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Gardening in UP

उत्तर प्रदेश: टीचर की नौकरी छोड़ बने किसान, कैक्टस- नींबू की बागवानी कर कमा रहे 5 लाख रुपए

उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिला के बवाइन गाँव के रहने वाले रविंद्र प्रताप सिंह ने 2006 में शिक्षक की नौकरी शुरू की थी लेकिन 2017 में उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और बागवानी की शुरुआत कर दी।

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सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए मेहनत करते लोग तो आपने खूब देखे होंगे, लेकिन आज हम आपको एक ऐसे शख्स से मिलवा रहे हैं, जिन्होंने खेती-बागवानी के लिए शिक्षा विभाग की सरकारी नौकरी छोड़ दी और आज केवल कैक्टस, नींबू और आंवला की खेती से 5 लाख रूपये सालाना कमा रहे हैं। यह शख्स हैं उत्तर प्रदेश के रविंद्र प्रताप सिंह।

फिरोजाबाद जिला के खैरगढ़ ब्लॉक स्थित बवाइन गाँव के रविंद्र ने 2006 में बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक की नौकरी शुरू की थी लेकिन 2017 में उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और बागवानी की शुरूआत कर दी।

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रविंद्र प्रताप सिंह

उन्होंने 10 हजार स्कावयर फीट में बगीचा तैयार किया है, जिसका नाम ग्रीन म्यूजियम रखा है। इसमें फल, फूल से लेकर औषधीय पौधे उगाए जाते हैं। इस गार्डन की सबसे खास चीज है कैक्टस। यहाँ आपको कैक्टस की अलग-अलग प्रजाति के पौधे मिल जाएंगे।

रविंद्र ने गार्डन में खास तौर पर सीरियस पेरूविआनस, इचनोफेसिस, हावर्थिया कैक्टस जिबरा, फेयरी कैसल, बॉल कैक्टस आदि समेत कैक्टस की एक हजार के करीब प्रजातियां उगाई हैं। इसमें हंगरी और हांगकांग से मंगाए गए पौधे भी हैं। वह स्टेपेलिया, हरनिया, आरबिया, अगेव, एलोवेरा जैसे कैक्टस की ही बिक्री से करीब 2.5 लाख रूपये सालाना कमाई कर रहे हैं।

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रविन्द्र का बगीचा

रविंद्र ने द बेटर इंडिया को बताया, “बहुत सारे लोगों को लगता है कि कैक्टस किसी काम का नहीं। जबकि कैक्टस के कई मेडिसिनल गुण हैं। मसलन यह शक्तिवर्धक दवाओं के साथ ही डायबिटीज समेत कई रोगों की दवा बनाने में इस्तेमाल होता है। लिहाजा, इसकी बाजार में अच्छी मांग है। इसकी एलोवेरा प्रजाति चेहरे की चमक बढ़ाने, मुलायम त्वचा पाने, रक्त संचार और पाचन दुरूस्त करने में सहायक है। यह बहुत कम पानी का पौधा है।”

वह आगे बताते हैं, “दुर्गम इलाकों में खेती को जंगली जानवरों सुअर, बंदर नीलगाय आदि से बचाने के लिए खेतों के चारों ओर कैक्टस लगा दिया जाता है। बाजार में डेकोरेटिव कैक्टस की सबसे अधिक मांग होती है। रेनबो और बॉल कैक्टस को लोग घर में लगाना पसंद करते हैं।

रविंद्र के पिता को भी बागवानी का बेहद शौक है। वह पहले सेना में थे और रिटायरमेंट के बाद गार्डनिंग करने लगे।

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रविन्द्र के बगीचे में लगा कैक्टस

रविंद्र कहते हैं, पिताजी को देखकर ही मेरे भीतर भी बागवानी का शौक  जाग गया। 2016 से बागवानी कर रहा हूँ। मैंने एवोकैडो, अंजीर, लौंग इलायची तक उगाया है। मेरे बगीचे में आम, अमरूद, चीकू, जामुन के 40 पेड़ हैं। हाल ही में सेब का पौधा भी लगाया है। फूल और फल के पौधे के अलावा करीब 20 तरह के औषधीय पौधे भी लगाए हैं, जिसमें गुड़मार, ब्राह्मी, भृंगराज, स्टीविया, इंसुलिन आदि शामिल हैं।

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रविंद्र एक एकड़ में नींबू और आंवला की भी खेती कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि नींबू और आंवला की खेती बेहद आसान है क्योंकि इन दोनों फसलों में नुकसान कम होता है। रविंद्र नींबू और आंवले से भी 2.5 लाख रूपये सालाना कमा लेते हैं। वह बताते हैं कि नींबू और आंवला में विटामिन सी भरपूर होता है और इससे इम्युनिटी बेहतर होती है। यही वजह है कि कोरोना महामारी के दौर में इन फलों की बिक्री अधिक हुई है।

इन दिनों वह लोगों को गार्डनिंग के टिप्स भी दे रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया है, जिसका नाम होमगार्डन है। आज उनके चैनल के 1.31 मिलियन सब्सक्राइबर हैं।

रविन्द्र के खेत में लगे सूरजमुखी के पौधे

उन्होंने बताया, मेरी कोशिश रहती है कि सरल तरीके से घर पर ही लोगों को लाभदायक पौधे उगाने की जानकारी दी जाए। ज्यादातर ऐसे ही पौधों के बारे में जानकारी देता हूँ, जिन्हें गमले में या छोटी सी जगह में भी आसानी से लगाया जा सके, ताकि आम आदमी की मदद हो सके।

रविंद्र कहते हैं कि स्कूलों में बच्चों को बागवानी के बारे में पढ़ाए जाने की जरूरत है। वह कहते हैं, यदि आप स्कूलों का दौरा करेंगे तो आप पाएंगे कि ज्यादातर सरकारी स्कूलों में विज्ञान प्रयोगशालाएं हैं, लेकिन कृषि प्रयोगशालाएं या उद्यान नहीं हैं। मैं सरकारी स्कूलों के बच्चों को अपने गार्डन का विजिट कराता हूँ, ताकि वह पेड़, पौधों के बारे में जान सकें। उन्हें पहचान सकें और उनके उपयोग के बारे में जान सकें। इनमें दिलचस्पी उनके भीतर पर्यावरण के प्रति लगाव पैदा करेगी। मेरी कोशिश रहती है कि मैं सरल शब्दों में लोगों को बागवानी की बारीक से बारीक जानकारी दे सकूँ।”

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अपने बगीचे में रविन्द्र

वह अंत में कहते हैं, “इसके अलावा यूट्यूब के जरिए भी लोगों को बागवानी के बारे में बताने की कोशिश जारी है। मैं हर किसी से यह कहता हूँ कि खेती हो या फिर बागवानी, यह धैर्य का काम है। इसमें रातों-रात कुछ नहीं होता। कई बार मनमाफिक नतीजा भी नहीं निकलता। ऐसे में धैर्य रखना बेहद जरूरी होता है।

(रविंद्र प्रताप सिंह से 9897223344 पर संपर्क किया जा सकता है।)

यह भी पढ़ें – बेंगलुरु: रिटायरमेंट के बाद शुरू की बागवानी, अब छत पर हैं 200 से अधिक पेड़-पौधे
संपादन – जी एन झा

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