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हरियाणा: अपने घर में मिलिट्री मशरूम की खेती कर लाखों कमाता है यह किसान

हरियाणा: अपने घर में मिलिट्री मशरूम की खेती कर लाखों कमाता है यह किसान

विनोद ने इंटरनेट से मिलिट्री मशरूम की खेती के तरीके को सीख कर, अपने एक 15×15 के कमरे को लैब में बदल दिया और करीब 1 लाख रुपए से सभी संसाधनों को जुटा कर, इसकी खेती शुरू कर दी।

हरियाणा के गुरुग्राम जिला के जमालपुर में रहने वाले विनोद यादव को बदलते मौसम के कारण एलर्जी हो जाती थी, इसी सिलसिले में विनोद के एक दोस्त ने उन्हें मिलिट्री मशरूम का सेवन करने की सलाह दी। अपने दोस्त के इस सलाह को मानते हुए विनोद ने तुरंत इसका इस्तेमाल किया।

कुछ ही दिनों में विनोद को इसके काफी बेहतर परिणाम देखते को मिले और इससे उत्साहित होकर उन्होंने खुद ही मिलिट्री मशरूम की खेती शुरू कर दी।

विनोद ने द बेटर इंडिया को बताया, “मुझे अस्थमा का लक्षण था और बदलते मौसम में काफी परेशानी होती थी। मैंने काफी इलाज कराया, लेकिन कारगर परिणाम देखने को नहीं मिल रहे थे। इसी सिलसिले में, 2019 के शुरूआती दिनों में, मेरे एक दोस्त ने मुझे मिलिट्री मशरूम, जिसे स्थानीय भाषा में कीड़ा जड़ी भी कहा जाता है, को खाने की सलाह दी। मैंने इसका तुरंत इस्तेमाल किया और कुछ ही समय में मुझे काफी राहत मिली।”

Haryana Farmer
विनोद यादव

वह आगे बताते हैं, “मिलिट्री मशरूम, हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है और चीन, भूटान, तिब्बत, थाईलैंड जैसे देशों में इसकी काफी खेती होती है। यह एक औषधीय उत्पाद है और इसके असर से मैं काफी प्रभावित था। फलतः मैंने व्यावसायिक उद्देश्यों से मिलिट्री मशरूम को उगाने का फैसला किया।”

इसके बाद, विनोद ने इंटरनेट से मिलिट्री मशरूम की खेती के तरीके को सीख कर, अपने एक 15×15 के कमरे को लैब में बदल दिया और करीब 1 लाख रुपए से सभी संसाधनों को जुटा कर, इसकी खेती शुरू कर दी। 

शुरूआती दिनों में वह आधा किलो मशरूम उगाते थे, लेकिन धीरे-धीरे उनका दायरा बढ़ने लगा और आज वह हर तीन महीने में 1.5-2 किलो का उत्पादन करते हैं, जो बाजार में 2-3 लाख रुपए प्रति किलो बिकता है। इस तरह, उन्हें हर महीने 70-80 हजार रुपए की बचत होती है।

कैसे करते हैं उत्पादन

विनोद बताते हैं, “मिलिट्री मशरूम को उगाने के लिए ऑटो क्ले, लेमिनार फ्लो, रोटरी शैकर जैसे उपकरणों की जरूरत पड़ती है। जिसे मैंने स्थानीय बाजार से खरीदा। वहीं, मैंने इसके लिक्विड कल्चर मीडिया को उत्तर प्रदेश से मंगाया।”

वह बताते हैं, “सबसे पहले प्लास्टिक या काँच के जार, ब्राउन राइस, आदि को ऑटो क्ले में 122 डिग्री ताप बैक्टीरिया फ्री किया जाता है। फिर, आलू के पल्प को उबाल कर इसे फिल्टर करने के बाद इसमें एस्ट्रोड, पैक्टॉन जैसे पोषक तत्व मिलाए जाते हैं। इसके बाद, 40 मिलीलीटर ब्राउन राइस, 40 मिलीलीटर लिक्विड कल्चर डाला जाता है।”

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750 मिलीलीटर के एक जार में तैयार होता है 5-7 ग्राम मशरूम

इसके बाद, लैब में बॉक्स को 7 दिनों के लिए पूरी तरह से अंधेरे में रखा जाता है। मिलिट्री मशरूम को तैयार होने में करीब 110 दिन लगते हैं और इस पूरी प्रक्रिया में कमरे का तापमान 18-22 डिग्री रहनी चाहिए। उत्पाद तैयार होने के बाद, इसे डिहाइड्रेटर में ड्राय किया जाता है।

विनोद बताते हैं, “एक बोतल में करीब 5-7 ग्राम सूखा मशरूम तैयार होता है और सामान्य ताप पर इसकी आयु 3-4 वर्ष होती है। यही कारण है कि इसका उत्पादन करने में ज्यादा जोखिम नहीं है।”

कैसे करते हैं इस्तेमाल

विनोद बताते हैं कि हर दिन करीब 1 ग्राम मिलिट्री मशरूम का सेवन पर्याप्त है। इसे हर दिन सुबह में खाना चाहिए, लेकिन इसे खाने से पहले इसे एक कप गर्म पानी में भिगोना चाहिए, ताकि यह पूरी तरह स्वच्छ हो। इसे मधु के साथ भी खाया जा सकता है।

कैसे करते हैं मार्केटिंग

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मिलिट्री मशरूम

विनोद ने अपने उत्पाद को शुरूआती दिनों में अपने दोस्तों को बेचने के अलावा, आस-पास के कुछ जीम को भी बेचा। धीरे-धीरे उनका दायरा बढ़ता गया। आज उनके मिलिट्री मशरूम की आपूर्ति दिल्ली और हैदराबाद में भी हो रही है। अपने उत्पाद को बढ़ावा देने के लिए वह वाट्सएप का भरपूर इस्तेमाल करते हैं।

क्या है भविष्य की योजना

विनोद बताते हैं, “कोरोना महामारी के कारण लोगों का ध्यान मिलिट्री मशरूम की ओर बढ़ा है। इस वजह से आगामी कुछ वर्षों में इसको लेकर काफी संभावनाएं हैं। मेरी योजना इसे एक ब्रांड का रूप देना है।”

मोती की खेती से भी कमाते हैं लाखों

प्रतीकात्मक फोटो, चित्र स्त्रोत – Pearlsworth

विनोद एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी छोड़, साल 2016 से मोती की खेती से जुड़े हुए हैं। वह हर साल करीब 7-8 हजार मोती का उत्पादन करते हैं, जिससे उन्हें करीब 7 लाख रुपए की कमाई होती है। उनका उत्पाद देश के हर हिस्से में पहुँचता है।

आप विनोद से 9050555757 पर संपर्क कर सकते हैं।

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संपादन – जी.एन झा

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कुमार देवांशु देव

राजनीतिक और सामाजिक मामलों में गहरी रुचि रखनेवाले देवांशु, शोध और हिन्दी लेखन में दक्ष हैं। इसके अलावा, उन्हें घूमने-फिरने का भी काफी शौक है।
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