दादी का बनाया खाना लोगों तक पहुँचाने के लिए छोड़ी नौकरी, अब 1.5 करोड़ रुपये है सालाना आय

मुरली गुंडन्ना पेशे से एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। साल 2015 में मुरली ने अपनी नौकरी छोड़ने का फैसला किया। नौकरी छोड़कर वह अपना फूड बिजनेस शुरू करना चाहते थे। 

मुरली ने द बेटर इंडिया को बताया कि वह हमेशा से अपना खुद का काम शुरू करना चाहते थे। नौकरी करते हुए एक दिन वह अपने बॉस के केबिन में गए और उनसे कहा कि वह कल से काम पर नहीं आएंगे। और फिर यहीं से शुरू होती है 23 वर्षीय मुरली के जीवन में बड़े बदलाव कहानी।

2014 में मुरली ने ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वह नौकरी करने लगे। जिस समय फूड बिजनेस से संबंधित स्टार्टअप का विचार उनके मन में आया तब वह जेएसडब्ल्यू ग्रुप के साथ काम कर रहे थे। उस समय को याद करते हुए मुरली बताते हैं कि उन्होंने अपने बॉस को समझाया कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है। 

मुरली कहते हैं, मेरे बॉस ने इसे बहुत ही सकरात्मक तरीके से लिया और उन्होंने मुझे तीन महीने पेड लीव देने की पेशकश की।

उन्होंने सप्ताह में 10 फूड बॉक्स बेचने से शुरूआत की और अब वह एक दिन में हज़ारों फूड बॉक्स बेचते हैं। मुरली इसका श्रेय अपनी दादी और चाची को देते हैं। मुरली के स्टार्टअप की यह कहानी बड़ी दिलचस्प है। 

गैराज से शुरूआत

मुरली गुंडन्ना बताते हैं कि 2015 के अक्टूबर और नवंबर के आसपास, उन्होंने एक बिजनेस प्लान तैयार किया और मैसूरु में अपनी दादी इंदिरम्मा और चाची उषा और संध्या के साथ इस पर चर्चा की। ये सभी उनके साथ जुड़ने के लिए तैयार हो गए।

मुरली कहते हैं, “3 दिसंबर 2015 को, हमने पुलाव, दही चावल, खीर और फल का कटोरा तैयार करने का फैसला किया। मैंने 40 दोस्तों और परिचितों की एक सूची तैयार की। भोजन वितरित करने के लिए, मैंने दो दोस्तों और एक चचेरे भाई से मदद करने का अनुरोध किया।

खाना पकाने के लिए परिवार ने गैराज की जगह का इस्तेमाल करने फैसला किया। उन्होंने अपने दादाजी से दो गैस स्टोव मांगे जिनका उपयोग पिकनिक जाने पर किया जाता था। दादी और चाची ने मिल कर खाना तैयार किया और मुरली ने अपने दोस्तों मंजू, विनय और चचेरे भाई स्कंगा के साथ भोजन बांटा।

फूड बॉक्स की यात्रा के बारे में बात करते हुए मुरली बताते हैं, हम हर किसी के घर बिना बताए गए और मैसूरु के आईटी सेक्टर में काम करने वाले दोस्तों, कॉलेज के जूनियर्स और हेब्बाल औद्योगिक क्षेत्र, जेएल पुरम, केडी रोड, चामुंडीपुरम, श्रीरामपुरा और सिद्धार्थ लेआउट में अन्य लोगों का दरवाज़ा खटखटाया और फूड बॉक्स दिए। मैंने उन्हें बताया कि आज से मैं यह काम शुरु करने जा रहा हूँ और उनसे अनुरोध किया कि वह दूसरे लोगों को भी इस बारे में बताएं।

शुरूआती दिनों में मुरली एक दिन में 15-20 बॉक्स बेचते थे जबकि आज की तारीख में वह एक हफ्ते में 2,000 बॉक्स बेचते हैं।

