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Farm Of Happiness: मुंबई की रेस छोड़, गाँव की संतुष्टि से बनाया अपना खुशियों का खेत

Farm of Happiness में आकर न सिर्फ आप गाँव के जीवन को महसूस कर सकते हैं, बल्कि अपने खाने और उसके बनने की प्रक्रिया से भी परिचित हो सकते हैं।

आकाशी झेप घे रे पाखरा
सोडी सोन्याचा पिंजरा
(अपने सोने का पिंजरा छोड़,
मुक्त गगन की ओर उड़ान भर ऐ पंछी)

मराठी साहित्यकार व गीतकार जगदीश खेबुडकर की ये पंक्तियाँ एक पंछी को सोने का पिंजरा छोड़, आज़ाद हवा में साँस लेने को कहती हैं।
पर पिंजरा छोड़ना कहाँ आसान होता है? वह भी सोने का?

मुंबई में 22 साल से एडवरटाइजिंग जगत में काम करने वाले राहुल कुलकर्णी और मराठी नाटक, टी.वी और फिल्मों की जानी-मानी अभिनेत्री उनकी पत्नी संपदा कुलकर्णी के लिए भी मुंबई शहर की चकाचौंध और सुख-सुविधाओं को छोड़कर कोंकण के एक छोटे से गाँव, फुणगुस में एक फार्म-स्टे बनाना इतना आसान नहीं था।

“पर आप कब तक भागेंगे। कहीं न कहीं तो रुकना पड़ेगा न? जीना पड़ेगा न? हम रुके और शायद इसलिए आज हम जी रहे हैं,” चेहरे पर समाधान की मुस्कान लिए संपदा अपने ‘Farm Of Happiness’ (ख़ुशियों का खेत) से कहती हैं।

उधर राहुल एक लक्ष्य लिए चले हैं। वह चाहते हैं कि उनका ‘फार्म ऑफ हैप्पीनेस’ केवल एक एग्रो टूरिज्म स्पॉट बनकर न रह जाए, बल्कि यहां जो भी आए, वह अपने खाने से भलीभांति परिचित होकर अपने घर जाए।

“इस साल मैंने हापुस को फरवरी में बाज़ार में आते देखा, तो मैं दंग रह गया। नैसर्गिक तरीके से हापुस अप्रैल या मई से पहले आपके खाने के लिए तैयार हो ही नहीं सकता। पर गलती हमारी है। हमें हर चीज़ बारोमास मांगने की आदत पड़ गई है और बाज़ार को उस डिमांड को पूरा करके मुनाफा कमाने की। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि हममें लेटेस्ट कार या मोबाइल के सारे फीचर्स जानने की उत्सुकता तो है, लेकिन हर रोज़ हमारे शरीर में जा रहे खाने के बारे में जानने की कोई ललक नहीं है। मैं चाहता हूँ, लोग यहां आएं और जाते हुए कम से कम इस ललक को साथ ले जाएं।”

इन दोनों की बेटी शर्वरी की सोच ज़रा हटकर है। अपनी माँ की तरह ही, फिल्मी दुनिया में कदम रख चुकी शर्वरी, गाँव और शहर के बीच का पुल बनना चाहती हैं। वह इन दोनों के बीच के तालमेल को बनाए रखना चाहती हैं।

शायद इन तीनों के इसी ताल-मेल का असर है कि ‘फार्म ऑफ़ हैप्पीनेस’ को ट्रिप एडवाइजर ने 2018, 2019 और अब 2020 में भी तीन साल तक लगातार ट्रैवेलर्स चॉइस विनर चुना है।

इन तीनों की दुनिया बेशक आज बेहद खूबसूरत और लुभावनी लग रही हो, पर सच तो यह है कि यहां तक पहुँचने में इन्हें पूरे 13 साल लगे।

फार्म ऑफ हैप्पीनेस से पहले सिटी ऑफ स्ट्रेस

साल 1992 – जे. जे स्कूल ऑफ़ आर्ट्स से निकलकर एक होनहार नौजवान एडवरटाइजिंग की चकाचौंध भरी दुनिया में दाखिल होता है। शुरू में तो सब चमकदार लगता है, पर धीरे-धीरे वह गाड़ी, बंगला , लेटेस्ट मोबाइल, ब्रांडेड कपड़े और सभी कृत्रिम सुखों की अंधी दौड़ में कब शामिल हो जाता है, उसे पता ही नहीं चलता।

