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Ladakh Architect

मिट्टी-पत्थर-लकड़ी से बनाते हैं घर, निर्माण में लगीं लकड़ियों से दस गुना उगाते हैं पेड़

स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर, नई दिल्ली से पढ़ाई करने के बाद संदीप बोगाधी ने दिल्ली और बेंगलुरु के फर्मों के लिए काम किया। लेकिन, कुछ अलग करने की चाहत में, उन्होंने नौकरी छोड़ लद्दाख को ही अपना घर बना लिया।

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वैसे तो संदीप बोगाधी आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम के रहने वाले हैं लेकिन, लद्दाख (Ladakh Architect) में सतत वास्तुकला को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने “अर्थलिंग लद्दाख” की शुरुआत की।

संदीप 7 साल पहले लद्दाख आए थे। इस दौरान उन्होंने आठ परियोजनाओं को अंजाम दिया। इसमें होटल, बुटीक, और घर शामिल हैं। जबकि, पाँच परियोजनाएँ अभी भी निर्माणाधीन हैं।

संदीप फिलहाल, डिस्केत गाँव में अपना खुद का घर, स्टूडियो और वर्कशॉप भी बना रहे हैं। इस तरह, वह यहाँ के स्थानीय राजमिस्त्री और कारीगरों को रोजगार और सस्टेनेबल आर्किटेक्चर से संबंधित ट्रेनिंग भी दे रहे हैं।

कैसे हुई शुरुआत

संदीप विशाखापत्तनम में पले-बढ़े और उनकी शिक्षा प्रतिष्ठित स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर, नई दिल्ली से पूरी हुई। इसके बाद उन्होंने दिल्ली और बेंगलुरू के कई फर्मों के लिए काम किया। लेकिन, एक वक्त के बाद वह इससे थक गए और कुछ अलग करना चाहते थे।

Ladakh Architect
Architect Sandeep Bogadhi

संदीप ने द बेटर इंडिया को बताया, “उस वक्त मुझे एहसास हुआ कि स्टूडियो को बनाने के लिए जिन सामग्रियों का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसमें कोई जुड़ाव नहीं होता है। यह सॉफ्टवेयर पर मॉडलिंग एक्सरसाइज करने जैसा है। एक बार जब आप शहर से दूर चले जाते हैं, तो material palette अचानक बदलने लगता है, जिससे आपका डिजाइन प्रभावित होता है। यही कारण है कि मैं शहरों से दूर जाकर, ग्रामीण क्षेत्रों में काम करना चाहता था। जहाँ संसाधन और डिजाइन स्थानीय संदर्भ के अनुसार होता है।”

इस तरह, उन्होंने 2012 में उन्होंने अपने शहर को छोड़ दिया और असम चले गए। यहाँ उन्हें कुछ खास रास नहीं आया और 2013 में एसपीए के एक प्रोफेसर के बुलावे के लिए लद्दाख आ गए।

यहाँ लेह से 30 किमी दूर, नीमू ​​गाँव में उन्होंने अपने प्रोफेसर के साथ मिल कर एक 100 साल पुराने जर्जर भवन को बुटीक होटल का रूप दिया था।

इस परियोजना को उन्होंने मिट्टी, पत्थर और लकड़ी जैसे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों से अंजाम दिया था।

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Harking back to the past with natural materials, but giving it a modern touch.

क्या था विचार

लद्दाख में परंपरागत रूप से, घरों को मिट्टी, पत्थर और लकड़ी जैसे संसाधनों से ही बनाए जाते थे। लेकिन, धीरे-धीरे यहाँ सीमेंट का चलन बढ़ने लगा, खासकर लेह में।

संदीप कहते हैं, “यदि यहाँ परंपराएं जीवित नहीं हैं, तो पारंपरिक लद्दाखी घरों का कोई अर्थ नहीं है। इसलिए, मैं यहाँ के स्थानीय व्यवहारों, तकनीकों और संसाधनों का उपयोग करता हूँ। मेरी वास्तुकला में आधुनिक और पारंपरिक, दोनों तकनीकों की झलक देखने को मिलती है।”

वह आगे कहते हैं, “यहाँ कई टूटे-फूटे और बिना इस्तेमाल में लाए घर हैं। इसके बदले लोगों ने नए सीमेंट को घरों के बना लिया है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि लद्दाख की परंपरागत वास्तुकला, लोगों की बदलती जरूरतों के अनुसार लचीली नहीं थी। ऐसा नहीं है कि नई पीढ़ी को पुरानी घरें पसंद नहीं है। लेकिन, वे वहाँ रहना पसंद नहीं करते, क्योंकि उनकी जीवन शैली बदल गई है।”

Ladakh Architect
The Stone Hedge, Nubra Valley, Ladakh.