दोस्तों के बारे में बात करते हुए मुरली कहते हैं, “मेरे दोस्तों ने मुझे हमेशा वही करने के लिए प्रेरित किया जो मैं कर रहा हूँ। मेरे दोस्त आलप ने मुझे अपने जुनून को आगे बढ़ाना सिखाया जबकि यति राज ने वित्तीय संकट और अन्य साधनों से मेरी मदद की। ये दोनों आज भी हर संभव मदद करते हैं।

इस बिजनेस को शुरू हुए पाँच साल हो चुके हैं। अब फूड बॉक्स के साथ 27 पेशेवरों और रसोइयों की एक टीम है। ग्राहकों की संख्या 30 हजार के करीब पहुँच चुकी है।

घर के बने ताजा भोजन का वादा

मुरली बताते हैं, “कारोबार शुरू करने के एक महीने के बाद, इन्फोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति ने भी हम से भोजन मंगवाया। उन्होंने तब से कई अवसरों पर भोजन का ऑर्डर दिया है।

फूड बॉक्स के बारे में विस्तार से बताते हुए मुरली कहते हैं, “हम घर का खाना के लिए ऑनलाइन ऑर्डर लेते हैं। ज़ोमैटो या स्विगी से मंगवाया गए पिज्जा आदि के लिए आपको लगभग 400 रुपये खर्च करने होंगे। लेकिन हम 80 रुपये में पर्याप्त मात्रा में एक समय का भोजन उपलब्ध कराते हैं।

इस युवा उद्यमी को महसूस होता है कि उन्होंने सही लागत और संतुलित पोषण के साथ भोजन की गुणवत्ता को फिर से परिभाषित किया है। फूड बॉक्स के मुताबिक उसके नियमित ग्राहकों में से 30 फीसदी डॉक्टर हैं, और उनमें से अधिकांश रोजाना ऑर्डर करते हैं। मुरली कहते हैं, “हमारे पास दिन में तीनों समय के भोजन का ऑर्डर देने वाले कई ग्राहक हैं। हमारे मेनू में कई तरह के व्यंजन शामिल हैं।

मुरली कहते हैं कि बुधवार और शुक्रवार को  ‘पारंपरिक’ भोजन दिया जाता है जबकि बाकि के दिनों में उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत और चायनीज़ आइटम मेनू में शामिल किए जाते हैं।

एक बिजनेस जिसके लिए शुरूआती हफ्तों के लिए किराने का सामान खरीदने के अलावा कोई निवेश नहीं किया गया था और छह महीने तक जिसका मुनाफा शून्य रहा, अब एक साल में लगभग 1.5 करोड़ रुपये का राजस्व कमाता है।

मुरली कहते हैं कि उनकी सफलता के पीछे का कारण भोजन की गुणवत्ता को बरकरार रखना है। वह कहते हैं, “हम कुछ भी स्टॉक नहीं करते हैं; किराने का सामान रोजाना ऑर्डर किया जाता है और शाम तक प्राप्त किया जाता है। सब्जियां सुबह जल्दी आती हैं और मसाले उसी दिन तैयार किए जाते हैं।

व्यवसाय शुरू होने के लगभग एक साल तक परिवार ने खाना बनाया, लेकिन बढ़ती मांग के साथ, उन्होंने शेफ और पेशेवरों को काम पर रखा।

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मुरली बताते हैं,मार्च में मेरी दादी का निधन हो गया था, लेकिन हमने दादी के उन सभी व्यंजनों की रेसपी लिख कर रखी है, जिनका हर कदम पर पालन किया जाता है।”

गुणवत्ता है कुंजी

मुरली कहते हैं, “ फूड बिजनेस में वर्क फोर्स सबसे महत्वपूर्ण है, इसे बनाए रखना चुनौती है। मैं अपने आसपास के लोगों पर पूरी तरह से भरोसा नहीं कर सकता। मैं खाना पकाने से लेकर बर्तन धोने तक, सब कुछ जानता हूँ क्योंकि मुझे किसी भी समय किसी की जगह काम करना पड़ सकता है और किसी भी संकट के लिए तैयार रहना पड़ता है।

