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बुरारी परिवार : दिल्ली की डॉ. रोमा कुमार से जानिए साइकोलॉजिकल ऑटोप्सी और शेयर्ड साइकोसिस के बारे में!

फोटो: फेसबुक

दिल्ली बुरारी मिस्ट्री मीडिया के हिसाब से कोई क्राइम थ्रिलर बनाने के लिए एक उम्दा कहानी है। रहस्यमयी परिस्थितियों में भाटिया परिवार के 11 सदस्य अपने ही निवास स्थान पर मृत पाए गए।

दिल्ली पुलिस द्वारा मौत से संबंधित कई कारणों को नकारने के बाद खबरे मिल रही है कि अब इस केस में साइकोलॉजिकल ऑटोप्सी की जाएगी। आप हिन्दू बिजनेस लाइन में इस केस के बारे में पढ़ सकते हैं।

द बेटर इंडिया ने इस संदर्भ में तीन दशकों से भी ज्यादा अनुभवी मनोवैज्ञानिक डॉ रोमा कुमार से बात की।

वह वर्तमान में दिल्ली/एनसीआर के कई अस्पतालों से जुड़ी हुई है। डॉ. रोमा ने इस केस में उठने वाले कई सवालों के जबाब दिये।

फोटो: डॉ रोमा कुमार।सोच गुडगाँव फेसबुक पेज

पढ़िए इस बारे में उनसे हुई बातचीत का एक अंश –

साइकोलॉजिकल ऑटोप्सी क्या है?

फिजिकल ऑटोप्सी में हम किसी भी इंसान की शारीरक अवस्था का पता लगाने की कोशिश करते हैं। हम कोशिश करते हैं यह समझने की, कि इंसान की मौत किन कारणों से हुई है। किस तरह का हमला हुआ या फिर हमले के लिए किस हथियार या वस्तु का इस्तेमाल किया गया था। इसके अलावा इस बात का भी पता चलता है कि कही मृत व्यक्ति को कोई जहरीला पदार्थ तो नहीं दिया गया था। यह सब जानने के लिए फिजिकल ऑटोप्सी की जाती है।

साइकोलॉजिकल ऑटोप्सी अंदरूनी कारणों का पता लगाने के लिए की जाती है, जैसे किसी मानसिक बीमारी के चलते तो व्यक्ति की मृत्यु नहीं हुई।

पुलिस द्वारा मांमले की छानबीन की जा रही है।
फोटो: आम आदमी पार्टी फेसबुक पेजमृतक के रिश्तेदारों से पूछताछ कर पता लगाने कि कोशिश की जाती है कि उस व्यक्ति के मन में आत्म-हत्या का ख्याल तो नहीं था या फिर और कोई वजह जिससे व्यक्ति परेशान हो।

इस प्रक्रिया के दौरान व्यक्ति के पुराने स्वास्थ्य संबंधित रिकार्ड्स और फॉरेंसिक डाटा अच्छी तरह से जांचा जाता है। इसमें पता लगाने की कोशिश की जाती है कि व्यक्ति की मौत किन हालातों में हुई।

सुनंदा पुष्कर के केस में भी साइकोलॉजिकल ऑटोप्सी की गयी थी। हालाँकि, इसके निष्कर्ष अनिश्चित थे।

एक और शब्द रिपोर्ट्स में अक्सर इस्तेमाल होता है, जिसे ‘शेयर्ड साइकोसिस’ कहते हैं। लेकिन इसका क्या मतलब है?

शेयर्ड साइकोसिस या ‘बहुतों का पागलपन’ एक तरह की मानसिक बीमारी है। यह बीमारी ऐसे व्यक्तियों को हो सकती है जो किसी मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति के बहुत करीबी हों।

एक व्यक्ति जो एक भ्रम में रहता है और वह अपने भ्रम दूसरे व्यक्तियों को पास कर सकता है, जो उस पर विश्वास करते हैं।

फोटो: फेसबुक

बुरारी मामले में यदि शुरूआती रिपोर्ट पर गौर करें तो यह शेयर्ड साइकोसिस का केस है। दरअसल, एक परिवार के एक सदस्य के भ्रम में पड़ने के बाद बाकि सभी सदस्य भी उसे सच मानने लगे थे। इस परिवार के मुखिया की मृत्यु होने के बाद, उसका तीसरे बेटे, ललित भाटिया को अपने पिता के बारे में वहम होने लगा था। वह अपने पिता की तरह बोलता व व्यवहार करता था। पड़ोसियों व रिश्तेदारों ने बताया कि बाकी सभी सदस्य भी उसे परिवार का मुखिया मानने लगे थे।

इस बीमारी का कोई इलाज़ नहीं है, लेकिन दवाइयों और काउंसलिंग कुछ हद तक मददगार हो सकते हैं।

डॉ. रोमा कहती हैं, “मेरे 30 से अधिक वर्षों के अनुभव में, मैंने कभी इस तरह का मामला नहीं देखा है। कुछ वर्षों पहले मैंने एक साइकोलॉजिकल ऑटोप्सी का केस देखा था लेकिन वह इससे बिलकुल अलग था।”

उन सभी 11 सदस्यों का आत्महत्या करना सामान्य नहीं है। यक़ीनन इस मामले में जो भी मेन्टल हेल्थ पर काम कर रहे हैं, उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।

बाकी हम उम्मीद करते हैं कि यह केस भी बहुत से ऐसे केसों में से न हो जिनके कोई जबाब नहीं हैं। पर इस केस से सीख लेकर लोग मानसिक रोगों को भी गंभीरता से लें और इसका इलाज कराये!

( संपादन – मानबी कटोच )


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Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

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