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खेती के लिए छोड़ी अमेरिका में नौकरी, अब बड़े-बड़े होटलों में जाते हैं इनके उत्पाद

गायत्री ने महाराष्ट्र में जैविक खेती शुरू करने के लिए 10 साल पहले अमेरिका में नौकरी छोड़ दी। अब वे अपने 10 एकड़ जमीन पर फलों और सब्जियों से लेकर, औषधीय पौधों की भी खेती करती हैं।

Woman Quits US Job

मुंबई से तकरीबन 3 घंटे की दूरी पर एक फार्म है, जिसका नाम है- ‘वृंदावन’। यहाँ आर्गेनिक खेती होती है। आपको लग रहा होगा तो फिर खास बात क्या है इस फार्म की ! तो चलिए, आज हम आपको सुनाते हैं इस जैविक फार्म और इसे शुरू करने वाली महिला किसान की कहानी।

यह कहानी गायत्री भाटिया की है, जिनके पास 10 एकड़ की जमीन थी लेकिन वह एक दशक पहले तक अमेरिका में काम कर रही थीं। लेकिन एक दिन वह नौकरी छोड़ लौट आईं अपने देश और करने लगी जैविक तरीके से खेती।

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गायत्री भाटिया

लगभग एक दशक पहले, गायत्री बोस्टन स्थित पर्यावरण संरक्षण एजेंसी में बतौर पर्यावरण विश्लेषक काम कर रही थी। अमेरिका छोड़ने के बाद जब वह पहली बार अपने फार्म ‘वृंदावन’ आईं, तो यहाँ मुख्यतः एक आम का बाग था, जिसमें सात किस्मों के 500 पेड़ लगे थे। साथ ही कुछ नारियल, काजू और काली मिर्च भी लगे थे।

लेकिन आज इस फार्म में आपको अलग-अलग प्रजाति के ढेर सारे आम के पेड़, केला, पपीता, शहतूत, चीकू, अनानास, कटहल, जंगली जामुन आदि के पेड़ दिखेंगे। साथ ही गायत्री मसाले और सब्जी की भी खेती कर रही हैं। हल्दी, अदरक से लेकर काली मिर्च तक वह उगा रही हैं। सब्जी की बात करें तो इस फार्म में कद्दू, टमाटर, बैंगन, आदि की भी खेती हो रही है।

द बेटर इंडिया के साथ एक खास बातचीत में, अपनी पुरानी यादों को ताजा करते हुए गायत्री कहती हैं, “अपने वर्षों के अनुभव के बाद, मुझे अहसास हुआ कि जिस ढंग से हम खुद और प्रकृति के साथ व्यवहार कर रहे हैं, उसमें एक बदलाव की जरूरत है, जो कई स्तरों पर हो सकता है। प्रकृति के करीब जाने के लिए पर्यावरण विश्लेषण में, मेरे अनुभव ने मुझे तैयार किया है। दरअसल इस भागम-भाग जीवनशैली में हम सबसे अधिक प्रकृति को नुकसान पहुँचा रहे हैं। ऐसे में खेती मेरे लिए खुद में बदलाव लाने की एक शुरूआत है।”

आज गायत्री एक जैविक किसान और उद्यमी हैं, जो स्वच्छ और ताजा फलों और सब्जियों को उत्पादन करती हैं, उसे बेचती हैं और साथ ही देसी बीज को भी संरक्षित कर रही हैं।

गायत्री के खेत में उत्पादित आम

आम के मौसम में गायत्री के बगीचे से 3,000 से 5,000 किलोग्राम आम बाजार पहुँचता है। उनके ग्राहकों में स्मोक हाउस डेली, काला घोड़ा कैफ़े, द पेंट्री, ओलिव, जैसे कई रेस्तरां शामिल हैं।

क्या उनके फार्म में पहले रसायनों का इस्तेमाल होता था?

गायत्री ने इस सवाल का जवाब दिया, “हमारे यहाँ खेती में कभी रसायनों का उपयोग नहीं हुआ। लेकिन, अपने साथियों द्वारा धान के खेतों में डीटीटी के उपयोग करने को लेकर मुझे चिंता होती थी, क्योंकि यह दुनियाभर में प्रतिबंधित है। खेती में किसी भी प्रयोग को लेकर मैं सचेत रहती हूँ, ऐसे में नेचुरल फार्मिंग ही एक उपाय दिखता है, जिसके बारे में समझने की जरूरत है।”

एक ऐसे दौर में, जहाँ अधिक फसल के लिए संशोधित बीज (जीएमओ) की माँग बढ़ रही है, गायत्री खेती के लिए देसी किस्म के बीजों को संरक्षित करने का प्रयास कर रही हैं।

वह कहती हैं, “आज बीज उत्पादन पर उन कंपनियों का अधिकार है, जिन्होंने युद्ध के लिए रसायनों को विकसित किया। इस तरह के बीज रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भर होते हैं, जो प्रकृति को काफी नुकसान पहुँचाता है। ऐसे में किसानों को जागरूक होना होगा। मुझे आश्चर्य होता है कि आज अधिकांश किसान बीजों को संरक्षित करने के बजाय बाजार से संसोधित बीजों को खरीदते हैं।”

जैविक रुप से उत्पादित फसल

कैसे करती हैं बीजों का संरक्षण?

