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0.25 एकड़ पर करते हैं खेती, मछली और मधुमक्खी पालन भी, 5 साल से नहीं गए बाज़ार

0.25 एकड़ पर करते हैं खेती, मछली और मधुमक्खी पालन भी, 5 साल से नहीं गए बाज़ार

केरल के कोक्कवड गाँव के रहने वाले जोशी मैथ्यूज के पास 0.25 एकड़ जमीन है, जहाँ उन्होंने जैविक खेती और मछली पालन से लेकर मधुमक्खी पालन की सुविधा भी विकसित कर ली है।

अक्सर लोग सोचते हैं कि खेती के लिए बड़ी जगह की जरूरत होती है लेकिन ऐसी बात है नहीं। यदि आप केवल खुद के लिए अन्न, सब्जी आदि उपजाना चाहते हैं तो काफी कम जगह में यह संभव है, बैकयार्ड फार्मिंग तो इसका सबसे शानदार उदाहरण है। 

आज द बेटर इंडिया आपको केरल के एक ऐसे शख्स से रू-ब-रू करवाने जा रहा है, जो पेशे से एक फोटोग्राफर (Kerala Photographer) हैं, लेकिन बैकयार्ड फार्मिंग की वजह से वह पिछले पाँच साल से न सब्जी बाजार से खरीद रहे हैं और न हीं मछली।

Kerala Photographer
मैथ्यूज और उनकी पत्नी जूली

50 वर्षीय जोशी मैथ्यूज केरल के कोक्कवड गाँव के रहने वाले हैं। सड़क किनारे लाल लेटराइट पत्थरों से बने उनके इस घर के चारों और कई पेड़-पौधे लगे हुए हैं, जिससे इस पर बाहरी तापमान का असर न के बराबर होता है। मैथ्यूज के पास 0.25 एकड़ जमीन है, जहाँ उन्होंने जैविक खेती और मछली पालन से लेकर मधुमक्खी पालन की सुविधा विकसित कर ली है, जिससे बाजार पर उनकी निर्भरता काफी कम हो गई।

पेशे से एक फोटोग्राफर मैथ्यूज (Kerala Photographer) को प्रकृति से काफी लगाव है और पूरे गाँव में उन्हें अपने जीवन में प्रकृति के अनुकूल व्यवहारों को अपनाने के लिए जाना जाता है। इस तरह, उन्होंने अपने परिवार को काफी हद तक आत्मनिर्भर बना दिया है। 

आज उनके घर में, चावल और गेहूँ जैसे फसलों को छोड़कर  मछली, फल, सब्जी जैसी कई चीजों की खेती होती है। यही कारण है कि आज उन्हें इसके लिए बाजार गए हुए, तकरीबन 5 वर्ष हो चुके हैं और वह सब्जी की मौजूदा कीमतों से पूरी तरह अनजान हैं।

Kerala Photographer

इस कड़ी में, मैथ्यूज ने द बेटर इंडिया को बताया, “हमारे भोजन की सभी जरूरतों अपने घर में लगे पेड़-पौधों से पूरी होती है। हमने दो तालाब बनाएँ हैं, जिसमें हम मछली पालते हैं। हमारे पास पाल्ट्री फार्म भी है। इसके अलावा, हमारे पास एक गाय है, जिससे दूध और खाद प्राप्त होता है।”

यह कई लोगों के लिए आश्चर्य की बात होती है, जब उन्हें पता चलता है कि इतने छोटे जमीन पर मैथ्यूज 80 प्रकार के पेड़-पौधों की खेती करते हैं।

लेकिन, वास्तव में, मैथ्यूज अपने परिवार के पहले शख्स थे, जिन्होंने अपने घर के आँगन में खेती करने के लिए, एक दोस्त के सुझाव को नकार दिया था। क्योंकि, उनका मानना था कि खेती के लिए काफी जमीन, समय और श्रम की जरूरत होती है।

तो, मैथ्यूज ने इन बाधाओं को कैसे पार किया?

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“मेरे दोस्त, जॉयचन पुत्तनपुरा ने मुझे खेती के लिए काफी कम जगह में खेती करने वाले लोगों के कई सफल मॉडल दिखाए। उन्होंने मुझे फेसबुक के जरिए बागवानी करने वाले कई विशेषज्ञों और किसानों से अवगत कराया, जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा। शुरुआती दिनों में मेरे पास 2-3 पौधे थे और धीरे-धीरे मेरा उत्साह बढ़ता गया,” वह कहते हैं।

मैथ्यूज की परवरिश एक किसान परिवार में हुई। लेकिन, अपने माता-पिता को आर्थिक तंगियों का सामना करते देख, उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, 1990 के दशक के शुरुआती दिनों में मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड नौकरी शुरू कर दी। 

हालांकि, वह अपने बीमार माता-पिता की देखभाल के लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और साल 1996 में अपने घर लौट आए। इसके बाद, उन्होंने अपना कैरियर एक वेडिंग फोटोग्राफर के रूप में शुरू किया।

“फोटोग्राफी एक आकर्षक करियर है और इसके गुर अपने दोस्तों की मदद सीखी। हालांकि, मैं खेती-किसानी के अपने मूल से दूर नहीं रह सका और साल 2015 में, शौकिया तौर पर खेती शुरू की,” मैथ्यूज कहते हैं।