पारंपरिक लद्दाखी घरों में ग्राउंड फ्लोर पर मवेशियों को रखने के लिए जगह होते थे, लेकिन आज इसका कोई औचित्य नहीं है। इसके अलावा, सर्दियों में पहली मंजिल पर रसोई घर और गर्मियों में दूसरी पर रसोई का भी कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि सर्दियों में यहाँ कई लोग नहीं रहते हैं।

इसलिए, नीमू हाउस में, उन्होंने पुस्तकालय के रूप में एक नए कंपोनेंट को जोड़ा। उनका विचार है कि आर्किटेक्चर, सस्टेनेबल और ऑर्गेनिक होने के साथ-साथ लोगों के अनुकूल भी होना चाहिए। कई घरों में, यदि कोई खास जगह बनाई जाती है, तो आज के 50 वर्षों के बाद, वह परिवार के लिए उपयोगी नहीं हो सकता है। इसके बावजूद, एक आर्किटेक्ट को इतना लचीला होना चाहिए, कोई बाद में पूरे घर को न तोड़ना पड़े।

लद्दाख को ही बना लिया घर

निमू हाउस परियोजना पूरा होने के बाद, उन्हें नए काम की तलाश थी। लेकिन, परियोजना के दौरान सोशल नेटवर्क न बना पाने के कारण उन्हें काफी दिक्कत हो रही थी। 

लेकिन, संदीप का इरादा यहीं रह कर कुछ अलग करने का था। इसी क्रम में उन्होंने एक राफ्टिंग कंपनी में भी काम मिल गया।

फिर, 2015 की गर्मियों के बाद, नुब्रा के कुछ लोगों ने उनसे निंबू हाउस परियोजना को लेकर संपर्क किया।

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वह कहते हैं, “मिट्टी, लकड़ी और पत्थर यहाँ घरों को बनाने के लिए मुख्य संसाधन हैं। इन संसाधनों को जुटाना मेरे लिए आसान था। इससे महत्वपूर्ण यह है कि लद्दाख की खूबसूरती के कारण, मैं यहीं रहना चाहता था।”

वह आगे कहते हैं, “एक आर्किटेक्ट के तौर पर, जब हम किसी शहर में ऐसा घर बनाते हैं, तो अन्य घरों के बीच इसकी खूबसूरती खो जाती है। लेकिन, लद्दाख के ग्रामीण परिवेश में इसके नजारे बेहद खास होते हैं।”

प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल

जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि संदीप अपनी संरचनाओं को 1.5 किमी के दायरे में उपलब्ध लकड़ी, पत्थर और मिट्टी जैसे प्राकृतिक संसाधनों से बनाते हैं। 

इसमें एक और खास बात है कि यदि वह घर बनाने के लिए एक पेड़ को काटते हैं, तो इसके बदले उसी प्रजाति के दस पेड़ों को लगाया जाता है।

Under construction in Nubra under the supervision of architect Sandeep Bogadhi

वह बताते हैं, “मैं अपनी संरचनाओं को भावी पीढ़ियों के अनुसार बनाना चाहता हूँ। इसलिए मैं सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करता हूँ। मैं सीमेंट का इस्तेमाल नहीं करता हूँ, क्योंकि यह सस्टेनेबल नहीं है। प्राकृतिक संसाधनों से बनी संरचनाएं लंबे समय तक चलती है। लेकिन, इसके लिए शिल्प कौशल का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।”

संदीप को यह एहसास है कि लद्दाख भूकंप के लिए अतिसंवेदनशील है। इससे बचाव के तौर पर वह रिंग बीम का इस्तेमाल करते हैं।

मिट्टी से घर बनाना कितना किफायती 

संदीप के अनुसार, मिट्टी से एक अच्छा घर बनाना, सीमेंट का मुकाबले 25 फीसदी महंगा है। वजह यह है कि इसका कार्यबल काफी सीमित है। 

लेकिन, इस चलन को बढ़ावा मिलने के बाद, लागत समान हो जाती है। जैसा कि प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल फिर से किया जा सकता है। इस वजह से, लंबे समय में अर्थ बिल्डिंग हमेशा सस्ता साबित होगी। 

वह बताते हैं कि इसके अलावा, अर्थ बिल्डिंग गर्मियों में ठंडा और सर्दियों के मौसम में गर्म रहते हैं। इस तरह यह लद्दाख के वातावरण को देखते हुए महत्वपूर्ण हो जाता है।

तकनीक और परंपरा

अर्थलिंग लद्दाख मुख्यतः शिल्प संरचनाओं जोर देने के साथ अर्थ बिल्डिंग बनाने के सिद्धांत पर काम करता है। फिलहाल, संदीप ने तीन स्थानीय राजमिस्त्रियों को अपने साथ रखा है। 

वह अंत में कहते हैं कि पुराने जमाने में घरों को स्थानीय जलवायु और संस्कृति के अनुकूल बनाए जाते थे। इससे एक संतुलन बना रहता था। लेकिन, आज आज ऐसा नहीं। इस वजह से कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। आज वास्तुकारों को इन चुनौतियों को समझना होगा और इस दिशा में कारगर कदम बढ़ाने होंगे।

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मूल लेख – RINCHEN NORBU WANGCHUK

संपादन: जी. एन. झा

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