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जब पाकिस्तानी सेना पर भारी पड़ा भारतीय सेना का यह रबाड़ी जासूस!

फोटो: केनफोलिओस.कॉम

16 दिसंबर, 1971 को, भारतीय फौज ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ एक निर्णायक युद्ध जीता था। अपने देश की रक्षा करने के लिए कई साहसी सैनिकों ने अपनी जान दे दी।

तब से लेकर आज लगभग 47 साल हो गए, लेकिन इन बहादुर सैनिकों के साहस और योगदान की स्मृतियाँ अभी भी देशवासियों के दिलों में है। हालांकि, कुछ लोगों को ही बानसकंठा के राबड़ीयों के बारे में पता है, जिनके अनूठे कौशल ने सिर्फ साल 1971 के युद्ध के दौरान ही नहीं बल्कि साल 1965 में भी भारतीय सेना को दुश्मन सैनिकों और प्रमुख कस्बों पर कब्जा करने में मदद की।

तो आज जानिए गुजरात के रणछोड़ पागी के बारे में, जिनके अद्वितीय कौशल ने दो भारत-पाक युद्धों के दौरान हजारों भारतीयों के जीवन को बचाया।

फोटो स्त्रोत

साल 1965

गुजरात में थार रेगिस्तान में कच्छ के रन में अप्रैल से पाकिस्तानी घुसपैठ के बाद शत्रुता शुरू हो रही थीं। अगस्त तक, भारत-पाक सीमा, युद्ध के मैदान में बदल गई थी।

जब युद्ध शुरू हुआ तो, बानसकंठा के लिंबला गांव में ऊंट और मवेशी पालनेवाले रबाड़ी समुदाय के रणछोड़ पागी स्थानीय पुलिस की गाइड के रूप में सहायता कर रहे थे। बाद में उन्हें भारतीय सेना के जासूस के तौर पर भर्ती किया गया।

कारण था, उनकी असाधारण बुद्धिमकता और कौशल। दरअसल, प्रकृति और पशुधन के साथ गहराई से जीवन व्यतीत करने के कारण पागी को इतना ज्ञान हो गया था कि वे केवल पैरों की छाप देखकर सेना की गतिविधियों को भांप लेते थे।

बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसएफ) के जवानों द्वारा स्नेही रूप से ‘ओल्ड वॉर कैमल’ के नाम से जाने जाने वाले पागी भारत-पाक सीमा पर अपने ऊंट पर बैठकर अपनी तेज़ दृष्टि पाकिस्तानी ज़मीन पर गढ़ाते और देखते कि कहीं से पाकिस्तानियों ने भारत में घुसपैठ तो नहीं की।

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पैरों के निशान देखकर जानकारी हासिल करने का उनका हुनर इतना कमाल का था कि इसी के बलबूते पर वे घुसपैठियों की संख्या, उन्होंने कोई सामान लादा हुआ है या नहीं और यहाँ तक कि उनके चलने की गति भी बता देते थे। वे यह भी बता देते थे कि पैरों के निशान बनने के बाद कितना समय बीत चुका है, घुसपैठिये किस दिशा में गए हैं और तो और ये भी कि उन्होंने ज़मीन पर बैठकर बातचीत की या नहीं।

बीएसएफ और भारतीय सेना को दी गई ये जानकारी बेहद महत्वपूर्ण थी। इस प्रकार न केवल उन्होंने भारतियों की जान बचाई बल्कि युद्धनीति बनाने में भी मदद की।

वास्तव में, इस इलाके के बारे में उनके ज्ञान ने भारतीय सैनिकों को 1965 के युद्ध में छारकोट और विद्याकोट के महत्वपूर्ण पोस्टों पर कब्जा करने में भी मदद की। साल 1965 की शुरुआत में, पाकिस्तानी सैनिकों ने कच्छ में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण विद्याकोट सीमा पोस्ट पर कब्जा कर लिया, जिसके बाद हुई लड़ाई में 100 बहादुर भारतीय सैनिकों ने अपनी जान दे दी। पोस्ट छुड़ाने के लिए 10,000 भारतीय सैनिकों की एक टुकड़ी भेजी गई, लेकिन मिशन में सफ़ल होने के लिए यह आवश्यक था कि वे तीन दिनों में (पाकिस्तान के मजबूत होने से पहले) रिमोट पोस्ट पर पहुंचे।

उस वक़्त भारतीय सेना ने अपने सबसे महत्वपूर्ण जासूस को तैनात किया। पागी ने भी बिना अपनी जान की परवाह किये सेना को जंगलों और बीहड़ों में से रास्ता दिखाया। इसके अलावा अंधेरे में भी उन्होंने छिपे हुए 1200 पाकिस्तानी सैनिकों का पता लगाया , जिससे भारतीय सेना की जीत हुई!

साल 1971 में भी युद्ध के दौरान सेना को पाली नगर पोस्ट पर उन्होंने मदद की। खैर दिलचस्प बात यह है कि साल 1971 के युद्ध के बाद सैम मानेकशॉ ने पागी को मिलने के लिए बुलाया। फील्ड मार्शल ने गुजरात से इस स्काउट को लाने के लिए एक हेलीकॉप्टर भेजा, उनके काम की सराहना की, और उन्हें 300 रुपये का इनाम दिया और फिर उनके साथ दोपहर का भोजन करने के लिए बैठ गए।

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पागी ने बाद में आउटलुक को बताया,

“जनरल बहुत अचम्भित हुए, जब भोजन के दौरान मैंने अपने थैले से बाजरो नो रोटलो (बाजरे की रोटी) और एक प्याज़ निकाली। पर मुझे भी आश्चर्य हुआ जब उन्होंने ख़ुशी-खशी मेरे साथ यह खाया।”

साल 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों के दौरान उनके अनुकरणीय काम के लिए पागी को तीन सम्मान – संग्राम पदक, समर सेवा स्टार और पुलिस पदक से भी सम्मानित किया गया था। उनके साथियों द्वारा उन्हें हर साल अपने गांव में स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का भी सम्मान दिया गया।

आने वाले वर्षों तक रबाड़ी ने बीएसएफ और भारतीय सेना के लिए अपनी सेवाएं जारी रखी और वक़्त आने पर अपनी सूझ-बुझ का भी परिचय दिया। उनकी सफलताओं में से एक थी, 1998 में ‘मुशर्रफ’ नाम के ऊंट पर कब्जा, जिसमें 22 किलोग्राम आरडीएक्स था।

एक साल बाद, उन्होंने भगत वेरी के पास 24 किलोग्राम आरडीएक्स के साथ पाकिस्तानी घुसपैठियों को पकड़ा, और हाजीपीर में दबा हुआ 46 किलोग्राम विस्फोटक भी ढूंढ निकाला।

फोटो: क्रांतिदूत

साल 2013 में, आखिरकार सेवानिवृत्त होने के चार साल बाद, पागी का 112 वर्ष की आयु में निधन हो गया। बीएसएफ ने उनके सम्मान में बानसकंठा की चौकियों में से एक चौकी का नाम ‘रणछोड़ चौकी’ रखा। गुजरात पुलिस ने भी एक अनोखे तरीके से उनका सम्मान किया। उन्होंने उनके समुदाय के अन्य जासूसों को ‘पुलिस पागी’ का उपनाम दिया, जो अभी भी गुजरात में 540 किलोमीटर लंबी भारत-पाक सीमा की रक्षा में बीएसएफ की सहायता करते हैं।

( संपादन – मानबी कटोच )

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Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

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