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Abala Bose

लेडी बोस: जानिए उस हस्ती के बारे में, जिनके प्रयासों से मिला महिलाओं को वोट का अधिकार!

अबला बोस, रेडियो साइंस के पितामह जगदीश चंद्र बोस की जीवन संगिनी थीं। उन्होंने देश की महिलाओं को सामाजिक कुरीतियों से मुक्त कर, एक सम्मानित जीवन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारत में 19वीं सदी के मध्य में राष्ट्रवाद के उदय ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की रूप-रेखा तैयार करने के साथ ही, कई सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थाओं के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण को भी अपनाने में मदद की।

उस वक्त भारतीय समाज में सती प्रथा, विधवाओं का बहिष्कार, बाल विवाह जैसी कई कुप्रथाएं थी और इसे रोकने में बंगाली कवि, शिक्षाविद, और सामाजिक कार्यकर्ता कामिनी राय ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। 

लेकिन, क्या आपको पता है कि यह वास्तव में उनकी सहपाठी अबला बोस थीं, जिन्होंने कामिनी को महिलाओं की स्थिति सुधारने की दिशा में प्रयास करने के लिए प्रेरित किया।

कौन थीं अबला बोस

अबला का जन्म 8 अगस्त 1865 को बरिसल में हुआ था। उनके पिता दुर्गामोहन दास ब्रह्म समाज के एक बड़े नेता थे। जबकि उनकी माँ, ब्रह्ममयी, विधवाओं के उत्थान की दिशा में काम करती थीं। लेकिन, अबला जब सिर्फ 10 वर्ष की थीं, तो उनकी माँ चल बसीं।

अबला पर अपनी माँ का गहरा असर था और वह शुरू से एक ऐसे माहौल में पली-बढ़ीं जहाँ महिलाओं की शिक्षा को विशेष प्राथमिकता दी जाती थी।

Abala Bose
Abala and Jagadish Chandra Bose at the Bose Institute.

अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद, अबला ने बेथ्यून कॉलेज में दाखिला ले लिया। इसके बाद वह मेडिसीन की पढ़ाई के लिए मद्रास विश्वविद्यालय चली गईं।

यहाँ वह अपनी अंतिम परीक्षा में शामिल हुईं, लेकिन सेहत बिगड़ने के कारण नतीजे घोषित होने के पहले उन्हें घर लौटना पड़ा। इस कारण परीक्षा पास करने के बाद भी उन्हें इसकी जानकारी नहीं हुई।

इसके बाद, 23 साल की उम्र में, उनकी शादी जगदीश चंद्र बोस से हुई, जिन्हें रेडियो साइंस के पितामह के रूप में जाना जाता है। साल 1916 में उन्हें नाइटहुड की उपाधि मिली और इसके बाद उन्हें लेडी बोस के नाम से जाना जाने लगा। उन्हें अपने पति के सफलता का प्रेरणास्त्रोत माना गया। लेकिन, भारतीय समाज में उनकी भूमिका इससे कहीं अधिक है।

शैक्षिक सुधार

अपने शोध कार्यों के सिलसिले में सर जे सी बोस को कई दूसरे देशों की यात्राएं करनी पड़ती थी। कई यात्राओं में अबला भी उनके साथ होती थीं। इस दौरान उन्होंने देखना शुरू किया कि विभिन्न समाजों में महिलाएं कैसे रहती हैं।

इसके बाद, यूरोप की एक विशेष यात्रा से लौटने के बाद, अबला ने देश में महिलाओं की स्थिति में सुधार का जिम्मा अपने कंधे पर उठाया। इसी कड़ी में वह 1910 में, ब्रह्मो बालिका शिक्षालय की सचिव बनीं और अगले 26 वर्षों तक उन्होंने इस जिम्मेदारी को निभाया।

Abala Bose
Sister Nivedita, Sister Christine, Charlotte Sevier and Lady Abala Bose in Mayavati (Photo: Wiki)

इतना ही नहीं, उन्होंने भारत में मोंटेसरी स्कूल सिस्टम को भी विकसित किया और ब्रह्म गर्ल्स स्कूल की शुरुआत की। ठीक इसी साल उन्होंने जगदीश चंद्र बोस और देशबंधु चितरंजन दास के सहयोग से नारी शिक्षा समिति की स्थापना की। इसमें उन्हें गुरूदेव टैगौर, भगिनी निवेदिता और विद्यासागर से भी पर्याप्त सहयोग मिला। इन प्रयासों के तहत उनका उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से समाज में महिलाओं की दशा को सुधारना था।

अबला ने अपने पूरे जीवन में कुल 88 प्राथमिक विद्यालय और 14 वयस्क शिक्षा केंद्र स्थापित किए। इसमें मुरलीधर गर्ल्स कॉलेज और बेल्टोला गर्ल्स स्कूल भी शामिल हैं, जिसे उन्होंने कृष्णप्रसाद बसक के साथ मिलकर शुरू किया था।

