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1 एकड़ तालाब में मोती की खेती से कमा सकते हैं 5 लाख रूपए, समझें बिहार के इस किसान का मॉडल

2009 में बिहार के जयशंकर ने 1 बीघा जमीन में 5 फीट गहरा और 15 फीट की मिट्टी की बाउंड्री वाला एक तालाब खोदा। कम से कम 5,000 मसल्स वाले तालाब से सालाना दर्जनों बाल्टी-मोती मिलते हैं। समझिये इनका मॉडल।

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“अपने देश में अधिकांश लोग यही सोचते हैं कि अच्छी पढ़ाई तब ही सार्थक मानी जाएगी जब आपको अच्छी नौकरी मिलेगी। केमिस्ट्री में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद मैंने खेती करने का फैसला किया। मेरे इस निर्णय से बहुतों को हैरानी हुई। लोग खेती को छोटा काम मानते हैं। लोग कहते थे- ‘पढ़े फारसी बेचे तेल’”, यह कहना है बिहार के 52 वर्षीय किसान जयशंकर कुमार का, जो पिछले 11 सालों से मोती की खेती कर रहे हैं।

बेगूसराय के तेतरी गाँव में पले-बढ़े जयशंकर ने 1.5 बीघा जमीन में इकोलॉजिकल खेती का एक अनोखा सिंबायोटिक मॉडल तैयार किया है। इसमें मोती की खेती और मछली पकड़ने के साथ जैविक सब्जी, फल,औषधीय जड़ी बूटियों का वर्टिकल गार्डन, पोल्ट्री, वर्मीकम्पोस्ट और बायोगैस का उत्पादन किया जाता है।

जयशंकर का कहना है कि इस तरह का एक खेत 1 एकड़ से कम की जमीन में स्थापित किया जा सकता है और राज्य के सभी किसान कई तरीकों से इससे लाभ कमा सकते हैं।

एक समय गाँव के लोगों ने उनकी खेती का मजाक उड़ाया था। हाल ही में ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जयशंकर का नाम लेते हुए मोती की खेती के उनकी इनोवेटिव फार्मिंग टेक्निक का जिक्र किया। आज जयशंकर को राष्ट्रीय पहचान मिल चुकी है। 11 साल की कड़ी मेहनत के बाद आखिरकार जयशंकर को उनकी सही पहचान मिल ही गई।

वह कहते हैं, “मुझे और मेरे करियर ऑप्शन को लेकर लोगों ने काफी निगेटिव कमेंट्स किए लेकिन उससे मैं कभी परेशान नहीं हुआ। अब इतने बड़े प्लेटफार्म पर पहचान मिलना अपने आप में एक बड़ी बात है। इससे बेशक लोगों के नजरिए में बदलाव आया है। मुझे उम्मीद है कि इससे देश के अन्य किसानों का ध्यान मोती की खेती की तरफ खींचेगा और इससे भारत में कृषि की गतिशीलता में बदलाव आएगा।”

मोती की खेती शुरू करना

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जयशंकर कुमार

जयशंकर को एक मैगजीन में आर्टिकल पढ़ते हुए मोती की खेती के बारे में पता चला। इसके फायदों से प्रभावित होकर उन्होंने इस इसके बारे में गंभीरता से सोचना शुरू कर दिया। उस समय तक इसकी शुरूआत करने का ख्याल उनके मन में नहीं आया था।

उन्होंने सीएम साइंस कॉलेज, दरभंगा से पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया था। बाकी लोगों की तरह उन्होंने भी अपने लिए एक अच्छी नौकरी खोजने का फैसला किया।

जयशंकर कहते हैं, “मैं एक गरीब किसान परिवार से था। मेरे लिए उच्च शिक्षा हासिल करना एक बड़ी बात थी। डिसटिंक्शन के साथ अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं सरकारी नौकरी की तलाश में था। मुझे कुछ भी संतोषजनक नहीं मिल रहा था, मुझे एक हाई स्कूल में क्लर्क की नौकरी करनी पड़ी। लेकिन कुछ अलग करने और अपनी पढ़ाई का सही इस्तेमाल करने की आग हमेशा मेरे अंदर छिपी रही। जल्द ही मेरा मकसद तब सबके सामने आ गया जब मैंने अपने परिवार की विरासत आगे बढ़ाने का फैसला किया। फ्रेशवाटर पर्ल फार्मिंग एक ऐसी चीज है जिसे भारत में कम ही लोग जानते हैं।”

भुवनेश्वर स्थित इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चर रिसर्च-सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेशवाटर एक्वाकल्चर (ICAR-CIFA) के योगदान के बारे में जानने के बाद वह सहायता के लिए उनके पास पहुँचे। मोती की खेती में वहाँ के अनुभवी वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया के माध्यम से उनका मार्गदर्शन किया और जरूरी ट्रेनिंग भी दी।

वह कहते हैं, “मुझे CIFA से आधिकारिक प्रशिक्षण नहीं मिला, लेकिन वहाँ के पूर्व छात्र ने ऑन-ग्राउंड इंस्टालेशन और फ्रेशवाटर मसल्स  (mussels) या कौड़ी से मोती की खेती और प्रोसेसिंग की प्रक्रिया में मदद की।”

2009 में उन्होंने 1 बीघा जमीन में 5 फीट गहरा और 15 फीट की मिट्टी की बाउंड्री वाला एक तालाब खोदा। कम से कम 5,000 मसल्स वाले तालाब से सालाना दर्जनों बाल्टी-मोती मिलते हैं। इसके अलावा वह मछली पालन भी करते हैं। देखरेख और प्रोसेसिंग के बाद एक मसल्स के पूरे जीवन-चक्र से निकले उच्च-गुणवत्ता वाले मोती 500 रुपये से लेकर 4,000 रुपये तक के बीच बिकते हैं।

