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दिल के हैं बुरे लेकिन अच्छे भी तो लगते हैं

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माल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी
मैं अपने हाथ से उस की दुल्हन सजाऊँगी

वो इक रिश्ता-ए-बेनाम भी नहीं लेकिन
मैं अब भी उस के इशारों पे सर झुकाऊँगी

परवीन शाकिर ऐसा क्यों लिखती हैं भला?
क्योंकि ऐसा सोचती हैं?

ऐसा क्यों सोचती हैं भला?
क्योंकि उन्हें अच्छा लगता है, शायद.
उन्हें दर्द पसंद हो, शायद.
या विक्टिम मानसिकता जो कई लोगों की आरामगाह होती है.
(वैसे परवीन शाकिर के केस में ऐसा कुछ नहीं है! मैंने अपनी बात रखने के लिए अतिशयता पूर्ण विश्लेषण का प्रयोग किया है)

एक शरीफ़, ज़िम्मेदार, आपकी बात मानने वाला पुरुष. धोखा न देने वाला, पड़ोसियों से अच्छे से बात करने वाला, वक़्त पर घर आनेवाला पुरुष. जिसके साथ लम्बा जीवन बिताया जा सके, जो आपके पापा को (आसानी से) पापा कहे, बच्चों को बाग़ीचे में ले कर जाने वाला पुरुष – हर लड़की के ख़याल में होता है. ड्रामाफ़्री इंसान सबको चाहिए घर बसाने के लिए.

और पसंद कौन आता है? घुटनों की हड्डियों को पानी कौन बना देता है? धड़कन बढ़ा देता है.. सबके सामने नज़रों से कुछ कुरेद जाता है (भरे भौन में करत है नयनन ही सौं बात – बिहारी). शाम में रंगीनी भर देता है, नींद उड़ा देता है. जिसे फ़्लर्ट करने में महारत हासिल होती है. साहस होता है कुछ कह देने का, छू देने का. गाड़ी तेज़ चलाता है, बालों कपड़ों में बहुत ध्यान लगाता है.. सबसे बड़ी बात – जो दूसरी लड़कियों को भी पसंद आता है.

तानाशाहों, धोखेबाज़ों, अहंकार पालने वालों के लिए समर्पण जाग जाना नारियों की नियति है? आदत है? कमज़ोरी है? सीनाज़ोरी है? और जिनके साथ घर बसाने की सलाह समाज, वालिदैन, और बैंक में तनख़ाह जमा करा कर लौटा हुआ दिल देता है वो बोरिंग लगते हैं..

..तो लड़कियाँ क्या करती हैं?
जवाब आसान है. लड़कियाँ घर बसा लेती हैं..

और फिर कोशिश करती हैं कि रघुवीर सहाय की इस तरह की कविता उनके जीवन में न आये जो कहती है:
“पढ़िए गीता
बनिए सीता
फिर इन सबको लगा पलीता
किसी मूर्ख की बन परिणीता
निज घरबार बसाइये.

होंय कटीली
आँखें गीली
लकड़ी सीली
तबियत ढीली
घर की सबसे बड़ी पतीली
भर कर भात पसाइये”

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या फिर वही ठीक था परवीन शाकिर का कहना:
‘सुपुर्द कर के उसे चाँदनी के हाथों
मैं अपने घर के अंधेरों को लौट आऊँगी’

मैं अंधेरों में जी लूँगी.
मैं ज़रा सा उड़ लूँगी फिर लौट कर पापा की सहमती से चलूँगी.
मैं उड़ूँगी.. उसके कमीनेपन को सुधारने की कोशिश करुँगी.. रोती-पटकती-गाती-चिल्लाती जी लूँगी.
मैं उड़ूँगी, गिरूँगी, उड़ूँगी, गिरूँगी, उड़ूँगी, गिरूँगी..

गिरना कठिन है. छाती फट जाती है. कुछ मर जाता है. आपकी सरलता कम होती जाती है गिरते उठते रहने से.
उड़ना कठिन है.. क्योंकि लोगों के अपने सपने ही नहीं होते. डर लगता है सपने देखने में. या आलस है या अकर्मण्यता है. सपने देखने में पुरुषार्थ लगता है. मेहनत लगती है. अधिकतर लोग नाकारे होते हैं.. ‘जैसी उपरवाले की मर्ज़ी, वही ठीक है’, सोच कर बसर कर लेते हैं..

सपने देखना ठीक है या नहीं देखना – क्या पता..
बैड-बॉय, बेहतर है या सेफ़-बॉय – क्या पता..

आसान सा लेख है पर अगर मन भारी हो गया हो तो माफ़ी. इलाज के तौर पर ये वीडियो हाज़िर है.. देखें परवीन कैफ़ की नशा ला देने वाली मासूमियत को.. कहती हैं..

दिल के हैं बुरे लेकिन अच्छे भी तो लगते हैं
हर बात सही झूठी – सच्चे भी तो लगते हैं.
आगे का उनसे ही सुन लीजिये:


लेखक –  मनीष गुप्ता

फिल्म निर्माता निर्देशक मनीष गुप्ता कई साल विदेश में रहने के बाद भारत केवल हिंदी साहित्य का प्रचार प्रसार करने हेतु लौट आये! आप ने अपने यूट्यूब चैनल ‘हिंदी कविता’ के ज़रिये हिंदी साहित्य को एक नयी पहचान प्रदान की हैं!


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