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75 वर्षीया नानी के हुनर को नातिन ने दी पहचान, शुरू किया स्टार्टअप

दिल्ली की कृतिका सोंधी ने अपनी नानी के टैलेंट को एक पहचान देने के लिए स्टार्टअप की शुरुआत की थी लेकिन जैसे-जैसे ऑर्डर्स बढे, उनके साथ और 14 बुनाई करने वाले लोग जुड़ गए हैं!

हम सभी ने अपने-अपने घरों में दादी-नानी और माँ को कभी न कभी तो सिलाई-कढ़ाई और बुनाई करते देखा ही होगा। सिलाई-कढ़ाई के बाद अगर हमारे यहाँ किसी चीज़ का शौक है तो वह है बुनाई का। अपने हाथों से अपने घर-परिवार के लोगों को गर्म कपड़े बनाकर पहनाने की ख़ुशी कुछ और ही होती है। लेकिन ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो अपने शौक को कमाई का जरिया बना लेते हैं। आज हम आपको ऐसी ही एक कहानी सुनाने जा रहे हैं।

दिल्ली में रहने वाली कृतिका सोंधी ने भी अपनी नानी के बनाए गर्म कपड़े पहने हैं। यहाँ तक कि अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वह अपनी नानी के साथ कुछ दिन रहीं तो उन्होंने देखा कि उनकी नानी 72 वर्ष की उम्र में भी घंटों तक बुनाई करतीं हैं। कृतिका ने द बेटर इंडिया को बताया कि वह अपने नाना-नानी से बहुत ही लगाव और स्नेह रखतीं हैं।

उन्होंने कहा, “लगभग 3 साल पहले मेरी जिंदगी में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था। वह चुनौती भरा समय था। ऐसे वक्त में मैं नानी के पास आ गई। नानी के साथ रहते हुए अलग-अलग जगहों में नौकरी के लिए अप्लाई कर रही थी। मैं अक्सर नानी को बुनाई करते देखती थी और इस तरह मुझे भी यह सीखने का मन कर गया।”

नानी ने ख़ुशी-ख़ुशी उन्हें सिखाया। कृतिका कहतीं हैं कि बुनाई सिर्फ गर्म कपड़े बुनने का ही काम नहीं है बल्कि यह कला उनके लिए अपनी उदासी से बाहर आने का ज़रिया बनी। वह बहुत खुश थीं लेकिन इसके साथ ही उन्हें अहसास हुआ कि उनकी नानी के इस टैलेंट की कोई पहचान नहीं है।

Granddaughter
Asha Puri and Her Granddaughter, Kritika Sodhi

“नानी हमेशा सबके लिए कुछ न कुछ बनातीं रहतीं हैं। लेकिन इतनी मेहनत और इतने खूबसूरत कपड़े बनाने के बाद भी उनका कोई नाम-पहचान नहीं। इसलिए मुझे लगा कि नानी के इस टैलेंट को एक पहचान मिलनी चाहिए,” उन्होंने कहा।

उन्होंने नानी को अपना प्लान बताया, लेकिन उनकी नानी, आशा पुरी को यह आइडिया जमा नहीं। नानी को भी यही लगा कि अब इस उम्र में वह क्या करेंगी यह सब करके। लेकिन कृतिका, आशा के पीछे पड़ी रही और आखिरकार अपनी कृतिका की जिद के आगे आशा हार गईं। इस तरह से लगभग तीन साल पहले कृतिका ने अपनी नानी के हाथ से बनाए गर्म कपड़ों को एक पहचान देने के लिए ‘विद लव, फ्रॉम ग्रैनी’ के नाम से पहल शुरू की।

लेकिन यह स्टार्टअप शुरू करने के चंद दिनों बाद ही कृतिका को एक अच्छी जॉब मिल गई और आशा को भी अपने बेटे के पास अमेरिका जाना पड़ा। उनका यह आइडिया उस वक़्त वहीं रुक गया। आशा ने सोचा था कि बिज़नेस की बात शायद वहीं खत्म हो गई। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था क्योंकि इस साल, लॉकडाउन के दौरान कृतिका और उन्हें एक बार फिर मौका मिला इस आईडिया को आगे लेकर जाने का।

