जानिए, पहले World War में ऐसा क्या हुआ जो देश को मिल गया स्वदेशी ‘Mysore Sandal Soap’

चंदन हर किसी का मन मोह लेता है और भारत में पाए जाने वाले चंदन की तो बात ही कुछ और है। इसकी भीनी-भीनी और मनभावन खुशबू देश के महान इतिहास और विरासत से जुड़ी हुई है। शायद, यही वजह है कि एक सदी से भी अधिक समय के बाद भी शुद्ध चंदन की लकड़ियों से बने ‘मैसूर सैंडल सोप’ का भारतीय दिलों में एक विशेष स्थान है। 

आइये आज आपको बताते हैं भारत में सर्वाधिक पसंद किए जाने वाले चंदन के साबुन की दिलचस्प कहानी।

इस साबुन का इतिहास मैसूर के शाही परिवार से जुड़ा हुआ है। मई 1916 में, यहाँ के तत्कालीन शासक कृष्ण राजा वोडियार चतुर्थ और दीवान मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया ने चंदन की लकड़ी से तेल निकालने के लिए एक कारखाना स्थापित किया था।

इस परियोजना का मूल उद्देश्य चंदन की लकड़ियों के अतिरिक्त भंडार का उपयोग करना था, क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान चंदन का व्यापार थम जाने की वजह से इसका ढेर लग गया था। उस वक्त मैसूर में पूरी दुनिया में सर्वाधिक चंदन का उत्पादन होता था।

इसके दो वर्षों के बाद, महाराजा को चंदन तेल से बने साबुन के दुर्लभ सेट को उपहार के रूप में दिया गया। इससे उन्हें अपनी प्रजा के लिए भी ऐसा ही साबुन बनाने का विचार आया और उन्होंने अपने इस विचार को तुरंत अपने दीवान से साझा किया। फिर, राज्य में औद्योगिक विकास की आवश्यकताओं को देखते हुए दोनों ने इस पर तुरंत कार्य शुरू किया।

हर काम को बेहद कुशलता से करने वाले विश्वेश्वरैया एक ऐसा साबुन बनाना चाहते थे, जो गुणवत्ता में अच्छे होने के साथ-साथ लोगों के लिए सस्ता भी हो। इसके लिए उन्होंने बॉम्बे (अब मुंबई) के तकनीकी विशेषज्ञों को आमंत्रित किया और भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के परिसर में साबुन बनाने के प्रयोगों की व्यवस्था की। मजेदार बात यह है कि इस संस्थान की स्थापना साल 1911 में मैसूर के एक और दिग्गज दीवान के. शेषाद्री अय्यर के प्रयासों से हुई थी!

साबुन बनाने के लिए उसका औद्योगिक विकास अनिवार्य था, इसके लिए उन्होंने आईआईएससी में हो रहे शोध में शामिल प्रतिभाशाली युवा औद्योगिक रसायनज्ञ सोसले गरलापुरी शास्त्री को इंगलैंड भेजा, ताकि वह साबुन बनाने की तकनीकों के बारे में ज्ञान अर्जित कर सकें। सोसले गरलापुरी को कई लोगों द्वारा ‘साबुन शास्त्री’ के रूप में भी याद किया जाता है।

आवश्यक ज्ञान हासिल करने के बाद शास्त्री तुरंत मैसूर लौटे, जहाँ महाराजा वोडियार चतुर्थ और दीवान उनका बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। उन्होंने शुद्ध चंदन तेल से साबुन बनाने की प्रक्रिया तैयार की और इसके बाद बेंगलुरु स्थित के आर सर्कल के पास सरकारी साबुन कारखाने की स्थापना की गई।

ठीक इसी साल, मैसूर में चंदन की लकड़ी से तेल निकालने के कारखाने को स्थापित किया गया, ताकि साबुन बनाने वाली इकाई में तेल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित हो सके। साल 1944 में, शिवमोगा में एक और इकाई की स्थापना की गई। एक बार जब यह साबुन बाजार में उतरा, तो यह न केवल अपने रियासत में, बल्कि पूरे देश में काफी तेजी से लोकप्रिय हो गया।

हालांकि, शास्त्री यहीं नहीं रुके और उन्होंने चंदन के तेल से इत्र भी बनाया। इसके बाद, उन्होंने मैसूर सैंडल सोप को एक अलग आकार और पैक में लाने का फैसला किया। उन दिनों, साबुन सामान्यतः आयताकार होने के साथ-साथ पतले, चमकदार और चमकीले रंग के कागज में पैक होते थे। साबुन को आसानी से बाहर निकालने के लिए उन्होंने इसे अंडाकार आकार दिया।

भारतीयों के आभूषण प्रेम को जानते हुए, शास्त्री ने आभूषण के डिब्बे से मिलते-जुलते आयताकार डिब्बे को तैयार किया, जिसमें फूल के प्रिंट और बेहद बारीकी से चुने गए रंगों का उपयोग किया गया था। कंपनी के लोगो के लिए उन्होंने, शराबा (स्थानीय लोक कथाओं के अनुसार एक हाथी के सिर और शेर के शरीर से बना एक पौराणिक प्राणी) को चुना था, जो साहस और ज्ञान का प्रतीक था और शास्त्री चाहते थे कि यह राज्य की समृद्ध विरासत का प्रतीक हो।

