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अहमदाबाद: छत पर मिट्टी बिछाकर करते हैं गार्डनिंग, सब्जियाँ मिलने के साथ घर भी रहता है ठंडा

अहमदाबाद के इस घर के आंतरिक और बाहरी हिस्से को चूने से प्लास्टर किया गया है, जिससे घर को ठंडा रखने में काफी मदद मिलती है।

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किसी ऐसे घर को बनाना हमेशा मुश्किल होता है, जो रहने के लिए आरामदायक होने के साथ-साथ प्रकृति के अनुकूल भी हो। अपने घरों को बनाने के लिए हम जिन चीज़ों का इस्तेमाल करते हैं, उसकी एक निश्चित कीमत पर्यावरण को चुकानी पड़ती है। एक नए घर को पर्यावरण के अनुकूल बनाना तो फिर भी हमारे हाथ में है पर अगर आप पहले से ही बने हुए घर में रहने के लिए जाते हैं, तो क्या करते हैं? दरअसल बने-बनाए घर में बदलाव करना आसान नहीं माना जाता है।

अहमदाबाद के रहने वाले दंपत्ति, सूर्य और जाई काकनी ने इन मिथकों को तोड़ दिया। दरअसल, परंपरागत ढंग से निर्मित एक घर में उन्होंने प्रकृति को ध्यान में रखकर कई तरह के बदलाव किए।

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सूर्य व जय ककानी

इसके तहत, दोनों ने पूर्व-निर्मित घर में कुछ ढांचागत बदलाव किए, जिससे घर की स्थिरता (सस्टेनेबिलिटी) बढ़ी। इनमें नेचुरल एयर वेंटिलेशन तकनीक और निर्माण सामग्रियों में घर को ठंडा रखने वाली सामाग्रियों का प्रयोग शामिल है। इन्हीं तकनीकों की वजह से गर्मी के दिनों में 42 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी इस घर में आप बिना एयर कंडीशनर के रह सकते हैं।

इसके अलावा, उन्होंने रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को भी विकसित किया है, जिसके जरिए लगभग 16 हजार लीटर पानी को एक भूमिगत टंकी में जमा किया जाता है। साथ ही, रसोई, बाथरुम आदि से निकले बेकार पानी को भी रीसायकल किया जाता है। उन्होंने अपनी छत पर किचन गार्डन बनाया है, जो छत को और अधिक ठंडा रखने में मदद करती है।

दोनों ने पूर्व-निर्मित इस घर में 2000 से 2009 तक रहते हुए पता किया कि आखिर किस तरह का बदलाव किया जाए, जिससे यह घर प्रकृति के करीब बना रहे। इसके बाद 2009 से उन्होंने कई महत्वपूर्ण बदलाव किए।

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घर का प्रवेश द्वार

इसके बारे में सूर्य कहते हैं, “एक बार जब हम घर में रहने लगे, तो हम आश्वस्त थे कि हम मौजूदा कंस्ट्रक्शन में कई तरह के बदलाव कर सकते हैं। दरअसल हम सभी की प्रमुख चिंता गर्मी और धूप से जुड़ी होती है। इसके साथ ही, जल प्रबंधन, निर्माण सामग्रियों को बनाने में ऊर्जा प्रबंधन, अपशिष्ट प्रबंधन आदि हमारी प्रमुख चिंताएं थीं।”

द बेटर इंडिया के साथ बातचीत में दंपत्ति ने यह साझा किया कि किस सोच और व्यवहार के तहत उन्होंने एक पारंपरिक शैली से बने हुए घर को यह रूप दे दिया, जो न सिर्फ स्थिरता के विमर्श के प्रति संवेदनशील था, बल्कि आजकल के रहन-सहन की जरूरतों को पूरा करने वाला भी था।

खुद को किया अधिक जागरूक

सूर्य और जाई ने अपनी जिंदगी को एक नए तरीके से जीने के लिए अपने वास्तुकला और डिजाइन के ज्ञान को एक सूत्र में पिरोया। सूर्य की खुद की एक आर्किटेक्चर फर्म है और वह विजिटिंग फैकल्टी और क्रिटिक के रूप में भी काम करते हैं, खासकर अहमदाबाद स्थित CEPT के आर्किटेक्चर डिपार्टमेंट में, जहाँ उन्होंने साल 2017 से 2020 तक डीन के रूप में अपनी सेवाएं दी।

जाई पेशे से एक ग्राफिक डिजाइनर हैं और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन (NID) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (NIFT) जैसे संस्थानों में विजिटिंग फैकल्टी के तौर पर भी काम करती हैं। इसके अलावा, उन्होंने अहमदाबाद में अपनी एक गैर-सरकारी संस्था ‘सोच’ की भी स्थापना की, जो ग्रामीण और कौशल विकास के जरिए महिला सशक्तिकरण और बाल शिक्षा की दिशा में कार्य करती है।

