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साढ़े तीन वर्षीय कैज़ेन जी रहा है ‘मोगली’ जैसा जीवन, माँ-बाप ने छोड़ी थी कॉर्पोरेट की नौकरी!

पको याद है कि कैसे बचपन में हम मोगली के दीवाने हुआ करते थे। सेओनी के पेंच जंगल में पला-बढ़ा वह मस्तीखोर बच्चा, जिसे रुडयार्ड किपलिंग की जंगल बुक सीरीज ने मशहूर कर दिया।

हम ऐसे जीवन जीने का सिर्फ ख़्वाब ही देख सकते हैं लेकिन इसी ख़्वाब को सच में जीने वाला एक बच्चा है, जो मध्य प्रदेश के पेंच जंगलों से सिर्फ 50 मीटर की दुरी पर रह रहा है।

पेड़ की टहनियों पर झूलता, जंगल में नंगें पैर घूमता, तितलियों को पकड़ता, बंदर की नकल उतारता और रात को अपनी खिड़की से बाघ को बुलाता, साढ़े तीन साल का कैज़ेन मोगली के जैसा ही जीवन जी रहा है। इसका श्रेय जाता है उसके माँ हर्षिता और पिता आदित्य शाकल्य को।

उन्होंने अपने बेटे को यह प्राकृतिक जीवन देने के लिए अपनी कॉर्पोरेट की अच्छी-खासी नौकरी को छोड़ दी।

आदित्य, हर्षिता अपने बेटे कैजेन व कुत्ते कार्लोस के साथ

कैज़ेन केवल छह महीने का था, जब हर्षिता और आदित्य ने इंदौर में अपना शहरी जीवन और नौकरी छोड़ कर, पेंच टाइगर रिजर्व के ‘टाइगर एन वुड्स’ रिज़ॉर्ट की देखभाल करना शुरू किया।

आदित्य का जन्म दिल्ली में हुआ और हर्षिता का पालन-पोषण इंदौर में। उन्होंने अपनी पढ़ाई विदेश में की और अपनी काबिलियत के चलते कई बड़ी इंडस्ट्रीज में काम भी किया।

हर्षिता, एक पेशेवर चॉकलेटियर है। उन्होंने 17 साल की उम्र में ही अपना खुद का व्यवसाय शुरू कर दिया था। आदित्य एक उपन्यासकार हैं। उन्होंने कई ब्रांड और प्रकाशनों के साथ काम किया है।

आदित्य और हर्षिता की मुलाकात तब हुई जब ये दोनो एक ही फर्म के लिए काम कर रहे थे। वहीं से उन्होंने साथ में बिजनेस खोलने का निश्चय किया। एक जैसे विचार रखने वाले इस जोड़े ने खुद का सोशल मीडिया और डिजाइनिंग स्टार्टअप शुरू किया। जो रिश्ता बिजनेस पार्टनर के रूप में शुरू हुआ था, वह आगे चलकर ज़िन्दगी में भी पार्टनरशिप में बदल गया।

इस जोड़े को वर्कहोलिक कहना गलत नहीं होंगा। साल 2013 में अपने हनीमून के दौरान भी दोनों पति-पत्नी काम कर रहे थे। हर्षिता ने अपनी थाईलैंड की ट्रिप को याद करते हुए बताया कि कैसे उस एक ट्रिप ने उनकी ज़िन्दगी में सब कुछ बदल दिया।

“हम एक सुंदर छोटी सी वैन में क्राबी जा रहे थे। लेकिन खिड़की के बाहर की खूबसूरती निहारने की बजाय हमारा ध्यान इस पर था कि कब हमें नेटवर्क मिलेगा और कब हम फिर से काम कर पायेंगें।”

वह उन दोनों के लिए अपनी कड़वी सच्चाई से रू-ब-रू होने वाला पल था। उन्हें यह समझ आया कि वे आने वाले कल में और खासकर अपने बच्चों के लिए ऐसी ज़िन्दगी नहीं चाहते हैं।

बहरहाल, कॉर्पोरेट छोड़ना तो उनके लिए आसान था लेकिन उनके पास कोई बैकअप प्लान नहीं था।