उनकी पत्नी, जूली, फिलहाल सोशल वर्क में मास्टर्स कर रही हैं और उनके दो बच्चे स्कूल में हैं।

जूली को घर पर सबकुछ उगाने का विचार काफी प्रेरक लगा और दोनों ने खेती से संबंधित प्रयोग करने शुरू किए। उन्होंने इसके लिए बीजों को स्थानीय किसानों से लिया। इसके साथ ही, उन्होंने एक गाय भी खरीदी और पौधों को रिसाइकिल किए गए बेकार टायरों में लगाया।

पहले, उन्होंने जैविक सब्जियों को लगाने के लिए पेड़ों के बीच की जगह का उपयोग किया और बाद में मधुमक्खी और तालाबों के लिए जगह बनाने के लिए, छत पर खेती शुरू की।

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मैथ्यूज परमाकल्चर, इंटरक्रॉपिंग या मल्टी-लेयरिंग जैसे कृषि तकनीकों से दूर रहे। वह अपनी खेती परंपरागत तरीके से करते हैं। इसमें सबसे खास है, उनका सिंचाई करने का तरीका।

मैथ्यूज अपने खेती कार्यों में विक इरिगेशन तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें पौधों की जड़ों तक सीधे पानी पहुँचाने के लिए रस्सियों का इस्तेमाल किया जाता है। जिससे पानी और समय, दोनों बचता है।

वह कहते हैं, “इस तकनीक को मलयालम में थिरी नाना कहा जाता है। इसमें एक बाल्टी में पानी भरने के बाद, इसे ट्रे से ढंक दिया जाता है। इसके बाद, इस ट्रे में एक छेद बनाया जाता है, ताकि इसमें  रस्सी का एक छोर डाला जा सके। दूसरा छोर ग्रो बैग के माध्यम से जाता है, जिसे ट्रे के ऊपर रखा जाता है। इस तकनीक से पौधों की सिंचाई हम हफ्ते में एक या दो बार करते हैं।”

अपने पेड़-पौधों से कीटों से बचाने के लिए, मैथ्यूज गाय के गोबर, पत्तियों और किचन वेस्ट का इस्तेमाल करते हैं। वह कहते हैं, “पौधों को कीटों से बचाने के लिए, नीम के पेस्ट का उपयोग करते हैं। इसके अलावा, औषधीय पौधे पेस्ट-रिपेलेंट्स के रूप में भी कार्य करते हैं।”

बता दें कि मैथ्यूज के पास 30 से अधिक औषधीय पौधे हैं, जिसमें सोमलता,  नीलकोडुवेली (ब्लू लीडवुड) भी शामिल हैं। वह सब्जियों को मौसम के अनुसार उगाते हैं, जिसमें आलू, पालक, टमाटर, चुकंदर, मिर्च, गोभी से लेकर तरबूज तक शामिल हैं।

इसके अलावा, फलों में आम, लेमन वाइन, पीनट बटर, स्ट्रॉबेरी, संतरे, ड्रैगन फ्रूट आदि शामिल हैं, तो मसालों में काली मिर्च, जायफल और इलायची पाए जा सकते हैं।

वहीं, मैथ्यूज के पास दो तालाब भी है, जिसमें जाइअन्ट गौरामी, रेड तिलापिया, असम वाला, जैसी 800 से अधिक मछलियाँ हैं। इन मछलियों का मुख्य खाना शैवाल है।

वह इन मछलियों का इस्तेमाल खुद के लिए करते हैं, लेकिन लॉकडाउन के दौरान बाजार बंद रहने के कारण, उन्होंने इसका व्यवसायीकरण कर दिया। वह अब तक 10 रुपये प्रति पीस की दर पर, करीब 3000 फ़िंगरलिंग्स बेच चुके हैं।

मैथ्यूज के पास मधुमक्खियों की 60 कॉलोनियाँ भी हैं, जो बिल्कुल डंक रहित है। उन्हें इससे सलाना 20 किलो शहद मिलता है।

इसे लेकर जूली कहती हैं, “पिछले साल हमने शहद 2,000 रुपये में बेचे। इसके अलावा, हमने गाँव में 20 मधुमक्खी कालोनियों को भी बेचा। इससे हमें कुल 80,000 रुपये का लाभ हुआ।”

व्यावसायिक पहलू उनके लिए बेशक नया है, इसलिए वह उत्पादों को अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को बेच रहे हैं। हालाँकि, लॉकडाउन उनके लिए एक अच्छा अवसर लेकर आया है।

इसे लेकर मैथ्यूज कहते हैं, “इस महामारी ने साबित किया है कि यदि आपका पेशेवर करियर दांव पर लग गया है, तो इस तरह से खेती से एक बड़ी राहत मिल सकती है। क्योंकि, इससे दिन के अंत में, आपको अपने परिवार को खिलाने के लिए भोजन होगा। और, यदि पैमाना बड़ा है, तो आर्थिक लाभ भी कमा सकते हैं।”

मूल लेख –

संपादन: जी. एन. झा

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कुमार देवांशु देव

राजनीतिक और सामाजिक मामलों में गहरी रुचि रखनेवाले देवांशु, शोध और हिन्दी लेखन में दक्ष हैं। इसके अलावा, उन्हें घूमने-फिरने का भी काफी शौक है।
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