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उत्तराखंड की हस्तशिल्प काष्ठकला को सात संमदर पार विदेशों तक पहुँचा चुके हैं धर्म लाल

पहाड़ में हुनरमंदो की कोई कमी नहीं है। यहाँ एक से बढ़कर एक बेजोड़ हस्तशिल्पकार हैं। लेकिन बेहतर बाजार और मांग न होने से इन हस्तशिल्पकारों को उचित मेहनताना नहीं मिल रहा है। आइए जानते हैं कैसे धर्म लाल अपनी कला को बचाने के लिए जी जान से जुटे हैं!

“हाथ में जमीन न हो तो कोई गम नहीं। जिसके पास कला का हुनर है, उसके हाथों से कुछ भी दूर नहीं रह सकता।” जी हाँ, इन पंक्तियों को सार्थक कर दिखाया है धर्म लाल ने। जिन्होंने बेजान पड़ी लकड़ियों पर अपनी बेजोड़ हस्तशिल्प काष्ठ कला से उन्हें जीवंत कर दिया है। धर्म लाल के पास न तो कोई इंजीनियरिंग की डिग्री है, न कोई डिप्लोमा और न ही कोई उच्च शिक्षा की डिग्री लेकिन फिर भी 57 वर्षीय धर्म लाल विगत 40 सालों से विरासत में मिली अपनी काष्ठकला को बचाने में जुटे हुए हैं।

उन्होंने उत्तराखंड की हस्तशिल्प काष्ठकला को सात संमदर पार विदेशों तक भी पहुँचाया है। जहाँ उनकी कला को देखकर हर कोई आश्चर्यचकित रह गया था।

uttarakhand handicraft man
धर्म लाल

57 वर्षीय धर्म लाल को बचपन से ही हस्तशिल्प से लगाव था। उन्हें हस्तशिल्प काष्ठ कला का हुनर विरासत में अपने परिवार से मिला। उनके परिवार में कई पीढ़ियों नें काष्ठकला को आगे बढ़ाने का काम किया। धर्म लाल विगत 40 वर्षों से काष्ठकला के माध्यम से ही अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे हैं।

महज 15-16 वर्ष की छोटी उम्र से ही धर्म लाल नें हस्तशिल्प काष्ठ कला का काम करना शुरू कर दिया था। धर्म लाल पहाड़ों में परंपरागत खोली, रम्माण के मुखौटे, घरों के लकड़ी के जंगले, लकड़ी के भगवान के मंदिर व मूर्तियाँ बनाकर स्थानीय बाजार में बेचते हैं, लेकिन बदलते दौर में स्थानीय बाजार में उनकी मांग न के बराबर है। बावजूद इसके धर्म लाल उत्तराखंड की काष्ठकला को बचाने में लगे हुए हैं।

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धर्म लाल द्वारा बनाया जा रहा लकड़ी का मुखौटा

धर्म लाल को हस्तशिल्प कला के लिए विभिन्न अवसरों पर दर्जनों सम्मान भी मिल चुके हैं। 2016 में उन्हें उत्तराखंड शिल्प रत्न पुरस्कार भी मिल चुका है। जबकि 2017 में भारत सरकार के इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट एंड प्रमोशन ऑफ हैंडीक्रॉफ्ट योजना के तहत चयनित होने के बाद धर्म लाल ने इंग्लैंड के बर्मिंघम में आयोजित ऑटोमन इंटरनेशनल फेयर 2017 में लकड़ियों की वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाई थी। वहाँ धर्म लाल ने अपने हाथों से तराशे लकड़ी के पशु-पक्षी, मुखौटे व केदारनाथ मंदिर(रेप्लिका) का प्रदर्शन किया था। धर्म लाल बताते हैं कि सात समंदर पार विदेशियों ने भी उत्तराखंड की इस कला की सराहना की थी। उन्हें इस बात की खुशी है कि उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहाड़ की काष्ठकला का लोहा मनवाया। ऊर्गम घाटी में हर साल लगने वाले गौरा देवी मेले में धर्म लाल अपने मुखौटे व अन्य उत्पादों की प्रदर्शनी लगाते हैं। विगत दिनों दीपक रमोला के प्रोजेक्ट फ्यूल ने भी धर्म लाल की बेजोड़ हस्तशिल्प कला पर एक शानदार डॉक्यूमेंट्री बनाई थी, जिसे लोगों ने बेहद सराहा था।

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धर्म पाल द्वारा बनाए गए लकड़ी के हैंडीक्राफ्ट

देखा जाए तो पहाड़ में हुनरमंदो की कोई कमी नहीं है। यहाँ एक से बढ़कर एक बेजोड़ हस्तशिल्पकार हैं। लेकिन बेहतर बाजार और मांग न होने से इन हस्तशिल्पकारों को उचित मेहनताना नहीं मिल रहा है।

ऊर्गम घाटी के सामाजिक सरोकारों से जुड़े एक युवा रघुवीर नेगी कहते हैं, “आर्थिक तंगी की वजह से उत्तराखंड के विभिन्न जनपदों के बेजोड़ हस्तशिल्पकार आज बेहद मायूस है जिस कारण से हस्तशिल्प कला दम तोड़ती नजर आ रही है। जरूरत है ऐसे हस्तशिल्पकारों को प्रोत्साहित करने की और हरसंभव मदद करने की।”

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द बेटर इंडिया से बातचीत के दौरान अपनी कला प्रदर्शित करते धर्म लाल

अगर आप धर्म लाल की मदद करने चाहें या उनके कोई भी उत्पाद खरीदना चाहें तो आप उनसे 70885 81583 पर संपर्क कर सकते हैं।

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Written by Sanjay Chauhan

संजय चौहान, उत्तराखंड राज्य के सीमांत जनपद चमोली के पीपलकोटी के निवासी हैं। ये विगत 16 बरसों से पत्रकारिता के क्षेत्र में है। पत्रकारिता के लिए इन्हें 2016 का उमेश डोभाल पत्रकारिता पुरस्कार (सोशल मीडिया) सहित कई सम्मान मिल चुके हैं। उत्तराखंड में जनसरोकारों की पत्रकारिता के ये मजबूत स्तम्भ हैं। पत्रकारिता, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान में डिग्री हासिल करने वाले संजय चौहान नें लेखनी के जरिए कई गुमनाम प्रतिभाओं को पहचान दिलाई है। ग्राउंड जीरो से उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और जनसरोकारों पर इनके द्वारा लिखे जाने वाले आर्टिकल का हर किसी को इंतजार रहता है। पहाड़ में रहकर इन्होंने पत्रकारिता को नयी पहचान दिलाई है। ये वर्तमान में फ़्री लांस जर्नलिस्ट्स के रूप में कार्य करते हैं।

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