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क्या आप जानते हैं, पुरे विश्व में प्रसिद्द इन पांच खेलों का जन्म भारत में हुआ था!

ज खेलों की वजह से कई देश करीब आये हैं। अलग-अलग देशों में होने वाली खेल प्रतियोगिताएं पूरी दुनिया से दर्शकों को आकर्षित करती हैं। खेल किसी भी व्यक्ति को अनुशासन, टीम-भावना और अन्य महत्वपूर्ण गुणों को सिखाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। और खिलाड़ियों को हर जगह सम्मान की नजरों से देखा जाता है। मशहूर खिलाड़ी जिस भी चीज़ से जुड़ते हैं उसे मशहूर कर देते हैं। जैसा की माइकल जॉर्डन का नाइके ब्रांड के साथ जुड़ने से हुआ।

आज हम आपको बता रहे हैं ऐसे 5 मशहूर खेलों के बारे में जो पूरी दुनिया में खेले जाते हैं। लेकिन इन खेलों की जड़ें भारत से जुड़ी हुई हैं। जी हाँ, वह पांच खेल जो भारत ने दुनिया को दिए।

शतरंज

फोटो: पुराने शतरंज में इस तरह के मोहरे होते थे/ourindiaourproducts

जब चेन्नई के रमेशबाबू प्रग्ननंद्हा दुनिया के दूसरे सबसे छोटे शतरंज ग्रैंडमास्टर बने, तो यह घर वापसी के जैसा था, क्योंकि इस खेल का आविष्कार भारत में हुआ था।

शतरंज का इतिहास लगभग 1,500 साल पुराना है, और इस आधुनिक खेल की शुरुआत भारत में हुई थी। इसे तब ‘चतुरंगा’ कहा जाता था जिसका अर्थ है ‘सेना के चार भाग।’ यह खेल छठी शताब्दी में गुप्त साम्राज्य के दौरान बेहद लोकप्रिय था।

हड़प्पा और मोहनजोदारों में मिले पुरातात्विक अभिलेखों से भी पता चलता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान भी इस खेल को खेला जाता था। इसे एक समय पर ‘अष्टपदा’ भी कहा जाता था, जो कि स्पाइडर का संस्कृत अनुवाद है। 8×8 चेकर्ड बोर्ड पर इस खेल को पासे के साथ खेला जाता था। लेकिन धार्मिक पहलुओं के चलते पासे और जुआ को इससे हटा दिया गया। अरबी और फ़ारसी लोगों के साथ ये खेल भारत से बाहर गया और आज पूरी दुनिया में मशहूर हो गया है।

भारत में कुल 37 ग्रैंडमास्टर्स हैं, जिनमें से विश्व चैंपियन विश्वनाथन आनंद सबसे ज्यादा प्रसिद्ध हैं।

पोलो

मणिपुर में जन्म पोलो आज दुनिया भर में खेला जाता है/फेसबुक

इस खेल को घुड़सवारी करते हुए खेला जाता है। दोनों टीम में चार-चार खिलाड़ी होते हैं। इस खेल में दो गोल पोस्ट होते हैं। एक लंबे लचीले मैलेट से लकड़ी की बॉल को गोल पोस्ट तक पहुंचाने की कोशिश की जाती है।

यह खेल मणिपुर में जन्मा था। 1859 में सिलचर पोलो क्लब की स्थापना ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों और चाय बागानियों ने की थी, क्योंकि तत्कालीन लेफ्टिनेंट जॉय शेरेर ने लोगों को यह खेल खेलते हुए देखा और निश्चय किया कि अंग्रेज़ों को यह खेल सीखना चाहिए।

भारत से, 1868 में पोलो माल्टा, 1869 में इंग्लैंड, 1870 में आयरलैंड, 1872 में अर्जेंटीना और 1874 में ऑस्ट्रेलिया गया। यह खेल वक़्त के साथ और भी कुशल होता गया।

पोलो अब एक अंतरराष्ट्रीय खेल है और अमेरिका से ऑस्ट्रेलिया तक हर जगह खेला जाता है। अमेरिका में, संयुक्त राज्य पोलो एसोसिएशन खेल का प्रशासनिक संगठन है। वास्तव में, 1900-1939 तक, पोलो भी एक ओलंपिक खेल था!

