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ठाणे के इस स्टार्टअप ने बनाया खाने वाला स्ट्रॉ, जानिए कैसे!

ठाणे के इस स्टार्टअप ने बनाया खाने वाला स्ट्रॉ, जानिए कैसे!

प्लास्टिक की वजह से हमारा पूरा पारिस्थिकी तंत्र, धरती, जल और पर्यावरण बुरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं। इन्हीं चिन्ताओं को देखते हुए, आईआईटी गुवाहाटी से केमिकल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएट शशांक गुप्ता ने अपने साथियों के साथ मिलकर एडिबल स्ट्रॉ को बनाने का फैसला किया।

आज हम अपने जीवन में प्लास्टिक के खतरों से अनभिज्ञ नहीं हैं। प्लास्टिक की वजह से हमारा पूरा पारिस्थिकी तंत्र, धरती, जल और पर्यावरण बुरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं। दुनिया में हर साल 8 मिलियन मीट्रिक टन प्लास्टिक समुद्र में मिल रहा है।

प्लास्टिक एक ऐसा पदार्थ है जिसे आसानी से बनाया और मनचाहे रूप में ढाला जा सकता है। यह सस्ता और पानी में न गलने वाला होता है। लेकिन, इसकी यही विशेषताएँ आज हमारे लिए एक अभिशाप बन गई है।

और, यह तय है कि यदि हम इस खतरे से निपटने के लिए अभी भी गंभीर नहीं हुए, तो प्लास्टिक हमारे अंत की एक बड़ी वजह बन सकता है!

इन्हीं खतरों को देखते हुए, आज कई रेस्तरां सस्टेनेबल पहलुओं पर विचार करते हुए अपने व्यवहारों में पेपर, बाँस, नारियल के पत्तों और मेटल स्ट्रॉ को शामिल कर रहे हैं।

लेकिन, ठाणे की एक स्टार्टअप ‘नोम’ ने एक ऐसे एडिबल स्ट्रॉ को पेश किया है, जिसे पेय पदार्थों को पीने में इस्तेमाल करने के बाद, खाया भी जा सकता है।

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शशांक गुप्ता

“इस स्ट्रॉ को 15 अलग-अलग प्रकार के सामग्रियों का इस्तेमाल करते हुए बनाया गया है। जैसे, इसमें गेहूँ के आटे, चावल के आटे, प्राकृतिक स्टेविया, कोको पाउडर, वेजिटेबल ऑयल के साथ ही, एफएसएसएआई द्वारा स्वीकृत एडिटिव्स और बाइंडर्स, आदि इस्तेमाल किए गए हैं। हमने इसे प्लास्टिक स्ट्रॉ के एक स्थायी विकल्प के तौर पर लॉन्च किया है,” कंपनी के सह-संस्थापक और आईआईटी गुवाहाटी से केमिकल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएट शशांक गुप्ता कहते हैं।

कैसे मिली प्रेरणा

शशांक ने नोम की स्थापना साल 2018 में अपने साथी सिमरन राजपूत के साथ मिलकर किया। उस वक्त उनका इरादा सस्टेनेबल कटलरी को पेश करने का था। लेकिन, थोड़ा मार्केट रिसर्च करने के बाद, उन्हें एहसास हुआ कि सभी उपभोक्ताओं को स्थाई विकल्प की तलाश नहीं है।

शशांक कहते हैं, “इसी को ध्यान में रखते हुए, हमने साल 2018 में एडिबल कप को लॉन्च किया। लेकिन, काफी नाजुक होने के कारण इसके उपयोग सीमित थे। इसलिए, हमने इसका उत्पादन बंद कर दिया और, स्ट्रॉ बनाने का फैसला किया।”

इसकी प्रेरणा उन्हें आइसक्रीम खाने के साथ, बिस्कुट कोन खाने से मिली कि क्यों न एक ऐसा स्ट्रॉ बनाया जाए, जिसे मिल्कशेक को पीने के बाद खाया जा सके।

बिस्कुट के स्वाद में स्ट्रॉ

शुरुआती दिनों में, इस जोड़ी ने समुद्री शैवाल के जरिए स्ट्रॉ बनाने का प्रयास किया, लेकिन यह पूरी तरह व्यर्थ रहा। क्योंकि, इसके लिए उन्हें कच्चे माल का आयात करना पड़ता था और उत्पादन में लागत अधिक आ रही थी। इसके बाद, उन्होंने रसोई के सामग्रियों का इस्तेमाल कर स्ट्रॉ बनाने का फैसला किया।

इसे लेकर शशांक कहते हैं, “स्ट्रॉ को समुचित तरीके से बनाने के लिए हमने एक साल तक आर एंड डी किया। क्योंकि, हमें यह सुनिश्चित करना था कि बिस्कुट के स्वाद में हमारा स्ट्रॉ, गर्म या ठंडे पेय पदार्थ में गले नहीं। इसके लिए हमने एक मोस्चर मोलेकुल मूवमेंट को प्रतिबंधित करने के लिए एक समाधान तैयार किया।”

वह बताते हैं कि उनके इस उत्पाद का पेटेंट अभी लंबित है और इस स्ट्रॉ को गर्म पेय पदार्थों में गलने में कम से कम 20 मिनट और ठंडे में 30 मिनट लगते हैं।

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शशांक का यह स्ट्रॉ तीन आकारों (6 मिमी, 8 मिमी और 12 मिमी) और छह अलग-अलग स्वादों जैसे वेनिला, स्ट्रॉबेरी, चॉकलेट, नींबू, पुदीना और कॉफी में उपलब्ध है। फिलहाल, उनके इस उत्पाद को भारत के 10 रेस्तरां द्वारा इस्तेमाल में लाया जा रहा है। साथ ही, रूस, फ्रांस और थाईलैंड जैसे देशों में भी वितरित किए जा रहे हैं।

प्रोडक्ट एक्सपीरियंस को लेकर, फ्लैग्स, जो कि मुंबई के मलाड के एक रेस्तरां है, के मैनेजर आशीष पावले कहते हैं कि ग्राहक एक ऐसे स्ट्रॉ का खूब आनंद लेते हैं, जिसे पेय पदार्थों को पीने में इस्तेमाल करने के साथ-साथ खाया भी जा सकता है।

“हम मोजिटो ड्रिंक के साथ मिन्ट फ्लेवर पेश करते हैं। ग्राहकों को यह पसंद है। अभी तक, हम 300 से अधिक स्ट्रॉ का इस्तेमाल कर चुके हैं और कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है। कुछ ग्राहक अतिरिक्त स्ट्रॉ का अनुरोध करते हैं और इसका आनंद एक स्नैक्स की तरह लेते हैं।  इसके अलावा, चूंकि फ्लेवर्ड है, तो यह ड्रिंक्स के स्वाद को भी बढ़ाता है,” आशीष कहते हैं।

यदि आप शशांक के उत्पादों के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं तो उनके वेबसाइट या अमेजन पर क्लिक कर सकते हैं।

मूल लेख – ROSHINI MUTHUKUMAR

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संपादन: जी. एन. झा

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कुमार देवांशु देव

राजनीतिक और सामाजिक मामलों में गहरी रुचि रखनेवाले देवांशु, शोध और हिन्दी लेखन में दक्ष हैं। इसके अलावा, उन्हें घूमने-फिरने का भी काफी शौक है।
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