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ब्लॉग से शुरू हुई थी तीन दोस्तों ‘गाथा’, आज करते हैं करोड़ों का कारोबार

साल 2013 में सुमिरन ने अपने दोस्त शिवानी धर और हिमांशु खार के साथ मिलकर हैंडिक्राफ्ट को बढ़ावा देने के लिए 5 लाख रुपए की लागत से अपनी ई-कॉमर्स कंपनी ‘गाथा’ को शुरू किया था। आज यह कंपनी हर साल करोड़ों का कारोबार करती है।

Gaatha E-commerce Company

भारतीय हस्तकला की लोकप्रियता पूरी दुनिया में है, लेकिन हाल के वर्षों में उद्योगों में मशीनों के बढ़ते उपयोग के कारण इसकी चमक फीकी पड़ने लगी है। लेकिन, सुमिरन पांड्या ने भारतीय हस्तकला को बढ़ावा देने के लिए एक ऐसी पहल की शुरूआत की, जिससे कारीगरों को अधिकतम लाभ सुनिश्चित होने के साथ ही वह खुद भी करोड़ों की कमाई कर रहे हैं। 

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सुमिरन पांड्या

मूल रूप से मध्यप्रदेश की राजधानी, भोपाल के रहने वाले सुमिरन ने साल 2013 के अंत में, अपने दो दोस्तों, शिवानी धर और हिमांशु खार के साथ मिलकर अपनी ई-कॉमर्स कंपनी ‘गाथा’ को शुरू किया था। इसके तहत उनका लक्ष्य हस्त शिल्प के कारीगरों के कौशल और ज्ञान को बढ़ावा देने के साथ-साथ उन्हें एक पहचान दिलाना भी था।

कैसे हुई शुरुआत

द बेटर इंडिया से बातचीत के दौरान सुमिरन बताते हैं, “भोपाल से साल 2004 में कम्प्यूटर साइंस से इंजीनियरिंग करने के बाद मैंने 2-3 वर्षों तक मुंबई में नौकरी की। लेकिन, मेरा रूझान डिजाइनिंग में था, इसलिए मैंने नौकरी छोड़कर अहमदाबाद स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन में यूजर इंटरफेस डिजाइन के कोर्स में मास्टर्स करने का फैसला किया।“

वह आगे बताते हैं, “पढ़ाई पूरी होने के बाद मैंने 2-3 वर्षों तक कई प्रोजेक्ट पर बतौर कंसल्टेंट काम किया। इसी कड़ी में, मेरा संपर्क एनआईडी के प्रोफेसर एमपी रंजन से हुआ, जो उस वक्त क्राफ्ट से संबंधित एक किताब लिख रहे थे। इस किताब को पढ़ने के बाद मेरा रूझान क्राफ्ट की ओर, और अधिक बढ़ गया।“

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2010 में सुमिरन, शिवानी और हिमांशु ने हस्तकला तकनीक को समझने के लिए कई गाँवों का दौरा किया।

इसके बाद, साल 2010 में सुमिरन ने अपने एनआईडी की सहपाठी रही  शिवानी धर और हिमांशु खार के साथ कई गाँवों का दौरा किया और कारीगरों के तकनीकों, प्रक्रियाओं और जरूरतों को समझने की कोशिश की। इसे लेकर वह कहते हैं, “हमारी शुरूआत रिसर्च और डॉक्यूमेंटेशन से हुई। हम हस्तकला की बारीकियों को समझने के लिए गाँवों का दौरा करते थे। इसकी शुरुआत गुजरात के कच्छ से हुई। फिर, हमने अपने ब्लॉग ‘गाथा’ के जरिए कारीगरों की कहानियों को लोगों तक पहुँचाना शुरू कर दिया।“

वह बताते हैं, “लोगों को हमारा ब्लॉग काफी पसंद आया और कई लोगों ने उत्पादों को खरीदने की इच्छा जताई। इसके साथ ही, कारीगर भी पूछते थे कि उनके उत्पादों को बेचने के क्या तरीके हो सकते हैं। इसी को देखते हुए हमें कुछ अनूठा करने का विचार आया। हमने 2013 में 5 लाख की पूंजी लगाकर, अहमदाबाद में गाथा नाम से अपने ऑनलाइन कारोबार को शुरू किया।“