देखते-देखते 15 साल गुज़र जाते हैं और वह इस रेस में दौड़ता हुआ अचानक थककर बैठ जाता है। ऐसे में आज भी जो उसे सुकून देता है वह होती है उसके बचपन की याद, जब वह कोंकण में बसे अपने पैतृक गाँव फुणगुस जाया करता था। उसे याद आता है कि उसके पिता भी वहीं वापस जाना चाहते थे, खेती करना चाहते थे पर आर्थिक और पारिवारिक परिस्तिथियों ने उन्हें इस सपने को पूरा करने से हमेशा रोके रखा।
यही वह पल था जब वह फैसला करता है कि वह अपने पिता के सपने के इस क़र्ज़ को चुकाएगा और शहर की इस रेस से बाहर निकलकर अपने ‘ख़ुशियों का खेत’ बनाएगा।

यह नौजवान हैं हमारी कहानी के नायक राहुल कुलकर्णी, जो अपने कॉरपरेट की नौकरी से इतना थक चुके थे कि इसका असर न सिर्फ उनके शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी होने लगा था।

“मैं थक चुका था। यह साल 2005 की बात है। मैंने अपनी पत्नी संपदा से कहा कि अब मैं यह छोड़ना चाहता हूँ। पर मुझे नहीं पता था कि मैं आगे क्या करना चाहता हूँ। इस बात का श्रेय संपदा को ही जाता है कि उसने इसे सरल बनाते हुए कहा कि अगर मेरा यहाँ मन ही नहीं लगता तो मुझे यह छोड़ देना चाहिए और अपने मन का कुछ करना चाहिए।”

संपदा और राहुल की मुलाकात कॉलेज के दिनों में ही थिएटर करते हुए हुई थी और 1995 में वे विवाह के बंधन में बंध चुके थे। इतने सालों में जहाँ राहुल ने एडवरटाइजिंग की दुनिया की ऊंचाईयां हासिल की थीं, वहीं संपदा एक जानी-मानी अभिनेत्री बन चुकी थीं।

“अब तक मैंने हमेशा पैसों को सेकेंडरी रखा था। पैसे कमाने का ज़्यादा भार राहुल ने ले रखा था और मैं अपने मन का काम ही लेती थी। पर अब मैंने सोचा कि जो राहुल मेरे लिए अब तक करते आ रहे थे, अब वही उनके लिए मेरे करने की बारी थी। मैंने अपनी माँ को भी यही करते देखा था। जब मेरे पिता को अपनी बीमारी की वजह से नौकरी छोड़नी पड़ी थी तो माँ ने ही हम तीन बहनों की और मेरे पिता की भी ज़िम्मेदारी उठायी थी। वह हमेशा हम तीनों से कहतीं कि, ‘जो सीखा है उसका इस्तेमाल भी करो। तुम्हें घर पर बैठने के लिए नहीं पढ़ाया है। जब ज़रूरत पड़े तो अपने हुनर का इस्तेमाल अपने पति की आर्थिक मदद करने के लिए भी करो।’ शायद यही सीख थी जिसकी वजह से जब राहुल ने जॉब छोड़ने का फैसला लिया तो मुझे बिलकुल भी झिझक नहीं हुई यह कहने में, कि मैं हूँ… तुम अपने सपनों को जियो,” संपदा कहतीं हैं।

हालाँकि, अब तक राहुल को बिलकुल नहीं पता था कि आखिर वह करना क्या चाहते हैं।

आखिर कौन सी राह चुने?

खेती राहुल के खून में थी। कोंकण में उनके परिवार की पैतृक ज़मीनें भी थीं, जहाँ की यादें हमेशा उन्हें लुभातीं थीं।

“कोंकण बड़ी सुंदर जगह है लेकिन यहाँ आकर बसने के ख्याल से लोग डर जाते हैं। क्योंकि यहाँ शांति और सुकून तो है पर शहरों के मापदंड के हिसाब से सुविधाएँ नहीं हैं। इसके बावजूद मुझे बचपन से ही इस जगह से प्यार था। इसलिए मुझे लगा कि शायद यही रास्ता मेरे लिए सही है,” राहुल ने कहा।

इसी दौरान राहुल और संपदा का कूर्ग में एक फार्म स्टे पर जाना हुआ। यहाँ एक किसान, जो भी उगाता था वही अपने मेहमानों को परोसता था। यह इन दोनों के लिए बिलकुल नया और खुशनुमा एहसास था।