उस समय जब हर कोई नए साल का स्वागत कर रहा था तो उन्हें भी अपने जीवन में बदलाव का एक मौका मिला। साल 2014 में नए साल से पहले दिन शाम की पार्टी में उन के कुछ दोस्तों ने आदित्य की नई किताब के बारे में चर्चा शुरू की।

तभी उनके एक दोस्त ने बताया कि वो ऐसी जगह जानता है जहां शांति से आदित्य अपनी किताब लिख सकता है और साथ ही उस रिसोर्ट का प्रबंधन भी संभाल सकता है।

हर्षिता ने बताया, “उस समय कैज़ेन छह महीने का था। तो हमने सोचा कि क्यों न इसे ट्राई किया जाये। वैसे भी हम अपने बच्चे को शहर की अफरा-तफरी से दूर बड़ा करना चाहते थे।”

इस के साथ ही हर्षिता ने आजकल के दौर में शिक्षा में बढ़ते व्यवसायिक मॉडल के बारे में अपने विचार व्यक्त किये।

उन्होंने बताया, “मैं जानती थी कि हम अपने बेटे को कभी न खत्म होने वाले रेस का हिस्सा नहीं बनाना चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि वह किसी भी चीज़ में सफल होने के बारे में चिंतित हों क्योंकि दुनिया यही सोचती है कि आपके मार्क्स या ग्रेड जीवन में सफलता को परिभाषित करते हैं।”

यह उनके लिए एक मौका था इस कंक्रीट जंगल से परे जाकर भी जीवन को तलाशने और जीने का। 4 जनवरी को वे पहली बार उस रिज़र्व में गए और 17 मार्च, 2015 को वे अपने सारे सामान के साथ वहां हमेशा के लिए आ गए।

कैज़ेन नदी में खेलते हुए

पर क्या यह बदलाव उनके लिए आसान था?

“हम शहरों में पले-बढे थे और अभी तक कॉर्पोरेट जीवन जिया था। हम तो सुबह तक पार्टी करने वाले लोग थे। यह बदलाव बहुत मुश्किल था। एक पार्क में जाकर घूमना, टाइगर रिज़र्व के बीच में रहने से बहुत अलग होता है।”

हर्षिता ने बताया कि जंगल के इतने करीब रहने में यक़ीनन आप प्रकृति जैसा महसूस करते हैं। लेकिन इसके साथ एक डर भी होता है।

“यह हमेशा से डरावना था और आज भी है। मैंने झाड़ियों से कोबरा को निकलते देखा है और एक बार एक जंगली बंदर को कैज़ेन पर गुर्राते देखा है। सच यही है कि हम एक ऐसी जगह रह रहे हैं, जहां जानवरों का राज है। ये उनका घर है और हम हमेशा बाहरी ही रहेंगें। इसलिए हमें सद्भावना से रहना है और इस जगह को हर तरीके से प्रकृति के करीब रखना है,” हर्षिता ने कहा।

कैज़ेन अपने जंगली दोस्त के साथ

“पहला साल बहुत मुश्किल था। जब हम रिसोर्ट की मरम्मत कर रहे थे, तो बिजली की बहुत समस्या थी।”

हर्षिता उन दिनों को याद करती है जब कैज़ेन गर्मी में करवटें बदलता था। लेकिन आज वो दर्द भरे पल केवल ख़ूबसूरत यादें हैं। अपनी 10 फ़ीट ऊँची मचान से जीव-जंतुओं को देखना और हर दिन मौसम को बदलते हुए देखना, एक अलग ही तरह का अनुभव है। अब उनके पास केवल मीठी यादें हैं।

रिज़र्व के गेट से बाहर निकलते ही 30-40 घरों वाला एक गांव है। इन गांववालों के बीच कैज़ेन खूब मशहूर है। हर्षिता बताती हैं कि कैसे एक दिन वह मच्छर के काटने पर रोते हुए उनके पास आया और गांव के देहाती भाषा में कहा, “मम्मा, मच्छर चाप गया।”

“वह शहरी बच्चे और बड़ों की तुलना में बहुत जल्दी लोगों के साथ घुल-मिल जाता है। वह नए लोगों के साथ आसानी से बातचीत करता है। जब मेहमान दूसरे देशों से आते हैं, तो वह अंग्रेजी में उनसे बात करता है। दूसरी तरफ गाँव वालों से उनकी स्थानीय भाषा में भी बड़े आराम से बात कर लेता है। और यहां काम करने वाले विकलांग कर्मचारियों से वह सांकेतिक भाषा में बात करता है,” हर्षिता ने बताया।