वहीं, मैसूर सैंडल सोप के डिब्बे पर ‘श्रीगंधा तवरिनिंडा’ का संदेश मुद्रित होता था, जिसका अर्थ है – चंदन के मातृ गृह से। इस सुगंधित साबुन को आभूषण दुकानों में गहने को पैक करने के समान ही मुलायम सफेद कागज में लपेटा जाता था। 

History of mysore sandal soap
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इसके बाद उत्पाद का दायरा बढ़ाने के लिए बेहद व्यवस्थित और सुनियोजित  प्रचार अभियान के तहत पूरे देश में साइनबोर्ड लगाए गए। साबुनबॉक्स की तस्वीरें ट्राम टिकट से लेकर माचिस की डिब्बी तक, हर जगह नजर आने लगी थी। यहाँ तक​ ​कि कराची में साबुन का प्रचार करने के लिए एक ऊंट जुलूस का भी आयोजन किया गया था!

इन्हीं सब चीजों के परिणामस्वरूप, साबुन की मांग ने भारत और दूसरे देशों में नई ऊंचाइयों को छुआ, यहाँ तक कि दूसरे देशों के शाही परिवारों ने भी इसे अपने लिए मंगवाया। कंपनी के लिए एक और महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब 1980 में, मैसूर और शिवमोगा की तेल निकालने वाली इकाइयों को एक साथ मिलाकर, कर्नाटक साबुन और डिटर्जेंट लिमिटेड नाम के एक कंपनी में सम्मिलित कर लिया गया था।

हालाँकि, 1990 के दशक की शुरुआत में, बढ़ती बहुराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा, घटती मांग, और बिक्री और उत्पादन विभागों के बीच तालमेल की कमी की वजह से राज्य द्वारा संचालित इस कंपनी को काफी कठिनाइयों को सामना करना पड़ा। नुकसान को बढ़ते देख, उसे बीआईएफआर (बोर्ड फॉर इंडस्ट्रियल एंड फाइनेंशियल रीकंस्ट्रक्शन) द्वारा राहत पैकेज दिया गया और केएसडीएल ने इस जीवनदान का पूरा फायदा उठाया।

इसके बाद, कंपनी ने अपने कामकाज के तरीके को सुव्यवस्थित किया और जल्द ही इसने बाजार में अपनी धाक फिर से जमा लिया। इस तरह, साल-दर-साल बढ़ते मुनाफे की बदौलत, कंपनी ने 2003 तक अपने सभी कर्जों को चुका दिया। कंपनी ने अपने अन्य साबुनों के साथ अगरबत्ती, तेल, हैंड वॉश, टेल्क पाउडर  आदि में भी विविधता लाई।

बहरहाल, मैसूर सैंडल सोप आज भी कंपनी का सबसे प्रमुख उत्पाद है और यह दुनिया का एकमात्र साबुन है जो सौ फीसदी शुद्ध चंदन के तेल से बनाया जाता है। साथ ही, इसमें पैचौली, वीटिवर, नारंगी, जीरियम और पाम गुलाब जैसे अन्य प्राकृतिक तेलों का भी उपयोग किया जाता है। यही कारण है कि यह साबुन अप्रवासी भारतीयों की खरीदारी की सूची में भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

साल 2006 में, इसे एक भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग से सम्मानित किया गया था – इसका अर्थ है कि चंदन का साबुन कोई भी बना और बेच सकता है, लेकिन मैसूर सैंडलवुड सोप होने का दावा सिर्फ केएसडीएल ही कर सकता है।

बाजार में चंदन तेल से बने इस साबुन की भारी माँग का ही नतीजा है कि केएसडीएल कर्नाटक के उन चुनिंदा सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में से एक है, जो निरंतर लाभ कमा रहा है। कंपनी ने  2015-16 में 476 करोड़ रुपए का कारोबार किया था। इस तरह यह एक ऐसी विरासत है, जिस पर राज्य को गर्व है। आलम यह है कि कर्नाटक का उन्नतिशील फिल्म उद्योग भी खुद को ‘सैंडलवुड’ कहता है।

आज, बाजार में ब्रांडेड साबुनों की कोई कमी नहीं है, लेकिन मैसूर सैंडल सोप का एक विशिष्ट महत्व है। चंदन की उपलब्धता में कमी के बावजूद इसका उत्पादन निरंतर बढ़ता जा रहा है। 

इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए केएसडीएल की ओर से किसानों के लिए ‘ग्रो मोर सैंडलवुड’ कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जो चंदन के सस्ते पौधों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ खरीदारी की भी गारंटी प्रदान करता है। कंपनी वन विभाग के साथ संयुक्त रूप से काम करते हुए, यह सुनिश्चित कर रही है कि तेल के लिए काटे गए हर पेड़ के बदले, एक चंदन का पौधा लगाया जाए।

मैसूर सैंडल सोप की कहानी और बाजार में इसकी उपस्थिति न केवल भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए बल्कि पूरे एफएमसीजी क्षेत्र के लिए एक प्रेरणा का स्त्रोत है। उम्मीद है कि इसका भविष्य भी इसके इतिहास की तरह ही खुशबू बिखेरते रहेंगे।

मूल लेख- sanchari Pal 

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राजनीतिक और सामाजिक मामलों में गहरी रुचि रखनेवाले देवांशु, शोध और हिन्दी लेखन में दक्ष हैं। इसके अलावा, उन्हें घूमने-फिरने का भी काफी शौक है।
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