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79 वर्षीया परदादी ने 10 साल पहले सीखी पिछवाई चित्रकला, जीवन की सांझ में बनाई अपनी पहचान

79 वर्षीया परदादी ने 10 साल पहले सीखी पिछवाई चित्रकला, जीवन की सांझ में बनाई अपनी पहचान

महीन कारीगिरी से बने इस एक चित्र को बनाने में करीब 3-4 दिन लग जाते हैं, और दादी ऐसे 300 चित्र दोस्तों और रिश्तेदारों को यूँही बाँट चुकी हैं।

कहते हैं कि यदि आपकी इच्छाशक्ति मजबूत है तो आप कुछ भी कर सकते हैं, उम्र कभी बाधा बनकर सामने नहीं आती है। आज कितने ही ऐसे उदहारण हमारे बीच हैं, जब साबित हुआ है कि उम्र महज़ एक संख्या है! चाहे फिर वह 90 वर्ष से ऊपर की एक दादी का दसवीं की परीक्षा देना या फिर एक 90 साल की दादी का अपना व्यवसाय शुरू करना।

उम्र, इंसान को कुछ करने से रोक नहीं सकती है बल्कि मुझे लगता है कि रिटायरमेंट के बाद इंसान को अपने शौक को पूरा करने की आज़ादी मिलती है। वह आज़ादी जो ज़िंदगी की दोपहर में परिवार की जिम्मेदारियों के चलते नहीं मिल पाती है। पर अपनी ढलती उम्र में आप अपने मन के बल पर अपने जीवन के नए अध्याय की शुरुआत कर सकते हैं।

जैसा कि गुजरात में अहमदाबाद की रहने वाली 79 वर्षीया सुवर्णा सुरेंद्र सोनी कर रही हैं। अपने चारों बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर अब वह अपने हुनर को नई पहचान दे रही हैं। वह हुनर जिसे उन्होंने पिछले 10 सालों में पहचाना और तराशा है।

Suvarna Soni

सुवर्णा घंटों बैठकर रत्न और मोतियों से श्रीनाथ महाराज और कृष्ण भगवान के चित्र बनाती हैं और अपने जान-पहचान वालों को उपहार स्वरूप देती हैं। दिल छूने वाली बात यह है कि वह इन चित्रों के कोई पैसे नहीं लेतीं। अब तक वह 300 से भी ज्यादा ऐसे चित्र गिफ्ट कर चुकी हैं।

सुवर्णा की बेटी तृप्ति सोनी बताती हैं, “मेरे नानाजी का परिवार चितनिया परिवार था, जिसका मतलब होता है चित्रकार। रिटायरमेंट के बाद नानाजी कभी-कभी पेंटिंग करते थे और उन्हें यह हुनर उनकी पुश्तों से विरासत में मिला था। पर उनके किसी भी बच्चे ने इसे नहीं अपनाया। मेरी मम्मी अपने भाई-बहनों में 8वें नंबर की हैं। उन्होंने कभी अपने बचपन या फिर बाद में इस बात पर गौर नहीं किया कि उनमें अपनी पिता का यह हुनर हो सकता है।”

अब से 10 वर्ष पहले तृप्ति के पिता सुरेंद्र सोनी का देहांत हो गया और उनके जाने के बाद उनकी माँ एकदम अकेली हो गईं। सुवर्णा ने अपनी ज़िंदगी अपने पति और परिवार के इर्द-गिर्द ही गुजारी है और अचानक से उनके पति की मौत ने उनके जीवन में एक खालीपन भर दिया था।

With her husband and 4 generations in 1 frame

तृप्ति और उनके भाई-बहनों ने उनके इस खालीपन को दूर करने के प्रयास किए लेकिन अपनी जिम्मेदारियों के चलते वह हर समय उनके पास नहीं रह सकते थे। ऐसे में, सभी को यही चिंता रहती कि माँ को किस तरह से इस अकेलेपन से बाहर लाया जाए।

“मेरी बड़ी बहन, दीप्ती अक्सर श्रीनाथ जाती हैं और वहाँ से एक बार वह ऐसे ही मम्मी के लिए एक आर्ट किट ले आईं। जिसमें श्रीनाथ महाराज का चित्र बनाने का सामान था- एक लकड़ी का कट-आउट और उसे सजाने के लिए मोती आदि। उन्होंने मम्मी को यह गिफ्ट किया और हम सबने मम्मी को एक बार ट्राई करने के लिए कहा,” उन्होंने आगे बताया।

सुवर्णा भी पहले कई बार नाथद्वारा गई हैं और वहां पर उन्होंने कलाकारों को यह करते हुए देखा था। उन्होंने जो देखा वही उनके ध्यान में था और उसी के आधार पर उन्होंने यह चित्रकला शुरू की। थोड़े वक़्त बाद से ही उन्हें यह करना अच्छा लगने लगा और उनका हुनर भी निखरा। अब आलम यह है कि इस काम में उनका दिन कब बीत जाता है, उन्हें पता ही नहीं चलता।

सुवर्णा कहतीं हैं, “कला हमारे खून में है लेकिन परिवार की जिम्मेदारियों में मुझे अपने संतोष के लिए कुछ करने का मौका नहीं मिला। मैंने अपने पति के जाने के बाद ही यह करना शुरू किया और वह भी सिर्फ इसलिए ताकि मुझे खालीपन न लगे। पर अब मुझे महसूस होता है कि यह मेरा पैशन है और मैं हर दिन इसमें और बेहतर करने की कोशिश करती हूँ।”