किचन के साथ-साथ वह फल, सब्जियों और औषधियों के बारे में भी भली-भांति जानता है। कर्मचारियों की उनके कामों में मदद करना और साथ ही साथ विनम्रता रखना, यह सब उसे आता है।

दूसरे माँ-बाप जहाँ अपने बच्चों को बाहरी जीवन से रू-ब-रू कराने की जद्दोजहद में लगे हैं, वहीं कैज़ेन की दुनिया खुद उसके पास आ रही है।

कैज़ेन गांववालों के साथ

भले ही यह बच्चा अपनी उम्र के अधिकांश बच्चों की तरह नहीं लिख सकता, फिर भी वह आत्मनिर्भर बनने के लिए आवश्यक सभी बुनियादी कौशल सीख रहा है। वह इस महीने से एक ओपन स्कूल में जाने लगा है, जो उनके घर से 60 किलोमीटर की दूरी पर कैटरपिलर लैब्स के नाम से है। इस स्कूल में उम्र मायने नहीं रखती। इसमें अलग-अलग भाषा और गतिविधि प्रयोगशालाएं होती हैं। सभी विद्यार्थियों को विभिन्न कौशलों में पारंगत किया जाता है।

उसे स्कूल भेजने का दूसरा कारण था, उसका अपनी उम्र के बच्चों के साथ की कमी का खलना। जब भी मेहमान आते तो वह बहुत उत्साहित होता लेकिन उनके जाने पर वह उदास हो जाता।

“लगातार उसके दोस्त बने और वह खुश रहे, इसलिए हमने उसे स्कूल में दाखिला दिलवाया,” हर्षिता ने कहा।

रिसोर्ट के साथ-साथ वे अब खुद को समय दे पा रहे हैं। आदित्य एक योगा टीचर भी है। इसलिए वह बच्चों और आने वाले मेहमानों के लिए योग वर्कशॉप भी रखते हैं। हाल ही में उन्होंने बोधिसत्वा योग फाउंडेशन शुरू की है। जिसका उद्देश्य युवा बच्चों के भावनात्मक और मानसिक स्वास्थ्य को बनाये रखना है। यहां पर उन्हें योग को  कर चिंता और अवसाद से लड़ना सिखाया जाता है।

चॉकलेट का व्यवसाय चलाना यहाँ मुश्किल था। इसलिए हर्षिता ने गांव में घूमकर स्थानीय वस्तुओं, चावल और सब्जी आदि के बारे में गांववालों से जानने और समझने की कोशिश की।

उन्होंने अपनी पेंच पिकल कंपनी खोली। जहां पर अचार, जैम और शरबत आदि जैसी चीजें बनती हैं।

हर्षिता गांव की औरतों के साथ

जब हर्षिता से यह पूछा गया कि क्या हो अगर कैज़ेन बड़ा होकर शहर जाने के लिए कहे तो?

उन्होंने हंसते हुए कहा, “सच कहूं तो मुझे पता है कि एक दिन शहरी जीवन उसे अपनी तरफ आकर्षित करेगा। यह हमें भी आकर्षित करता है। लेकिन यह उसका फैसला होगा। हमने यहां आने के फैसले में अपने माता-पिता की नही सुनी थी। लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि हम अपने बच्चे की बेहतर परवरिश कर पाएं।”

और यदि आपको लगता है कि कैज़ेन केवल गांव और जंगल तक ही सीमित है, तो आप गलत हैं।

“सच में, हम कौन है उसे रोकने वाले? हम तो सुनिश्चित करते हैं कि वह सब कुछ अनुभव करे। हम चाहते हैं कि वो वही बनें जो वह बनना चाहता है। हम उसे भारत में और भारत के बाहर ट्रिप्स पर लेकर गए हैं,” हर्षिता ने बताया।

कैज़ेन अभी तक गोवा, दिल्ली, इंदौर, वाराणसी, श्रीलंका, अंडमान और अन्य स्थानों की यात्रा कर चूका है।

( संपादन – मानबी कटोच )


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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