‘अरे, हमारे खेत पर भी तो ऐसा कुछ किया जा सकता है!’ राहुल ने सोचा।

इसी क्रम में फार्म स्टे को समझने के लिए वे और कई फार्म स्टे पर जाने लगें। और फिर नेरल के एक होम स्टे सगुणाबाग में रहते हुए उनकी मुलाकात वहां के संस्थापक शेखर भाड़सावले से हुई।

यहाँ उन्हें असल में एग्रो टूरिज़्म का मतलब और मक़्सद दोनों मिल गए। शेखर जी ने ही उन्हें इस सच्चाई से परिचित करवाया कि आज देश में दरअसल खाद्य की कितनी किल्लत है। आज से 100 साल पहले हर कोई अपना खाना खुद उगाता था। पर धीरे-धीरे पैसे कमाने वाले तो बहुत हो गए पर खाना उगाने वाले कम। आज के युवा वर्ग को तो पता भी नहीं कि उनकी थाली में जो भी है वह क्या है, आता कहाँ से है, खाने लायक है भी या नहीं?

“आप पैसों से सब कुछ खरीद सकते हैं। आप जितनी तरक्की करेंगे आपके पास उतने ही क्रेडिट कार्ड्स होंगे। पर भूख लगने पर क्या आप इन क्रेडिट कार्ड्स को चबाकर खा सकते हैं?” – शेखर के इस सवाल ने राहुल और संपदा को अंदर तक झकझोड़ दिया।

“इसका हमें एक ही हल दिखाई दिया कि जिनके पास ज़मीन है, कम-से-कम वे तो इसे खाली न रहने दें। अब हमें अपनी ज़मीन पर सिर्फ फार्म स्टे नहीं बनाना था। अब हमें वहां सब कुछ उगाना था और वहां आनेवाले लोगों को भी उनके खाने से पहचान करानी थी।”

मंज़िल अभी दूर….

रास्ता मिल चुका था। पर मंज़िल अभी बहुत दूर थी। शहरी दौड़ को छोड़ने के लिए ज़रूरी था कि इसके EMI के चक्रव्यूह से भी निकला जाए। इसलिए राहुल और संपदा ने तय किया कि इस नये सफर को वे बिना किसी लोन के शुरू करेंगे।
पुराने EMI चुकाने के लिए ज़रूरी था कि राहुल कुछ साल और नौकरी करते। इसलिए अब वह सिर्फ वीकेंड पर गाँव जाने लगे और खेती को समझने लगे।
इधर संपदा ने भी अपने काम की गति बढ़ा दी। उनकी बेटी शर्वरी के लिए यह सब नया था।

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संपदा बतातीं हैं कि शर्वरी के लिए मुश्किल था समझना कि जब उसकी क्लास में सबके पास साइकिल है तो उसे क्यों नहीं मिल रही।

“पर हम उसे समझाते कि हम कुछ ऐसा कर रहे हैं जो आनेवाले दिनों के लिए बहुत ज़रूरी है। धीरे-धीरे वह समझने लगी और जब तक उसके मोबाइल लेने की उम्र हुई तो उसने खुद ही पूछा कि क्या हम ये ले सकते हैं या 6 महीने रुककर भी ले तो कोई बात नहीं,” संपदा हँसते हुए बताती हैं।

शर्वरी का मानना है कि आज जो ठहराव उनमें है, वह शायद इसी वजह से है।

साल 2010, इस परिवार के लिए कई और चुनौतियाँ लेकर आया। राहुल की नौकरी जाती रही। ऐसे में उन्होंने अपनी पॉलिसी तक बेच दी पर खेत का काम रुकने नहीं दिया।

“हमने अपनी सारी सेविंग्स इसमें लगा दी। एक बार जब हमने अपने खेतों पर काम करने के लिए कुछ स्थानीय गाँववालों को जोड़ लिया, तो हम दोनों ने ही यह तय किया कि हम उनकी तनख्वाह रुकने नहीं देंगे चाहे जो हो जाए,” राहुल कहते हैं।

जल्द ही स्थिति बदली और राहुल को 6 महीने बाद एक बेहतर नौकरी मिल गयी। इससे खेत और होमस्टे दोनों का काम सुचारु रूप से चलने लगा।

आखिर वह दिन आया

जब आर्थिक तौर पर स्थिति सम्भली तब जाकर, साल 2014 में राहुल ने आखिरकार नौकरी छोड़ दी। अब राहुल एक कंसलटेंट के तौर पर स्वतंत्र काम करने लगे थे। हर हफ्ते राहुल चार दिन गाँव में होते और 3 दिन शहर में।

