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बचपन की याद दिलाते 10 देसी खेल, जिनसे अनजान है आज के स्मार्ट किड्स!

भारत हमेशा से संस्कृति और परंपरा से समृद्ध रहा है! और खेल, हमेशा से ही भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहें हैं। चाहे भगवान शिव और उनकी पत्नी पार्वती के बीच पचीसी का खेल हो, पांडवों द्वारा पासे के खेल में द्रौपदी को हार जाना या दोपहर के बाद शतरंज के खेल का आनंद लेने वाले मुगल; खेल और खेलने वाले हमेशा से भारत के इतिहास और पौराणिक कथाओं में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आये हैं।

धीरे-धीरे समय बदल गया और इसके साथ ही बदलाव आये हमारे खेलों में भी। प्ले स्टेशन, वीडियो गेम और गैजेट के समय में, हम सभी भारत के पारंपरिक खेलों को शायद भूल ही गए हैं। याद है कैसे हम स्कूल खत्म होने तक का इंतजार नहीं कर पाते थे ताकि हम अपने दोस्तों के साथ जाकर किठ-किठ खेल सकें?

तो चलिए आज इन्हीं सब खेलों को याद किया जाये। आज हम आपको बता रहें हैं भारत के 10 पारम्परिक खेलों के बारे में।

सतोलिया (पिट्ठू या लगोरी)

फोटो: पत्रिका

भारत के कुछ भागों में इस खेल को पिट्ठू या लागोरी के नाम से भी जाना जाता है। किसी भी संख्या में लोग इसे खेल सकते हैं। इसमें सात छोटे पत्थरों की जरूरत होती है; हर पत्थर का आकार दूसरे पत्थर से कम होना चाहिए। घटते आकार के क्रम में पत्थरों को एक-दूसरे के ऊपर रखें। एक निश्चित दुरी से एक बॉल को पत्थरों के ढेर पर फेंकना होता है। यहां आप खेल के नियम पढ़ सकते हैं।

गुट्टे या किट्ठु

फोटो: ब्लॉगर

यह पारंपरिक खेल बच्चों और बड़े दोनों द्वारा खेला जाता है। इस साधारण खेल के लिए 5 छोटे पत्थरों की आवश्यकता होती है। आप हवा में एक पत्थर उछालते हैं और उस पत्थर के जमीन पर गिरने से पहले अन्य पत्थरों को चुनते हैं। यह गेम कितने भी लोगों के साथ खेला जा सकता है।

कंचा

फोटो: पिनटेरेस्ट

बच्चों के बीच कंचा खेलना सबसे प्रसिद्द खेल होता था। इस खेल को मार्बल से खलते हैं, जिसे ‘कंचा’ कहते हैं। इस खेल में सभी कंचे इधर-उधर कुछ दुरी पर बिखेर दिए जाते हैं। खिलाडी एक निश्चित दुरी से एक कंचे से दूसरे कंचों को हिट करता है। जो खिलाडी सभी कंचों को हिट कर लेता है वह विजेता होता है। आखिर में सभी कंचे विजेता को दे दिए जाते हैं।

खो-खो

फोटो: प्रगति क्रीड़ा मंडल

यह भारत में सबसे लोकप्रिय खेलों में से एक है। इसमें दो टीम होती हैं। एक टीम मैदान में घुटनों के बल बैठती है। सभी खिलाडी एक-दूसरे के विपरीत दिशा में मुंह करके बैठते हैं। जो भी टीम सभी सदस्यों को टैप करके सबसे कम समय में खेल खत्म करती है वही विजयी होती है।

गिल्ली-डंडा

फोटो: अनमोल गोते/ब्लॉगर

भारतीय गांवों की गलियों में खेले जाने वाला यह खेल बच्चों का सबसे पसंदीदा खेल है। इसमें दो छड़ें होती हैं, एक थोड़ी बड़ी, जिसे डंडे के रूप में प्रयोग किया जाता है और छोटी छड़ को गिल्ली के लिए। गिल्ली के दोनों तरफ के छोर को चाक़ू से नुकीला किया जाता है।

डंडे से गिल्ली के एक छोर पर चोट की जाती है, जिससे कि वह हवा में उछले और हवा में फिर से एक बार गिल्ली पर चोट करते हैं जिससे वह दूर जाकर गिरती है। इसके बाद खिलाडी पहले बिंदु को छूने के लिए दौड़ता है ताकि दूसरे खिलाडी के गिल्ली लाने से पहले वह पहुंच सके।

पोशम्पा

फोटो: न्यूज़ १८

इस खेल में दो लोग अपने सिर से ऊपर कर एक-दूसरे का हाथ पकड़कर खड़े होते हैं। साथ में वे एक गाना भी गाते हैं। बाकी सभी बच्चे उनके हाथों के नीचे से निकलते हैं। गाना खत्म होने पर दोनों अपने हाथ नीचे करते है और जो भी बच्चा उसमे फंसता है वह खेल से आउट हो जाता है।

चौपड़/पचीसी

फोटो: पचीसी

इसमें सभी खिलाडियों को अपने विरोधी से पहले अपनी चारों गोटियों को बोर्ड के चारों और घुमाकर वापिस अपने स्थान पर लाना होता है। चारों गोटियां चौकरनी से शुरू होकर चौकरनी पर खत्म होती हैं।

किठ-किठ

फोटो: पिनटेरेस्ट

इस खेल घर के अंदर, बाहर और गली में खेला जा सकता है। आपको बस एक चौक से जमीन पर रेक्टैंगल डिब्बे बनाने हैं और उनमें नंबर लिखने होते हैं। हर एक खिलाडी बाहर से एक पत्थर एक डिब्बे में फेंकता है और फिर किसी भी डिब्बे की लाइन को छुए बिना एक पैर पर (लंगड़ी टांग) उस पत्थर को बाहर लाता है।

इस खेल को कई और नामों से भी जाना जाता है, जैसे की कुंटे, खाने आदि।

धोपकेल

फोटो: ट्विटर

असम का यह लोकप्रिय खेल धोपकेल कबड्डी के जैसे खेला जाता है। धोप एक रबड़ की बॉल को कहते हैं। मैदान में एक लाइन बनाकर, उस लाइन के दोनों तरफ टीमें खड़ी होती हैं। हर एक टीम का खिलाडी विरोधी टीम के पाले में जाता है और धोप को कैच करके वापिस अपने पाले में लाने की कोशिश करता है। जिसे उसकी टीम दूसरे पाले में फेंकती है।

पलांगुली

फोटो: वर्डप्रेस

इस बोर्ड गेम में 14 कप होते हैं। हर एक कप में छह बीज रखे जाते हैं। खिलाड़ी इन बीजों को अन्य कपों में तब तक वितरित करते हैं जब तक कि सारे बीज खत्म न हो जाएँ। वह व्यक्ति जो बीज के बिना लगातार दो कप तक पहुंचता है उसे खेल से बाहर निकलना पड़ता है।


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Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

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