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जम्मू-कश्मीर की रुकसाना को हर साल पैसे भेजते हैं भारतीय सेना के कर्नल थापर, वजह दिल को छू जाएगी!

बहादुर कप्तान विजयंत थापर/रावेन्द्र सिंह फेसबुक पेज

साल 1999 में जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में रहने वाली 6 वर्षीय रुकसाना की आँखों ने सामने आतंकवादियों ने उसके पिता की हत्या कर दी। इस घटना के बाद रुकसाना सदमे में चली गई थी। उसने अपने बोलने की शक्ति खो दी थी।

जिस वर्ष रुकसाना के पिता की हत्या हुई, उसी वर्ष भारतीय सेना अधिकारी कप्तान विजयंत थापर को जम्मू-कश्मीर राइफल्स की बटालियन के साथ जिले में तैनात किया गया था।

जब कप्तान थापर को रुकसाना की कहानी के बारे में पता चला तो वे हर दिन उससे मिलने उसके स्कूल जाने लगे। अपने सहायक जगमाल सिंह के साथ वे मिठाई और चॉकलेट लाते और इस बच्ची से बात करते। धीरे-धीरे दोनों के बीच एक प्यारा-सा रिश्ता बन गया था। कप्तान थापर रुकसाना को डॉक्टर के पास भी लेकर गए।

कारगिल में कप्तान थापर रुकसाना के साथ/इंडियन मिलिट्री सिस्टम फेसबुक

कप्तान थापर के प्रयासों से रुकसाना अपने पिता की मौत के सदमे से उबरने लगी और उसने बोलना भी शुरू कर दिया था।

लेकिन दुर्भाग्यवश, उसी साल जून में कारगिल के युद्ध के दौरान टोलोलिंग नोल की लड़ाई में बहादुर कप्तान थापर शहीद हो गए। हालाँकि, मिशन पर जाने से पहले उन्होंने अपने परिवार को खत लिखा कि वे हमेशा रुकसाना का ध्यान रखें। उन्होंने खत में अपने और रुकसाना के प्यारभरे रिश्ते का जिक्र किया और अपने परिवार से गुजारिश की कि वे हर महीने रुकसाना के लिए पैसे भेजें।

कप्तान थापर के पिता कर्नल थापर (73 वर्षीय) ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया कि उनका परिवार नोयडा में रहता है। लेकिन अपने बेटे की इच्छा का मान रखते हुए वे हमेशा रुकसाना के सम्पर्क में रहे। वे हर साल रुकसाना के लिए पैसे भेजते हैं।

साल 2015 में कर्नल थापर रुकसाना और उसकी माँ से भी मिले और उन्हें ख़ुशी हुई कि रुकसाना की पढ़ाई जारी है।

टोलोलिंग हमले से पहले अपने परिवार के लिए लिखे खत में उन्होंने लिखा कि यदि फिर से उनका जन्म इंसान के रूप में हो तो वे फिर एक बार सेना में भर्ती होकर देश के लिए लड़ेंगें। उन्होंने अपने परिवार को उनके सभी अंग दान करने की भी गुजारिश की और आग्रह किया कि वे हमेशा रुकसाना का ख्याल रखें।

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जहां कप्तान थापर ने अपना बलिदान दिया, उस स्थान पर उनके पिता कर्नल थापर ने कई दौरे किये हैं। वे उन्हें बहुत याद करते हैं और साथ ही उन्हें गर्व है अपने बेटे पर।

कप्तान थापर को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया था। हम भारतीय सेना के इस नायक को सलाम करते हैं जिन्होंने निःस्वार्थ रूप से देश के लिए अपना जीवन दे दिया और साथ ही, एक बच्ची को उसकी आवाज भी लौटाई।


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Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

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