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वह बतातीं हैं कि कृतिका का अपनी कंपनी के साथ कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो गया था। इसके बाद उन्होंने दूसरी कंपनी में ट्राई किया, लेकिन लॉकडाउन और कोरोना की वजह से उन्हें कोई अच्छी जॉब नहीं मिल पा रही थी। इस दौरान आशा भी दिल्ली में ही रह रहीं थीं और ऐसे में, कृतिका ने एक बार फिर ‘विद लव, फ्रॉम ग्रैनी’ को लॉन्च किया। आशा ने भी उनका साथ दिया और इस तरह से एक बार फिर शुरू हुआ आशा और कृतिका का एक नया सफर।

लेकिन इस बार कृतिका की माँ, नीरू ने भी उनका साथ दिया और उन्होंने इसे फुल-टाइम चलाने की ठानी। शुरू में एक-दो ऑर्डर्स से शुरू हुई उनकी कहानी आज महीने में 100 से भी ज्यादा ऑर्डर्स तक पहुँच चुकी है। सबसे अच्छी बात यह है कि उनके इस स्टार्टअप से और 14 लोग जुड़ चुके हैं। ये सभी 14 लोग दिल्ली के रहने वाले हैं। कोई अपने घर में आर्थिक मदद के लिए उनके साथ जुड़ा है तो कोई अपने शौक को आगे ले जाने के लिए।

आशा कहतीं हैं, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं ऐसा कुछ करुँगी। लेकिन अब जब मैं यह कर रहीं हूँ तो लगता है कि मुझे यह बहुत पहले ही शुरू कर देना चाहिए था।” सुबह अपने सभी काम निबटाकर वह पर काम करने बैठ जातीं हैं। “पहले तो मैं बुनाई में जितना चाहे उतना वक़्त ले लेती थी लेकिन अब यह बिज़नेस है। अब एक निश्चित समय में हमें काम करना होता है और इसलिए एक शेड्यूल बनाना होता है। कृतिका को तो मैं अभी भी ट्रेनिंग दे रही हूँ,” उन्होंने आगे बताया।

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कृतिका और आशा के ऑर्डर जब बढ़ने लगे तो उन्हें लगा कि उन्हें एक टीम भी चाहिए। इस तरह से उन्होंने धीरे-धीरे और लोगों से जुड़ना शुरू किया। फ़िलहाल, आशा की ही तरह और 7 बुजुर्ग महिलाएं उनके स्टार्टअप के साथ बुनाई कर रहीं हैं और अपने हाथों से लोगों के लिए कपड़ों के रूप में प्यार की गर्माहट पहुँचा रही हैं। बाकी महिलाएं गृहिणियां हैं और उनके साथ एक आदमी भी है। ये सभी लोग बुनाई के साथ-साथ क्रोशिया भी करते हैं। कृतिका कहतीं हैं कि उनके बनाए डिज़ाइन में स्टैण्डर्ड मेन्टेन रहे इसलिए आशा ने ही सबको शुरूआती ट्रेनिंग दी है। बाकी वह जिस तरह से ऑर्डर्स मिलते हैं, वैसे काम कर रहे हैं।

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उनके साथ जुड़े मेल मेम्बर पेशे से डेंटिस्ट हैं जो क्रोशिया सिर्फ अपने पैशन के लिए करते हैं। द बेटर इंडिया को उन्होंने बताया, “मैंने क्रोशिया करना सिर्फ अपने भांजे के लिए शुरू किया। मैं उसके लिए कुछ अच्छा और स्पेशल बनाना चाहता था ताकि उसे अपने मामा की हमेशा याद रहे। उसके लिए ही मैंने क्रोशिया किया और अब मैं इस प्लेटफार्म से जुड़ गया हूँ।”

आशा और कृतिका के इस स्टार्टअप ने कई लोगों को आय का भी एक ज़रिया दिया है। आगे उनकी योजना भी यही है कि वह ज्यादा से ज्यादा ज़रूरतमंद लोगों से जुड़े। ऐसे लोग जिन्हें वह ट्रेनिंग दें और फिर काम भी। अपने इस प्रोजेक्ट के लिए वह कुछ सामाजिक संगठनों से भी बातचीत कर रहीं हैं।