मोती की आकर्षक खेती और इसके फायदों के बारे में बात करते हुए सीआईएफए के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. शैलेश सौरभ कहते हैं, “जयशंकर को उनकी उचित पहचान मिल गई। इससे हम बहुत खुश हैं और आशा करते हैं कि इससे मोती की खेती के बारे में अधिक जागरूकता बढ़ेगी। इसकी खासियत यह है कि 1 से 1.5 वर्ष के बाद अच्छी ट्रेनिंग और सही सेट-अप लगाकर किसान केवल 1 एकड़ तालाब से सालाना 5 लाख रुपये तक कमा सकते हैं।”

इकोलॉजिकल फार्मिंग में मोती उगाने के फायदे

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जयशंकर बताते हैं कि उन्होंने तालाब में मोती की खेती शुरू करने के लिए पास के वेटलैंड्स और मीठे पानी के जलाशयों से मसल्स एकत्र किए। कई परीक्षणों के बाद मसल्स की मृत्यु दर कम होने लगी, जिससे हर साल अच्छी गुणवत्ता के बड़े मोती पैदा हुए।

लेकिन, इस पूरी प्रक्रिया में उन्होंने केवल एक ही बात का विशेष ध्यान रखा था।

जयशंकर बताते हैं, “प्राकृतिक परिस्थितियों में, जब कोई भी बाहरी पदार्थ उनके खोल के अंदर प्रवेश करता है तो मसल्स केवल एक रक्षा तंत्र के रूप में मोती का उत्पादन करते हैं। खेती में उन्हें कृत्रिम रूप से ऑपरेट करना पड़ता है और बाहरी पदार्थ के रूप में न्यूक्लियस अंदर डाला जाता है, जो अंततः समय के साथ मोती बन जाती है। कृत्रिम प्रक्रिया के बजाय मैं पूरी प्रक्रिया को नैचुरल रखने की कोशिश करता हूँ। इसलिए मैंने उन्हें एक टैंक या बाल्टी में डालने के बजाय मछलियों के साथ एक तालाब में डाला है, ताकि तापमान और हरी शैवाल और ज़ूप्लांकटन के भोजन जैसी सभी स्थितियों का स्वाभाविक रूप से ध्यान रखा जाए।”

जयशंकर आगे बताते हैं, “इसके अलावा इंस्टालेशन के एक साल बाद युवा मसल्स हर उत्पादन चक्र के बाद 2-3 मोती का उत्पादन कर सकते हैं। उन्हें प्रोसेस्ड करने का मतलब है मोती प्राप्त करने के लिए न केवल उन्हें नष्ट करना बल्कि प्राकृतिक चक्र को नुकसान पहुँचाना और कम गुणवत्ता वाले मोती का उत्पादन करना है। ऐसा कुछ करने के बजाय, मैंने उन्हें 9-10 साल के अपने पूरे जीवन-चक्र को पूरा करने दिया और केवल उन्हीं मोतियों का उपयोग किया। हालांकि इस बीच, हर साल कुछ मसल्स अपने आप मर जाते हैं, तब मैं उनके मोती निकाल लेता हूँ।”

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उन्होंने यह भी कहा कि मसल्स के साथ-साथ बढ़ती मछलियाँ तालाब की नियमित सफाई करती हैं। एक युवा मसल्स में एक समय में लगभग 40 लीटर पानी शुद्ध करने की क्षमता होती है। वे पानी में मौजूद प्राकृतिक अशुद्धियों को खा जाते हैं। इससे मछलियां भी स्वस्थ रहती हैं।

वह कहते हैं, “सजावट से अधिक, मोती और मसल्स अपने औषधीय गुणों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसमें कैल्शियम और कार्बन अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। मृत मसल्स के शेल से बना पाउडर मिट्टी को अधिक उपजाऊ बनाने के लिए बेहद फायदेमंद है। इसलिए मृत मसल्स से मैं अपने आर्गेनिक गार्डन के लिए भी शेल पाउडर का इस्तेमाल करता हूँ।”

खेती के इस सिंबायोटिक सिद्धांत को अपनाकर जयशंकर पहले ही लाखों रुपए के 2000 मोती बेच चुके हैं और 10-11 सालों में 10,000 से अधिक उच्च गुणवत्ता वाले मोती का स्टॉक तैयार कर चुके हैं।

जयशंकर का कहना है, “मोती की खेती बिहार के लिए एक वरदान है। यहाँ ताजे पानी का अच्छा स्रोत है। उचित जागरूकता और सरकारी सहायता के जरिए हजारों किसानों को मदद मिल जाए तो यह राज्य के लिए एक गेमचेंजर साबित हो सकता है। मैं अपने खेत को युवाओं के लिए एक उदाहरण बनाना चाहता हूँ और उन्हें बेहतर बनाने में मदद करने की उम्मीद करता हूँ।” वह अपने खेत में मोती की खेती में रुचि रखने वाले हर व्यक्ति को निशुल्क ट्रेनिंग देते हैं।

मूल लेख- ANANYA BARUA

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Written by अनूप कुमार सिंह

अनूप कुमार सिंह पिछले 6 वर्षों से लेखन और अनुवाद के क्षेत्र से जुड़े हैं. स्वास्थ्य एवं लाइफस्टाइल से जुड़े मुद्दों पर ये नियमित रूप से लिखते रहें हैं. अनूप ने कानपुर विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य विषय में स्नातक किया है. लेखन के अलावा घूमने फिरने एवं टेक्नोलॉजी से जुड़ी नई जानकारियां हासिल करने में इन्हें दिलचस्पी है. आप इनसे anoopdreams@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

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