गायत्री बताती हैं, “मैं फसलों को मौसम चक्र के अनुसार ही उगाती हूँ, ताकि उत्पादों की उपलब्धता बनी रहे। बीजों को काँच के जार में रखा जाता है। हम छोटे पैमाने पर बीजों को पड़ोसी किसानों से भी साझा करते हैं। फिलहाल, हम चावल और देसी मूंग दाल के उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रहे हैं। यह सच है कि हमारे बीज हमेशा स्वदेशी नहीं होते हैं, लेकिन यह भी सही है कि ये बीज प्रयोगशाला में तैयार नहीं होते, यह हमारे खेत की फसल ही होती है।”

गायत्री के खेत की देखभाल 9 श्रमिक मिलकर करते हैं। ये सभी पास के गाँव के लोग हैं। श्रमिक दिन के 8 से 6 बजे तक काम करते हैं, जबकि इसके बाद का सारा काम गायत्री अकेले संभालती हैं।

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गायत्री के फार्म में फसल मौसम चक्र के अनुसार उपजाई जाती है। कीटों की रोकथाम के लिए आमतौर पर साथी फसलों को लगाया जाता है। लेकिन, जरूरत पड़ने पर गोमूत्र का छिड़काव किया जाता है।

गायत्री के खेत में उगे ताजे उत्पाद

गायत्री कहती हैं, “प्राकृतिक खेती के लिए गाय महत्वपूर्ण है। हमारे पास चार गाय हैं, जिनमें से 2 बछड़े हैं। इससे खेती के लिए खाद और कीटनाशकों की जरूरतें पूरी होती है।”

गायत्री गाय के अपशिष्टों, मछली के मल, शैवाल, सूखे पत्ते आदि को मिलाकर जैविक उर्वरक बनाती हैं। पोषक तत्वों से भरपूर यह मिश्रण मिट्टी को पुनर्जीवित करता है। 

उन्होंने फलों और सब्जियों के लिए 2013 में वीकली मेंबरशिप की शुरुआत की थी। आज उनके पास लगभग 500 ग्राहक हैं।

गायत्री ताजा फलों, औषधीय पौधों, और साग-सब्जियों के अलावा, हर्बल टी, बेरी जैम, मैंगो जैम और आम की चटनी जैसे जैविक उत्पाद भी बेचती हैं।

इसके बारे में वह कहती हैं, “हम अपने उत्पादों को मुंबई के निकटतम बाजार भेजते हैं। हम हर किसी की सेवा करते हैं, जितना हम कर सकते हैं, आम लोगों से लेकर रेस्तरां तक हम पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं।

जैविक खेती की वकालत

गायत्री के खेत में उत्पादित हल्दियां

गायत्री कहती हैं, “औद्योगिक कृषि में प्रगति के बावजूद वैश्विक पैमाने पर 70 फीसदी अनाज छोटे किसान उगाते हैं। प्राकृतिक खेती करने वाले किसान एक समग्र, आत्मनिर्भर दृष्टिकोण अपनाते हैं। हमें उनका साथ देना होगा। प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा के लिए अब हम सभी को जागना होगा और सही और विवेकपूर्ण फैसले लेने होंगे।”

वह अंत में लोगों से अपील करती हैं, “एक उपभोक्ता के तौर पर आप जब भी कोई सब्जी या अनाज खरीदते हैं तो आपको पूछना होगा कि यह कहाँ से आया है? क्या इसका मौसम है? क्या मेरी दादी इसे खाना कहेगी? हमें अपने हाथों से मिट्टी को छूना होगा, पौधा लगाना होगा, ताकि हम प्रकृति को महसूस कर सकें।”

यदि इस कहानी ने आपको प्रेरित किया है, तो आप गायत्री भाटिया को vrindavanfarm@gmail.com पर मेल कर सकते हैं।  आप वृंदावन फार्म से फेसबुक और इंस्टाग्राम पर जुड़ सकते हैं।

(मूल लेख- JOVITA ARANHA)

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Written by कुमार देवांशु देव

राजनीतिक और सामाजिक मामलों में गहरी रुचि रखनेवाले देवांशु, शोध और हिन्दी लेखन में दक्ष हैं। इसके अलावा, उन्हें घूमने-फिरने का भी काफी शौक है।

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