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घर का लिविंग रूम

यह दंपत्ति फिलहाल जिस घर में साल 2000 से रह रहे हैं, उसका निर्माण 1970 के दशक में ही गुजरात हाउसिंग बोर्ड द्वारा किया गया था। लगभग 10 वर्षों तक घर में रहने के बाद उन्होंने इसका नवीनीकरण करने का फैसला किया।

इसके बारे में सूर्य कहते हैं, “अधिकांश पारंपरिक इमारतें प्राकृतिक रूप से टिकाऊ होती हैं, लेकिन हाल के वर्षों में शहरीकरण की नई धारणा के तहत हमने इस कौशल और ज्ञान को पीछे छोड़ दिया। यही वजह है कि वर्तमान शहरी संदर्भ में परम्परागत शैलियों को अपनाना इतना आसान नहीं है। पुरानी प्रणालियों को समझने और नई उभरती हुई स्थायी प्रौद्योगिकियों और व्यवहारों के साथ उनका सामंजस्य स्थापित करने के लिए इन प्रणालियों के पीछे के विज्ञान को समझना ज़रूरी है, ताकि आज के शहरी संदर्भ में उसका प्रासंगिक उपयोग हो सके।”

घर में सुकून से दो पल बिताने के लिए ख़ास जगह

वहीं, जाई कहती हैं, “हमने अपनी ऊर्जा (संसाधन) की जरूरतों को कम करने के लिए, एसी का इस्तेमाल नहीं करने का फैसला किया। इसके बजाय, हमने घर को ठंडा रखने के लिए इसके डिजाइन में कुछ बदलाव करने को लेकर जानकारी हासिल की और यह सब हम अधिक अपशिष्ट पैदा किये बिना हासिल करना चाहते थे। तो, सबसे पहली शर्त थी कि हम मौजूदा घर में बेकार चीजों को नहीं रखेंगे।”

पानी के बेहतर उपयोग के साथ प्राकृतिक रूप से ठंडा घर

गर्मी के मौसम में घर को ठंडा रखने के लिए इस दंपत्ति ने घर में कई तरह के बदलाव किए। इसके लिए उन्होंने कई तरीके अपनाए।

दक्षिणी दिशा में, अपने पड़ोसी के घर से सटे होने के कारण कोई जगह नहीं थी। तो, उन्होंने छत पर एक बड़ा सा छेद करवाया और आसामन की ओर से उसे खुला छोड़ा ताकि हवा आती-जाती रहे। इसमें उन्होंने बंद करने का भी ऑप्शन दिया। इसमें एक सीलिंग फैन और एक विंड-कैचर को भी लगाया गया है, इस प्रक्रिया में एक 4×4 का पाइप लगाया गया है, जिसके जरिए ठंडी हवा कमरे तक पहुँचती है।

गर्मी के मौसम में, देर शाम से लेकर सुबह तक, जब तक कि बाहर का तापमान कम रहता है, घर के अंदर हवा जाती है। हवाओं का प्रवाह, इस दो मंजिले घर के पाँच कमरों में होती है। इस तरह, भीषण गर्मी में भी यह घर ठंडा रहता है।

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घर के पश्चिम की ओर, जहाँ धूप अधिकतम समय के लिए पड़ती है, वहाँ पर एक छोटी खिड़की और लकड़ी का एक शटर बनवाया। शटर में हरी पत्तियों वाले पर लताएं लटकी हुई है, ताकि पश्चिमी हिस्सा कम गर्म हो। वहीं पूर्व की ओर, लचीली लकड़ी (अपसाइक्लिड) के शटर को लगाया गया है, जो कमरों में धूप की मात्रा को नियंत्रित कर सकते हैं- सुबह से शाम, गर्मियों से सर्दियों तक। इसके अलावा, उत्तर की ओर, कई बड़े पेड़ हैं। इसलिए यहाँ बड़ी खिड़की रखी गई है और यहाँ से आईआईएम अहमदाबाद के हरे-भरे परिसर का भी नजारा देखने को मिलता है।

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सूर्य बताते हैं, “हर घर के ऊपरी हिस्से पर सर्वाधिक समय तक धूप पड़ती है, जो एक घर और उसके आंतरिक हिस्से को गर्म करने का सबसे बड़ा कारक है।”

इसलिए उन्होंने अपने घर की छत को दो स्तरों में बनाया है, ऊपरी स्तर वर्षा जल के संचयन के लिए बनाया गया है। इसके छत को मोटे थर्मोकोल (पैकेजिंग वेस्ट) और चूना कंक्रीट को चिकने चूने के प्लास्टर से करके बनाया है।

निचले स्तर की छत पर सब्जियाँ लगी हुई हैं। इससे नीचे का कमरा ठंडा रहने के साथ-साथ घर में उगाई गई ताजी सब्जियों की जरूरत भी पूरी होती है और कमरे एक और हरा-भरा बाहरी दरवाजा (आउटडोर) भी इससे जुड़ा हुआ है।