और आखिर तिनका-तिनका जोड़कर पूरे 6 सालों में बनकर तैयार हुआ राहुल, संपदा और शर्वरी का ‘Farm of Happiness’

“लोगों ने पूछना शुरू कर दिया था कि हम साथ है भी या नहीं। पर संपदा ने कभी मुझे टूटने नहीं दिया,” राहुल कहते हैं।

उधर संपदा का मानना है कि जब-जब वह कमज़ोर पड़ी तो राहुल ने उन्हें मज़बूत बनाया, “कई लोग मुझसे कहते कि तुम उसका साथ क्यों दे रही हो? इसका कोई परिणाम नहीं निकलने वाला। वह सिर्फ समय गँवा रहा है। पर मुझे राहुल पर पूरा विश्वास था। मुझे पता है कि अगर वह कोई काम हाथ में लेता है तो उसे पूरा करके छोड़ता है।”

राहुल ने इंटरनेट और किताबों से खेती का ज्ञान हासिल करना तो शुरू कर ही दिया था, पर उनके मुताबिक खेती का असली ज्ञान तो कीचड़ में उतरकर ही हासिल किया जा सकता है।

“जब मैं असल में खेती में दाखिल हुआ तो मुझे पता लगा कि यहाँ तो हर दिन सीखना है। हम कई चीज़ें इसलिए नहीं खाते क्योंकि हमें पता ही नहीं कि उसे खाते कैसे हैं, इसलिए उनकी डिमांड भी नहीं करते। खाने की चीज़ों का औद्योगीकरण हो जाने से किसान आज उन चीज़ों को उगा ही नहीं रहा है जिनकी डिमांड नहीं है। यह एक चेन बनता जा रहा है और हम कई गुणी सब्ज़ियों और फलों को खोते चले जा रहे हैं। उदहारण के तौर पर जब मैंने सुुुरन की सब्ज़ी खायी तो मुझे वह बहुत टेस्टी लगी। मैंने गूगल किया तो पाया वह कितनी पौष्टिक भी है। मैं उस पर किताबें भी खरीद लाया। और फिर सोचने लगा कि फिर हम सब सिर्फ आलू ही क्यों खाते हैं? जवाब वही था – औद्योगीकरण और वही डिमांड और सप्लाई का खेल। इसका एक ही उपाय था कि डिमांड करनेवाले लोगों को अपने खाने के बारे में पूरी जानकारी हो। “

इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए 2017 में राहुल शहरी जीवन को छोड़, पूरी तरह खेती में जुट गए।

क्या है ‘Farm Of Happiness’?

कहने को तो ‘फार्म ऑफ़ हैप्पीनेस’ कोंकण के एक छोटे से गाँव में बसा एक फार्म स्टे है, पर यहां आने वाले यात्रियों के लिए यह उससे कई बढ़कर है।

ट्रिप एडवाइजर पर ‘फार्म ऑफ़ हैप्पीनेस’ के रिव्यू देखिये और आपको पता चलेगा कि राहुल और संपदा ने कितने सारे लोगों के दिलों में जगह बना ली है।
यहाँ आये हर मेहमान का कहना है कि उनके लिए ‘फार्म ऑफ़ हैप्पीनेस’ उनके दूसरे घर की तरह बन गया है, जहाँ वे बार-बार आना चाहते हैं।

इन्हीं मेहमानों में से एक शिल्पा वोरा का कहना है कि ख़ुशियों के खेत के इस ट्रिप ने उनकी आँखें खोल दी। अब उन्हें समझ में आता है कि कैसे प्रकृति अपने-आप ही उसकी हर चीज़ का ध्यान रखती है और हमें इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

इनकी वेबसाइट पर आप मौसम के हिसाब से उगाई जा रही फसल भी देख सकते हैं। वह कौन से महीने में किस स्टेज में होगा इसका भी ब्यौरा दिया गया है। इसी के हिसाब से आप अपनी बुकिंग कर सकते हैं और उस फसल को उगाने की प्रक्रिया का हिस्सा बन सकते हैं।