मुरली आगे बताते हैं, “गुणवत्ता बनाए रखना एक और चुनौती है। हर बार भोजन की गुणवत्ता जाँच की जाती है और स्वाद चखा जाता है। यह भी सुनिश्चित करना पड़ता है कि ग्राहक तक गर्म खाना पहुँचे। कई ऐसे ग्राहक भी होते हैं जिन्हें मेनू में शामिल व्यंजनों में से केवल कुछ ही चीज़ें चाहिए होती हैं। ग्राहक की ज़रुरत के अनुसार भोजन को क्सटमाइज करना भी काफी दक्षतापूर्ण काम होता है।

मुरली आगे बताते हैं, “हमने मार्च 2019 में मैसूरु में एक नया आउटलेट शुरू किया। लेकिन कोविड -19 लॉकडाउन के कारण काम पर काफी प्रभाव पड़ा है। अब हमने परिचालन फिर शुरु किया है। इस कठिन वक्त में भी हमारी ऑनलाइन बिक्री में 25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

मुरली कहते हैं कि समय के साथ-साथ वह प्लास्टिक के बॉक्स के बदले एल्युमिनियम फॉयल का उपयोग करने लगे हैं। वह बताते हैं, “मैंने ग्राहकों से अनुरोध किया कि वह इस बदलाव पर सहमत हों क्योंकि इसकी कीमत प्रति पैकेजिंग 16 रुपये है। मैंने उन्हें इसी कीमत पर अधिक भोजन की पेशकश की, और मेरे ग्राहक सहमत हो गए।

चाची के बिना यह नहीं होता संभव

मुरली की चाची उषा अब कंपनी में ऑपरेशन और फाइनेंस की प्रमुख हैं। वह बताते हैं, “मेरी चाची ने बड़ा जोखिम लिया और मुझे समर्थन देने के लिए 18 साल पुरानी नौकरी छोड़ दी।”

इसके बारे में उषा कहती हैं, ” मैंने मैसूरु में अपनी पिछली नौकरी छोड़ दी थी लेकिन मैं खुद को व्यस्त रखना चाहती थी। जब मुरली ने काम शुरू किया, तब मैंने OLA व्यवसाय में शामिल होने की योजना बनाई, हालांकि यह सफल नहीं हुआ।”

उषा बताती हैं कि जब मुरली ने व्यवसाय पर चर्चा की थी, तो वह बहुत ही उलझन में थी क्योंकि यह जोखिम भरा था, लेकिन वह मुरली का मनोबल गिराना नहीं चाहती थी।

वह कहती हैं कि कुछ समय के लिए उन्हें खाना बनाना था लेकिन शुरूआत में जब वह देखती थी कि एक अच्छी-खासी नौकरी छोड़ कर उनका भतीजा एक ऐसे काम में इतनी मेहनत कर रहा है जहाँ उसे कुछ नहीं मिल रहा है, तो उन्हें काफी तकलीफ होती थी।

उषा बताती हैं कि चीज़ों को बदलने और बिजनेस को बेहतर होने में दो साल का समय लगा। वह कहती हैं, ”मैं इस स्टार्टअप के साथ जुड़कर बहुत खुश हूँ। यहाँ मैंने बहुत कुछ सीखा है और जीवन के इस पड़ाव में भी मैं सीखना जारी रखूंगी।

मैसूरु में फूड बॉक्स को ऑर्डर करने के लिए आप 96202 12227 पर कॉल कर सकते हैं।

यह भी पढ़ें – दिल्ली: व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे फूलों का सफल व्यवसाय चलातीं हैं यह 80 वर्षीया दादी

मूल लेख – HIMANSHU NITNAWARE

पूजा दास पिछले दस वर्षों से मीडिया से जुड़ी हैं। स्वास्थ्य और फैशन से जुड़े मुद्दों पर नियमित तौर पर लिखती रही हैं। पूजा ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से मास्टर्स किया है और नेकवर्क 18 के हिंदी चैनल, आईबीएन7, प्रज्ञा टीवी, इंडियास्पेंड.कॉम में सक्रिय योगदान दिया है। लेखन के अलावा पूजा की दिलचस्पी यात्रा करने और खाना बनाने में है।
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