घर की छत को ठंडा कैसे रखा जाता है वह आप इस चित्र से समझ सकते हैं ।

जाई कहती हैं, “साल 2010 में, हमने छत के निचले हिस्से पर, 10 इंच मिट्टी की परत बिछा कर बैंगन, मटर, गाजर, चुकंदर जैसी सब्जियों की खेती शुरू की। इसमें किसी भी तरह के रसायन या कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता है। लेकिन, कुछ समय से इलाके के बंदर हमारे बगीचे पर अपनी नजरें गड़ाए हुए हैं।”

इन उपायों के साथ-साथ घर के आंतरिक और बाहरी हिस्से को चूने से प्लास्टर किया गया है, जिससे घर को ठंडा रखने में मदद मिलती है।

इसके अलावा, छत के ऊपरी-स्तर पर संग्रहित बारिश के पानी को जमीन पर बने 16,000 लीटर के टैंक में भेजने की भी व्यवस्था की गई है।

इसके बारे में सूर्य बताते हैं, “हम खाने या खाना पकाने के लिए इसी पानी का इस्तेमाल करते हैं और लगभग 10 वर्षों से हमने नगर निगम के पानी का उपयोग नहीं किया है।”

वहीं, अतिरिक्त पानी को घर के आंगन में बने वाटर टैंक में भेजा जाता है। इसके अलावा, वाशिंग मशीन से निकले पानी का इस्तेमाल बाथरूम में और रसोई से निकले पानी का उपयोग केले के पौधों को सींचने के लिए किया जाता है।

घर का बैडरूम

इसके साथ ही, इस जोड़ी ने पानी को गर्म करने के लिए गीजर के जगह पर एक सोलर वॉटर हीटर को लगाया है।

तालाब में पानी पीने आते हैं पशु-पक्षी, पालते हैं मछलियां भी 

इस घर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रकृति और आस-पास के परिवेश के अनुकूल है। यहाँ सबकुछ खुला-खुला अनुभव होता है। लिविंग रूम, डाइनिंग रूम और रसोई, सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं और उन्हें जोड़ने के लिए कोई बंद दरवाजे नहीं हैं।

वहीं, घर के सभी खिड़कियों को खोलकर अंदर और बाहर की सीमाओं को खत्म कर दिया गया है, जिससे कि दोनों ओर एक घुमावदार जगह बन गया है। साथ ही, बरामदे को बाउंड्री के साथ इस तरह से बनाया गया है, जो आराम और सुकून के लिए एक आदर्श जगह है।

प्रवेश द्वार पर और कैंपस में छोटे-छोटे तालाब हैं। इसके बारे में जाई कहती हैं, “इन तालाबों में मछली और लिली हैं। चूंकि, ये तालाब दीवार से सटे हुए हैं तो यह उस हिस्से का ठंडा रखने में मदद करता है। यहाँ बंदर, पड़ोसियों की बिल्लियाँ और पक्षी पानी पीने आते हैं, यह देखकर हमें काफी अच्छा लगता है।”

घर के आउटडोर, जो ज्यादा बड़ा नहीं है, में कई देशी पौधे हैं, जिन्हें उनकी सुगंध और औषधीय गुणों को देखते हुए लगाया गया है। इन पौधों को किसी बागवानी की किताब को पढ़ कर लगाने के बजाय बचपन की यादों को ताजा कर लगाया गया है। घर के पश्चिमी दीवार लताओं (कैस्केडिंग क्रीपर्स) से ढकी हुई है, जिससे घर ठंडा रहता है। जाई बताती हैं कि जब इन लताओं पर फूल उगते हैं, तो उसकी सुंगध हमें मनमुग्ध कर देती है और उसकी खूबसूरती देखती ही बनती है।

जाई आगे कहती हैं, “हम दोनों को इस तरह से जीने का एक जुनून था और यह सीखने के एक बड़ी प्रक्रिया थी। इसका हमें लाभ मिला है – वास्तव में, जब आप ऐसे छोटे-छोटे बदलाव करते हैं तो आप प्रकृति से नज़दीक हो जाते हैं और आज के दौर में प्रकृति के साथ बड़े संदर्भ में सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करना अधिक महत्वपूर्ण है।”

वहीं अंत में सूर्य कहते हैं, “मुझे लगता है कि हमारा शरीर हमारी सोच से अधिक सक्षम है। इन बदलावों को लाने की हमारी यात्रा और अनुभव बेहद शानदार रही और मैं इसका कोई दूसरा रास्ता नहीं सोच सकता। विकल्प खोजना वास्तव में संभव है। हमें बस अपने जीने और उपभोग के तरीकों पर विचार करने की जरूरत है।”

मूल लेख- Angarika Gogoi

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