कब्बडी

2016 कब्बडी वर्ल्ड कप में भारतीय कब्बडी टीम/हर्ष विरादिया फेसबुक

अपने टीम के लगातार समर्थन से खेले जाने वाले इस खेल को 1936 के बर्लिन ओलंपिक में प्रसिद्धि मिली। विभिन्न तरीके से भारत में  खेले जाने वाले इस खेल को पंजाब ने अपनी मार्शल परम्परा का हिस्सा बनाया।

आज, यह बांग्लादेश का राष्ट्रीय खेल और कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, पंजाब और तेलंगाना का राज्यिक खेल है।

ऑल इंडिया कब्बडी फेडरेशन का गठन 1950 में हुआ था और इस खेल के लिए कुछ आधिकारिक नियम तैयार किए गए थे, जिनमें से कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में आज भी लागु होते हैं। जापान में 1979 में कब्बडी की शुरुआत हुई। सुंदर राम ने एशियाई एमेच्योर कब्बडी फेडरेशन की तरफ से जापान का दौरा किया, और दो महीने तक वहां कब्बडी सिखाई।

पहली एशियाई कब्बडी चैम्पियनशिप 1980 में हुई थी, और भारत इसमें चैंपियन बना।

बैडमिंटन

साइना नेहवाल प्रसिद्द बैडमिंटन खिलाडी हैं/रियास एमपी फेसबुक

यह खेल ब्रिटिश युग के दौरान शुरू हुआ जब उन्होंने पुणे के गैरीसन शहर में इसे खेला। इस खेल को पूना, या पूनाह के नाम से भी जाना जाता था। और सर्वप्रथम 1873 में पुणे में इसके नियम तैयार किए गए थे।

दरअसल, बैडमिंटन दो खेल, बैटलडोर और शटलकॉक के विलय से बना। ‘बैडमिंटन’ नाम ग्लूस्टरशायर में ब्यूफोर्ट के बैडमिंटन हाउस के ड्यूक से लिया गया था।

इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, आयरलैंड, नीदरलैंड और न्यूजीलैंड 1934 में अंतर्राष्ट्रीय बैडमिंटन फेडरेशन के संस्थापक सदस्य थे, जिसमें भारत 1936 में एक सहयोगी के रूप में शामिल हुआ।

समय के साथ भारत में पुरुष व महिला खिलाड़ी जैसे साइना नेहवाल, और प्रकाश पादुकोण हुए। इनके अलावा अपर्णा पोपट, पुलेला गोपीचंद और चेतन आनंद हैं।

शुरुआत में जिस खेल का नाम महाराष्ट्र के एक शहर पर पड़ा, उसे आज पुरे विश्व में जाना जाता है।

कैरम

फोटो: अद्दितो भट्टाचार्जी

माना जाता है कि दक्षिण एशियाई मूल का यह लोकप्रिय ‘स्ट्राइक-एंड-पॉकेट’ गेम भारत और आसपास के क्षेत्रों में शुरू हुआ था। बहुत से क्लब और कैफे इसके नियमित टूर्नामेंट आयोजित करते हैं।

कैरम एक पारिवारिक गेम है। बुजुर्गों और बच्चों, सभी को बोर्ड पर मजा आता है। पटियाला के शाही महलों में से एक में कैरम बोर्ड कांच के बोर्ड के साथ है। 19वीं शताब्दी के शुरुआत में  भारत के विभिन्न राज्यों में खेल की लोकप्रियता के चलते राज्य स्तरीय टूर्नामेंट आयोजित किये जाते थे।

साल 1958 में, भारत ने कैरम क्लबों के आधिकारिक संघों का गठन किया। जिससे टूर्नामेंट स्पोंसर किये जाने लगे और पुरस्कार भी दिए जाते थे। वर्ष 1988 में अंतरराष्ट्रीय कैरम फेडरेशन चेन्नई में आया। इस खेल ने धीरे-धीरे यूरोप और अमेरिका में भी लोकप्रियता हासिल की, जहां इसे भारतीयों द्वारा ले जाया गया था। वास्तव में, अमेरिका में लकड़ी से बने सबसे महंगे कैरम बोर्ड भारत से आयात किए गए हैं!

आज भले ही हम क्रिकेट के दीवाने हों, लेकिन हमने खेलों की दुनिया को जो दिया है वह भी हमें नहीं भूलना चाहिए।

संपादन – मानबी कटोच 

मूल लेख: रेमंड इंजीनियर


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Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

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