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वह मराठा रानी जिन्होंने अंग्रेज़ों के व्यापर के पीछे छिपे इरादों को पहचान, किया था पेशवा को आगाह!

हमदनगर के जामखेड में चोंडी गांव में जन्मी महारानी अहिल्याबाई मालवा राज्य की होलकर रानी थीं, जिन्हें लोग प्यार से राजमाता अहिल्याबाई होलकर भी कहते हैं।

उनके पिता मनकोजी राव शिंदे, गांव के पाटिल यानी कि मुखिया थे। जब गांव में कोई स्त्री-शिक्षा का ख्याल भी मन में नहीं लाता था तब मनकोजी ने अपनी बेटी को घर पर ही पढ़ना-लिखना सिखाया। हालाँकि अहिल्या किसी शाही वंश से नहीं थीं पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

दरअसल, पुणे जाते वक़्त उस समय मालवा राज्य के राजा या फिर पेशवा कहें, मल्हार राव होलकर चोंडी गांव में विश्राम के लिए रुके। तभी उनकी नज़र आठ साल की अहिल्या पर पड़ी, जो भूखों और गरीबों को खाना खिला रही थी। इतनी कम उम्र में उस लड़की की दया और निष्ठा को देख मल्हार राव होलकर ने अहिल्या का रिश्ता अपने बेटे खांडेराव होलकर के लिए माँगा।

साल 1733 को खांडेराव के साथ विवाह कर 8 साल की कच्ची उम्र में अहिल्याबाई मालवा आयी। पर संकट के बादल अहिल्याबाई पर तब घिर आये जब साल 1754 में कुम्भार के युद्ध के दौरान उनके पति खांडेराव होलकर वीरगति को प्राप्त हुए। इस समय अहिल्याबाई केवल 21 साल की थीं!

अपने पति की मृत्यु के पश्चात जब अहिल्याबाई ने सती हो जाने का निर्णय किया तो उनके ससुर मल्हार राव होलकर ने उन्हें रोक दिया। हर एक परिस्थिति में अहिल्या के ससुर उनके साथ खड़े रहे। पर साल 1766 में जब उनके ससुर भी दुनिया को अलविदा कह गए तो उनको अपना राज्य ताश के पत्तों के जैसा बिखरता नज़र आ रहा था।

उस वृद्ध शासक की मृत्यु के बाद राज्य की ज़िम्मेदारी अहिल्याबाई के नेतृत्व में उनके बेटे मालेराव होलकर ने संभाली। पर विधाता का आखिरी कोप उन पर तब पड़ा जब 5 अप्रैल, 1767 को शासन के कुछ ही दिनों में उनके जवान बेटे की मृत्यु हो गयी।

कोई भी एक औरत, वह चाहे राजवंशी हो या फिर कोई आम औरत, जिसने अपने पति, पिता समान ससुर और इकलौते बेटे को खो दिया, उसकी स्थिति की कल्पना कर सकता है। पर अपने इस दुःख के साये को उन्होंने शासन-व्यवस्था और अपने लोगों के जीवन पर नहीं पड़ने दिया।

अहिल्याबाई होलकर /Wikimedia

उन्होंने शासन-व्यवस्था को अपने हाथ में लेने के लिए पेशवा के समक्ष याचिका दायर की। 11 दिसंबर, 1767 को वे स्वयं इंदौर की शासक बन गयीं। हालाँकि राज्य में एक तबका था, जो उनके इस फैसले के विरोध में था पर होलकर सेना उनके समर्थन में खड़ी रही और अपनी रानी के हर फैसले में उनकी ताकत बनी।

उनके शासन के एक साल में ही लोगों ने देखा कि कैसे एक बहादुर होलकर रानी अपने राज्य और प्रजा की रक्षा मालवा को लूटने वालों से कर रही है। अस्त्र-शस्त्र से सज्जित हो इस रानी ने कई बार युद्ध में अपनी सेना का नेतृत्व किया। उन्हें अपने पसंदीदा हाथी पर बैठकर दुश्मनों पर तीर-कमान से वार करते हुए देखा जा सकता था।