किस सिद्धांत के तहत करते हैं काम

इस कड़ी में, गाथा की सह-संस्थापक शिवानी धर बताती हैं, “हम अपने प्लेटफार्म पर सिर्फ हाथ से बने उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं। वहीं, अक्सर देखा जाता है कि बाजार में जो उत्पाद मिलते हैं, उसके विषय में कोई जानकारी नहीं होती है कि इसे किसने बनाया और यह कहाँ बनी। लेकिन, ग्राहकों को उत्पादों को बनाने वाले कारीगरों के विषय में जानकारी देते हैं। इससे ग्राहकों की रुचि बढ़ने के साथ-साथ कारीगरों का उत्साहवर्धन भी होता है।“

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गाथा ई-कॉमर्स के तहत कारीगर अपने उत्पादों की कीमत खुद ही तय करते हैं।

वहीं सुमिरन बताते हैं, “उत्पादों को बेचने के लिए कारीगरों को कहीं जाना नहीं पड़ता है। साथ ही, अपने उत्पादों की कीमत वह खुद तय करते हैं। हम इसमें कोई मोल-भाव नहीं करते है। एक बार दाम तय हो जाने के बाद हम 20-25 प्रतिशत कमीशन से साथ इसे ग्राहकों को उपलब्ध कराते हैं। इसी से हमारा फायदा होता है।“

हर साल करते हैं करोड़ों का कारोबार

सुमिरन ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर जिस कारोबार को महज 5 लाख रुपए से शुरू किया था, उसके जरिए आज वह हर साल करोड़ों की कमाई कर रहे हैं। खास बात यह है कि गाथा ने यह मकाम खुद ही हासिल किया है और उन्हें अब तक किसी निवेशक की जरूरत नहीं पड़ी।

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परंपरागत तरीके से धागा बनाती महिला

फिलहाल, उनकी कंपनी में 15 से अधिक लोग नौकरी करते हैं, जबकि देश के करीब 400 कारीगर उनसे प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। गाथा स्टोर पर साड़ी, होम डेकोर, पेंटिंग्स, श्रृंगार आदि जैसी कई वस्तुएं उपलब्ध हैं।

आज उनके ग्राहक दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू जैसे देश के कई बड़े शहरों के अलावा, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया जैसे 20 से अधिक देशों में भी हैं।

क्या है सबसे बड़ी चुनौती

सुमिरन कहते हैं, “हमारे कारोबार में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ग्राहकों को असली और नकली हस्तकला के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। आज मशीन से बने हुए कपड़े में और हाथ से बने हुए कपड़े में, फर्क पता नहीं चलता है। लेकिन, मशीन से बने हुए कपड़े की कीमत कम होती है, जिसे वजह से हस्तशिल्प को काफी नुकसान होता है। लेकिन, राहत की बात है कि पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में काफी सुधार हुआ है और हाथ से निर्मित उत्पादों की माँग विदेशों में भी काफी बढ़ी है।“

बंधानी परिधान

शोध को बढ़ावा देने के लिए ऑनलाइन पोर्टल

सुमिरन अभी तक 300 से अधिक गाँवों को घूम चुके हैं और अपने शोध कार्यों को बड़े पैमाने पर लोगों तक पहुँचाने के लिए उन्होंने अपने ओपन सोर्स प्लेटफार्म को भी लॉन्च किया है, इसके तहत उनका उद्देश्य छात्रों और पेशेवरों को स्थानीय हस्तकला के बारे में निःशुल्क गहन तकनीकी जानकारी प्रदान करना है। उन्होंने अपने पोर्टल पर अब तक 100 गाँवों के आकड़ों को जारी किया है और जल्द ही सौ से अधिक गाँवों की जानकारी जारी करेंगे।

क्या कहते हैं भारतीय परिधानों के बारे में

इस विषय में सुमिरन कहते हैं, “भारतीय पारंपरिक परिधानों का इतिहास काफी गौरवमयी रहा है। इसे अपने जगह के मौसम और संस्कृति के अनुसार विकसित किया गया है, लेकिन हाल के दशकों में ऐसी मानसिकता का विकास हुआ है कि यदि हम अपने शैली में बने कपड़ों का इस्तेमाल करते हैं, तो इससे पिछड़ेपन का अहसास होता है। इस मानसिकता को दूर करने के लिए मीडिया और सरकार को आगे आना होगा।“

आप गाथा से फेसबुक के जरिए यहाँ संपर्क कर सकते हैं।

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Written by कुमार देवांशु देव

राजनीतिक और सामाजिक मामलों में गहरी रुचि रखनेवाले देवांशु, शोध और हिन्दी लेखन में दक्ष हैं। इसके अलावा, उन्हें घूमने-फिरने का भी काफी शौक है।

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