सुवर्णा जो कला करती हैं, वह नाथद्वारा की पिछवाई चित्रकला से संबंध रखती है। पिछवाई चित्र आकार में बड़े होते हैं और इन्हें कपड़े पर बनाया जाता है। पहले कलाकार श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं, प्रकृति, राजाओं की झांकी आदि का चित्रण इनमें किया करते थे। इन चित्रों को मंदिरों में लगाया जाता था और फिर धीरे-धीरे ये चित्र लोगों के घरों तक भी पहुँच गए।

पहले सिल्क के कपड़े पर पिछवाई के चित्रण में कलाकारों द्वारा हाथ से बनाए गए पत्थर के एवं प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता है। रंगों को पक्का करने के लिए बबूल का गोंद मिलाया जाता है। माँग के अनुसार इसमें सोने व चांदी के रंगों का प्रयोग भी किया जाता है। महँगी पिछवाई में असली सोने व चाँदी के काम की सजावट की जाती है। पर जैसे ही ये चित्र लोग अपने घरों में सजावट आदि के लिए लेने लगे तो इन्हें बनाने की प्रक्रिया में भी बदलाव हुए।

अब पिछवाई कई तरह से होने लगी है। छोटे-बड़े आकारों में आप पिछवाई चित्र खरीद सकते हैं। बाज़ार में श्रीनाथ जी और कृष्ण भगवान के पहले से ही तैयार कट-आउट भी मिल जाते हैं। लेकिन इन्हें बड़ी ही बारीकी से सजाना होता है ताकि खूबसूरत चित्र उभर कर आए।

One of her artworks

जैसा कि सुवर्णा करतीं हैं। वह अलग-अलग मोतियों, रंगों का इस्तेमाल करके इन कट-आउट्स को सजातीं हैं और फिर इन्हें फ्रेम करातीं हैं। सुवर्णा को यह काम करके बहुत ख़ुशी मिलती है और साथ ही, मन की शांति भी। वह कोई मंदिर या दूसरी धार्मिक जगह नहीं जातीं। उन्होंने अपने इस हुनर को ही अपनी पूजा बना लिया है। जब भी उनका कोई चित्र पूरा होता है तो उन्हें बहुत ही संतुष्टि मिलती है।

सबसे पहले उन्होंने एक चित्र बनाकर अपनी बेटी को दिया था। उनके जिस भी रिश्तेदार ने वह चित्र देखा, सभी ने उनसे बनाने के लिए कहा और उन्होंने भी ख़ुशी-ख़ुशी बनाना शुरू कर दिया। तृप्ति कहतीं हैं कि उनके मामाजी ने मुंबई से खासतौर पर उनकी माँ के लिए अलग-अलग प्रकार के मोती भेजे। सुवर्णा का हर एक चित्र दूसरे से अलग होता है। वह कोई भी डिज़ाइन एक जैसा नहीं बनाती हैं।

“पहले तो सभी रिश्तेदारों में उनके आर्टवर्क जाते थे। फिर वह जिस दुकान पर इन्हें फ्रेम करने के लिए देती हैं,वहां जिसने भी उनके काम को देखा। सबने उनसे बनाने के लिए कहा। मम्मी ने भी बिना कोई सवाल, कई फ्रेम इस तरह से अनजान लोगों के लिए भी बनाकर दिए हैं और वह भी बिना कोई पैसे के,” तृप्ति ने कहा।

Working on her artwork

सुवर्ण का काम बहुत बारीकी का है जिसे वह बिना कोई चश्मा आदि पहने करतीं हैं। उन्हें एक फ्रेम तैयार करने में 3 से 4 दिन लग जाते हैं। हर दिन सुबह नहा-धोकर, ब्रेकफ़ास्ट अदि कर वह अपनी मेज पर बैठ जाती हैं और दिन में 7 से 8 घंटे अपने काम में लगी रहतीं हैं। अब उन्हें अकेलापन नहीं लगता क्योंकि उन्हें एक मकसद मिल गया है।

वह कहतीं हैं, “उम्र के साथ, बहुत से लोगों को लगने लगता है कि उनकी अब कोई जरूरत नहीं है। लेकिन अगर आप खुद में तलाशें तो आपको ज़रूर कुछ ऐसा मिलेगा जो आपको ख़ुशी देगा। अपने इस पैशन को फॉलो करके आप अपनी आखिरी सांस तक संतोष से जी सकते हैं।”

बेशक, सुवर्णा सोनी न सिर्फ अपनी उम्र के लोगों के लिए बल्कि हम सबके लिए प्रेरणा हैं। उनसे हमें सीख मिलती है कि अपने पैशन को ढूंढ़कर उसे फॉलो करने का कोई सही समय या सही उम्र नहीं होती है। जिस पल आपको लगे कि यह काम आपको ख़ुशी देता है, उसी समय आपको उसमें जुट जाना चाहिए। साथ ही, बच्चों को भी अपने बुजुर्ग माता-पिता के शौक और हुनर को बढ़ावा देना चाहिए, जिस तरह तृप्ति और उनके भाई-बहनों ने किया है।

द बेटर इंडिया, इन दोनों माँ-बेटी की जोड़ी को सलाम करता है!

सुवर्णा सोनी जी से संपर्क करने के लिए आप उन्हें trinidi1964@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं।


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निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.
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