उन्होंने अपने विश्वसनीय सेनानी सूबेदार तुकोजीराव होलकर (मल्हार राव के दत्तक पुत्र) को सेना-प्रमुख बनाया। मालवा की यह रानी एक बहादुर योद्धा और प्रभावशाली शासक होने के साथ-साथ कुशल राजनीतिज्ञ भी थीं। जब मराठा-पेशवा अंग्रेजों के इरादे न भांप पाए तब उन्होंने दूरदृष्टि रखते हुए पेशवा को आगाह करने के लिए साल 1772 में पत्र लिखा।

इस पत्र में उन्होंने अंग्रेजों के प्रेम को भालू के जैसे दिखावा बताते हुए लिखा, “चीते जैसे शक्तिशाली जानवर को भी अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर मारा जा सकता है पर भालू को मारना उससे भी मुश्किल है। इसे केवल सीधे उसके चेहरे पर ही मारा जा सकता है। क्योंकि अगर कोई एक बार इसकी पकड़ में आ जाये तो यह उसे गुदगुदी कर ही मार डाले। अंग्रेजों की भी कहानी ऐसी ही है इन पर विजय पाना आसान नहीं।”

इंदौर उनके 30 साल के शासन में एक छोटे से गांव से फलते-फूलते शहर में तब्दील हो गया। मालवा में किले, सड़कें बनवाने का श्रेय अहिल्याबाई को ही जाता है।

इसके अलावा वे त्योहारों और मंदिरों के लिए भी दान देती थी। उनके राज्य के बाहर भी उन्होंने उत्तर में हिमालय तक घाट, कुएं और विश्राम-गृह बनाए और दक्षिण में भी तीर्थ स्थानों का निर्माण करवाया। भारतीय संस्कृतिेकोश के मुताबिक अहिल्याबाई ने अयोध्या, हरद्वार, कांची, द्वारका, बद्रीनाथ आदि शहरों को भी सँवारने में भूमिका निभाई। उनकी राजधानी माहेश्वर साहित्य, संगीत, कला और उद्योग का केंद्रबिंदु थी। उन्होंने अपने राज्य के द्वार मेरठ कवि मोरोपंत, शाहिर अनंतफंदी और संस्कृत विद्यवान खुसाली राम जैसे दिग्गजों के लिए खोले।

अहिल्याबाई हर दिन लोगों की समस्याएं दूर करने के लिए सार्वजनिक सभाएं रखतीं थीं। इतिहासकार लिखते हैं कि उन्होंने हमेशा अपने राज्य और अपने लोगों को आगे बढ़ने का हौंसला दिया।

उनके शासन के दौरान सभी उद्योग फले-फुले और किसान भी आत्म-निर्भर थे।

अहिल्याबाई घाट/Wikimedia

ऐनी बेसंट लिखती हैं, “उनके राज में सड़कें दोनों तरफ से वृक्षों से घिरें रहते थें। राहगीरों के लिए कुएं और विश्रामघर बनवाये गए। गरीब, बेघर लोगों की जरूरतें हमेशा पूरी की गयीं। आदिवासी कबीलों को उन्होंने जंगलों का जीवन छोड़ गांवों में किसानों के रूप में बस जाने के लिए मनाया। हिन्दू और मुस्लमान दोनों धर्मों के लोग सामान भाव से उस महान रानी के श्रद्धेय थे और उनकी लम्बी उम्र की कामना करते थे।”

अपने समय से आगे की सोच रखने वाली रानी को केवल एक ही गम था कि उनकी बेटी अपने पति यशवंतराव फांसे की मृत्यु के बाद सती हो गयी थी।

रानी अहिल्याबाई ने 70 वर्ष की उम्र में अपनी अंतिम सांस ली और उनके बाद उनके विश्वसनीय तुकोजीराव होलकर ने शासन संभाला।

बेसंट लिखती हैं, “इंदौर अपनी उस महान और दयालु रानी के लिए जितना शोक मनाये कम था। आज भी उनको सभी अपार सम्मान के साथ याद करते हैं।”

(संपादन – मानबी कटोच )


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Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

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