अबला और जेसी बोस स्वामी विवेकानंद और सिस्टर निवेदिता से काफी करीब थे। कहा जाता है कि डॉ. बोस जब ब्रिटिश सरकार की उदासीनता के कारण अपने शोध कार्यों को जारी रख पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे, तो सिस्टर निवेदिता ने उनकी आर्थिक मदद की।

इतना ही नहीं, उनकी मदद से अबला शिक्षकों को किंडरगार्टन स्तर तक प्रशिक्षित करने में समर्थ थीं और दोनों ने मिलकर लड़कियों को आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षित किया। जिससे वे बिना किसी डर के अपने घरों से बाहर निकल सकती थीं।

इसके बाद, 1925 में, उन्होंने विद्यासागर बानी भवन प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान की। जिसके तहत विधवाओं को टीचर ट्रेनिंग देने के साथ-साथ उनकी पढ़ाई-लिखाई पर भी ध्यान दिया जाता था।

फिर, इन महिलाओं को नारी शिक्षा समिति के तहत स्कूल में नौकरी भी दी जाती थी। यह बंगाल का पहला ऐसा संस्थान था, जहाँ प्राथमिक और पूर्व-प्राथमिक शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाता था। 

इतना ही नहीं, लेडी बोस ने कोलकाता और झारग्राम में महिला शिल्प भवन की भी स्थापना की। इसके तहत कमजोर और विधवा महिलाओं को उद्यमशीलता और वित्तीय स्वतंत्रता के प्रति प्रोत्साहित किया जाता था, ताकि उन्हें सामाजिक बंधनों से मुक्त किया जा सके।

इन महिलाओं को कई कला और शिल्प संबंधित विषयों में प्रशिक्षित कर, उन्हें स्वरोजगार से जोड़ा जाने लगा। अबला ने कमरहटी में भी एक प्रशिक्षण संस्थान स्थापित किया। इसके तहत गरीब महिलाओं को बुनाई, चमड़े की कारीगरी, मिट्टी से बर्तन बनाने और सिलाई का प्रशिक्षण दिया जाता था।

उनके इन्हीं प्रयासों को देखते हुए, उन्हें बंगाल महिला शिक्षा लीग का पहला अध्यक्ष चुना गया था।

महिलाओं को मताधिकार दिलाने में भूमिका

उन्होंने देश की महिलाओं को मताधिकार दिलाने में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई। वह सरोजिनी नायडू, मार्गरेट कजिन्स, डोरोथी जिनराजदासा, रमाबाई रानडे के साथ उस प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थीं, जो 1917 में एडविन मोंटेग्यू से मिला था। उस वक्त मोंटेग्यू, मोंटेंग्यु-चेम्सफोर्ड सुधारों पर बातचीत के सिलसिले में दौरे पर आए थे।

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Abala and Jagadish Chandra Bose At Dr Edwin Herbert Lewis’ home in Chicago (Source: jcbose.ac.in)

इसके फलस्वरूप, महिलाओं को पुरुषों के समान राजनीतिक और नागरिक अधिकार प्राप्त हुए। बता दें कि 1921 में, बॉम्बे और मद्रास प्रांत महिलाओं को मताधिकार देने वाले पहले प्रांत बन गए और बंगाल ने 1925 में इसका पालन किया।

देश को आजादी मिलने के बाद, अबला द्वारा महिलाओं को शिक्षित, आत्मनिर्भर और आर्थिक स्वतंत्रता के प्रयासों को सरकार ने भी जरूरी माना और उनके विचार, सरकारी नीतियों का अभिन्न अंग बन गए।

अबला का विचार था कि महिलाओं के लिए शिक्षा एक बेहतर पत्नी या बहू बनने से कहीं अधिक मूल्यवान है। अंग्रेजी पत्रिका मॉडर्न रिव्यू में वह अपने विचारों को प्रकट करते हुए लिखती हैं, “ए वूमन लाइक ए मेन इज फर्स्ट ऑफ ऑल ए माइंड, एंड ऑनली इन द सेकंड प्लेस फिजिकल एंड ए बॉडी।”

अपने अंतिम दिनों में, लेडी बोस ने सिस्टर निवेदिता एडल्ट एजुकेशन फंड की शुरुआत के लिए 10 लाख रुपये का दान दिया। जिससे ग्रामीण महिलाओं के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य के देखभाल की व्यवस्था की गई।

उन्होंने अपने अंतिम दिनों को दार्जिलिंग में गुजारा। जहाँ उन्होंने किराए पर घर लिया था। उनके पति का निधन 1937 में हुआ, जबकि 1951 में उन्होंने अपनी अंतिम साँसे लीं।

उनके दार्जिलिंग के घर को अब एक सांस्कृतिक और शैक्षिक केंद्र में परिवर्तित करने की योजना बनाई गई है।

लेडी अबला को अपनी पूरी जिंदगी कमजोर और निःसहाय महिलाओं के कल्याण की दिशा में प्रयास करने लिए अग्रणी माना जाता रहेगा और भारतीय इतिहास में उन्हें सदैव याद किया जाता रहेगा।

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संपादन – जी. एन. झा

मूल लेख – DIVYA SETHU

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