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With Love, From Granny

कृतिका ने इस सफर में मुश्किलें भी झेली हैं। अक्सर बुनाई जैसे हुनर को घरेलू नाम देकर गृहणियों और दादी-नानी के साथ जोड़ दिया जाता है। कृतिका को बहुत बार सुनने के मिला है कि क्या दादी वाले काम कर रहे हैं। लेकिन उनका लक्ष्य स्पष्ट है, एक तो अपनी नानी के जैसे अन्य दादी-नानी को उनके इस टैलेंट के ज़रिए पहचान दिलाना और ज़रुरतमंदों को ट्रेनिंग देकर आय का एक साधन देना। अच्छी क्वालिटी के बने गर्म कपड़े सालों तक चलते हैं। हर भारतीय के घर में यह कला बसती है तो क्यों न इसे आगे बढ़ाकर एक प्रोफेशनल स्तर दिया जाए।

कृतिका की यह सोच बुजुर्गों के लिए भी काफी मददगार साबित हो रही है। उनके साथ जुडी 70 वर्षीय चंचल अरोड़ा कहतीं हैं कि एक दशक से भी ज्यादा समय तक उन्होंने अपने घर में बच्चों को गर्म कपड़े पहनाये हैं। बढ़ते वक़्त के साथ यह हुनर कहीं खोने लगा था। लेकिन जब आशा और कृतिका ने उनसे संपर्क किया तो मानो उनकी ज़िंदगी की एक और पारी शुरू हो गई हो।

62 वर्षीया रेखा गुप्ता भी कुछ ऐसा ही कहना है। वह बतातीं हैं कि वह पिछले 30 सालों से अपने बच्चों और परिवार के लिए हाथ से गर्म कपड़े, मोज़े आदि बना रहीं हैं। वह हमेशा ऐसा कोई प्लेटफार्म चाहतीं थीं जहाँ वह अपने इस हुनर को दिखा सकें। उनके टैलेंट को पहचाना जाए और उनकी कद्र हो। लेकिन इतने सालों बाद उन्हें वह मौका यहाँ मिला। उन्होंने इसे हाथों-हाथ लिया और अब वह बहुत खुश हैं।

“यहाँ मुझे सिर्फ पहचान और सराहना नहीं मिली है बल्कि मैं कुछ कमा भी पा रही हूँ। इससे ज्यादा अच्छा और क्या होगा,” उन्होंने आगे कहा।

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कृतिका कहतीं हैं कि वह सिर्फ महिलाओं को ही नहीं बल्कि हर उम्र के लोगों को इससे जोड़ना चाहतीं हैं। अगर किसी में क्रोशिया और बुनाई करने का हुनर है और उन्हें अपने हुनर को दिखाने के लिए एक प्लेटफार्म चाहिए तो उन्हें उनकी मदद करके बहुत ही ख़ुशी होगी। फ़िलहाल, उनकी कोशिश अपने प्रोडक्ट्स को बाहर ऐसे देशों में एक्सपोर्ट करने की है, जहाँ सालभर ठंड रहती है और लोग लगातार गर्म कपड़े खरीदते हैं। इससे सालभर उनकी टीम को काम मिलता रहेगा।

और अंत में आशा सिर्फ यही कहतीं हैं, “लोग आज भी हाथों से बने हुए गर्म कपड़े पहनना पसंद करते हैं और वह भी दादी-नानी के हाथों से बने हुए। लेकिन कहीं न कहीं वक़्त के साथ इस चीजों के प्रति जागरूकता कम हो गई है। लोग नौकरियों में व्यस्त हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि बुनाई-कढ़ाई से काम थोड़े ही चलेगा? लेकिन अगर किसी भी काम को सही दिशा दी जाए तो वह चल सकता है। इसलिए हर किसी को ये हुनर सीखने चाहिएं। भले ही वह कुछ बनाएं या फिर नहीं लेकिन स्किल सिखने में कोई बुराई नहीं है।”

अगर आप कृतिका से संपर्क करना चाहते हैं और उनके बनाए प्रोडक्ट्स देखना चाहते हैं तो उनके इंस्टाग्राम अकाउंट को फॉलो कर सकते हैं।

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संपादन – जी. एन झा


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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