“जब लोग यहाँ आते हैं, खेत से सीधा उनकी प्लेट पर पहुंचे खाने को चखते हैं, तब उनके मन में प्रश्न उठते हैं कि ये भिंडी इतनी टेस्टी कैसे है? या मेरे पति तो बैंगन खाते ही नहीं और यहाँ इतने चाव से कैसे खा रहे हैं? तब हम उन्हें आर्गेनिक, ओपन पोलिनेटेड और हाइब्रिड का अंतर बताते हैं। फिर उनके मन में इससे सम्बंधित और भी प्रश्न जागते हैं। तब मैं उन्हें उनकी इस जिज्ञासा को शांत करने सफर को खुद तय करने के लिए कहता हूँ। क्योंकि हम आज भी इस विषय के नवनीत गाइड नहीं हैं। हमारा मकसद बस आपमें इस जिज्ञासा को जन्म देना है ताकि इसके आगे की यात्रा आप खुद पूरी कर सके।”

राहुल और संपदा ने अपने ख़ुशियों का खेत तो बना लिया पर क्या अड़चनें ख़त्म हो गईं?

“नहीं! अड़चनें आज भी हैं। और वो कहाँ नहीं हैं? बस आपको तय करना है कि किन अड़चनों को सुलझाने में आपको मज़ा आता है। मुझे यहाँ की अड़चनों को सुलझाने में मज़ा आता है और इसलिए अड़चनें कभी अड़चनें लगीं ही नहीं,” राहुल मुस्कुराते हुए कहते हैं।

आज जिन लोगों ने राहुल और संपदा को ऑर्गेनिक फार्मिंग की ओर मुड़ने से रोका था वही उनसे इसके तरीके समझने आते हैं। जिन्हें उनका यह सपना नामुमकिन लगता था, आज वही उन्हें अवार्ड्स मिलने पर बधाईयों के सन्देश पहुँचाते हैं।

तो क्या है सार इनके इस पूरे सफर का

“1. कष्ट से कभी मत भागो। दुनिया में कोई ऐसा काम नहीं है जिसमें कष्ट न हो। किसी भी सपने को पूरा करने के लिए कष्ट तो करना ही होगा।
2. जब जब हम कुछ बड़ा करने जाते हैं तो कहीं न कहीं जीना भूल जाते हैं। बड़े सपने देखो पर उन्हें पूरा करने के लिए जीना मत छोड़ दो।
3. दूसरे के सपनों के डेफिनेशन को अपने पर लागू मत करो। अपने सपने खुद चुनो। बस, उन सपनों के कुछ दायरे तय करो और उन्हीं के भीतर रहो, आगे बढ़ते हुए उनमें ‘थोड़ा और’ मत जोड़ों।
4. बदलाव कभी आसान नहीं होता, चाहे वह गाँव से शहर जाना हो या शहर से गाँव आना। इस राह पर कई चुनौतियाँ होती हैं इसलिए इसमें आपके जीवनसाथी का साथ होना बहुत ज़रूरी है।
5. अगर आप क्वांटिटी के पीछे भागेंगे तो क्वालिटी पर असर होगा। रुको। प्रकृति को समझो। उसे अपना काम करने दो और उसका सम्मान करो। क्योंकि प्रकृति रहेगी तभी हम रहेंगे।”

जीवन के ये पांच अद्भुत सार देते हुए सम्पदा, राहुल और शर्वरी हमसे विदा लेते हैं।

केंद्र और महाराष्ट्र सरकार द्वारा टूरिज़्म पर लगाई गयी पाबंदियाँ हटने के बाद, अब सभी सावधानियों के साथ यहाँ के द्वार आपके स्वागत के लिए खुले हैं। हम आपको यकीन दिलाते हैं कि आपका पसंदीदा गीत राहुल की बांसुरी पर सुनते हुए या इस दंपती के साथ कईं मज़ेदार बातें करते हुए अगर आप कुछ दिन इनके खेत पर बिताएंगे तो आप भी प्रकृति को बचाने की इस मुहिम से जुड़े बिना नहीं रह पाएंगे।
तो देर किस बात की, उनकी वेबसाइट पर जाएँ और आज ही बुकिंग करे। आप चाहे तो बुकिंग से पहले 7620775521 पर कॉल कर, सारी जानकारी भी ले सकते हैं।


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संपादन – पार्थ निगम

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Written by मानबी कटोच

मानबी बच्चर कटोच एक पूर्व अभियंता है तथा विप्रो और फ्रांकफिंन जैसी कंपनियो के साथ काम कर चुकी है. मानबी को बचपन से ही लिखने का शौक था और अब ये शौक ही उनका जीवन बन गया है. मानबी के निजी ब्लॉग्स पढ़ने के लिए उन्हे ट्विटर पर फॉलो करे @manabi5

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