। यहां पर केवल उल्लू और चमगादड़ों का ही वास था। और सिर्फ दो ही कमरों में बिजली थी।

तो प्रियंवदा ने निश्चय किया कि वे अपने इस पैतृक किले को सुधरवा कर इसे फिर से वही भव्य रूप देंगी।

जिसके लिए उन्होंने सबसे पहले अपना सामान पैक कर यहां रहने का निर्णय किया।

उन्होंने बताया कि यह किला ही मेजा में मेरा एकमात्र घर था तो मुझे यहीं रहना था। मेरे पिताजी उदयपुर में नियुक्त हैं और दादी-दादा अजमेर में रहते हैं। अजमेर मेजा से 2.5 किलोमीटर दूर है।इसलिए मेरे लिए मुमकिन नही था कि मैं कहीं और रहकर यह काम कर पाती।

शुरुआत में उनके पिता उन्हें अकेले भेजने से कतरा रहे थे। यहां तक कि गांववालों को लगा कि वह पागल हो गयी है। लेकिन जैसे जैसे प्रियंवदा ने अपना प्रोजेक्ट शुरू किया तो चीज़े बदलने लगी।

“मैं एक पुराने किले की मरम्मत करवाना चाहती थी। इसलिए मैंने पुराने मिस्त्रियों को इसमें शामिल करने की सोची। क्योंकि उन्हें पुरानी तकनीक जैसे चुना आदि के साथ काम करने का ज्ञान था। मैं युवा और बुजुर्ग मिस्रियों को साथ लायी ताकि पुरानी निर्माण कला आने वाली पीढ़ी सीख सके। किले के काम के लिए हमने उन्हें पैसे दिए। लेकिन जल्द ही उन्हें और भी पुरानी जगहों की मरम्मत का काम मिलने लगा,” प्रियंवदा ने कहा।

उनकी मदद से, पिछले कुछ सालों में जिन लोगों को काम नहीं मिल रहा था और वे पूरी तरह से अपने परिवारों पर निर्भर थे, उन्हें फिर से कमाई करने का मौका मिला।

45 वर्षीय शिव जी भाटी ने बताया, “एक दुर्घटना में आँखों की रोशनी जाने से में बेरोजगार हो गया था। इस फोर्ट प्रोजेक्ट के आने से पहले तक मेरे लिए अपनी पत्नी व तीन बच्चों को पलना बहुत मुश्किल हो गया था। इस प्रोजेक्ट मैं वह सब काम करता जो बिना आँखों के भी किया जा सकता है। जैसे दीवार से पुराना प्लास्टर खरोंचना, पौधे लगाने के लिए गड्ढे खोदना, पुराने दरवाजों को सैंड पेपर से घिसना और लोहे के जाल से सीमेंट को छानना आदि।”

इस प्रोजेक्ट को बढ़ते देख गांव की महिलाएं भी काम करने आगे आयीं। घरों के अलावा कहीं और काम करने की अपनी क्षमता को उन्होंने पहचाना।

34 वर्षीय माया देवी ने बताया कि बहुत कम उम्र में विधवा होने के बाद अपनी बेटी की परवरिश के लिए मैं अपने ससुराल वालों पर निर्भर थी। लेकिन अब यहां काम करके मैं बहुत कुछ कमा लेती हूँ। और लगभग एक दशक कद बाद अब लोग मुझे चंदू की बहू की जगह मेरे नाम से बुलाते हैं।

मरम्मत का काम शुरू होने के बाद और भी बहुत सारी चीजें होती चली गईं।

एक बार जब प्रियंवदा किले की सफाई कर रहीं थी तो उन्हें इतिहास, हिंदी साहित्य, यात्रा आदि पर पुरानी किताबें मिली। उन्होंने एक सामुदायिक लाइब्रेरी खोलने का फैसला किया।

जल्द ही उन्हें दोस्त, परिवार और सहकर्मियों से नयी व पुरानी किताबें मिलने लगी। अब वे एक पूर्ण सामुदायिक लाइब्रेरी खोलने की राह पर हैं।

प्रियंवदा ने रक्त दान व योग के लिये भी कैंप लगवाना शुरू किया। इसके साथ ही किले में स्थानीय त्यौहार जैसे गणगौर और जल झुलनी एकादशी मनाना शुरू किया। युवायों को साथ लाने के लिए प्रतियोगिताएं रखी गयीं।

उन्होंने बताया कि इन सभी सामुदायिक कार्यों को स्थानीय लोगों को मदद से किया जा रहा है। अब लोग भी इन सभी गतिविधियों को पहचानने लगे हैं और मदद कर रहे हैं। रक्त दान कैंप के लिए भी गांववालों ने ही भीलवाड़ा स्थित एनजीओ से संपर्क भी गांववालों ने किया। साथ ही वहां के अस्पताल से कुछ नर्स व डॉक्टर भी बुलाये गये। गांववालों ने भी भारी मात्रा में रक्तदान किया और इस कैंप को सफल बनाया।

किले का निर्माण कार्य भी धीरे धीरे खत्म होने की कगार पर है।

अब छत में सीलन की समस्या सुलझ चुकी है। साथ ही कुछ असली कलाकृतियों को सहेजा जा रहा है। अब वे एक सामुदायिक रसोई गार्डन शुरू करने की सोच रही हैं।

साथ ही प्रियंवदा मीडिया में अपने अनुभव को मेजा गांव को एक सांस्कृतिक केंद्र बनाने में इस्तेमाल करन चाहती हैं। हम उम्मीद करते हैं कि वे अपने कार्य में सफल रहें।

मूल लेख: दीपिका भरद्वाज


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ बांटना चाहते हो तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखे, या Facebook और Twitter पर संपर्क करे।

शेयर करे

Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

भारत के महान अर्थशास्त्री आचार्य चाणक्य से जुड़ी 10 अद्भुत बातें!

हुल्लड़ मुरादाबादी : क्या बताएँ आपसे… मसख़रा मशहूर है, आंसू बहाने के लिए!