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खाट के नीचे एक किलो मशरूम उगाकर की थी शुरुआत, आज हर महीने कमातीं हैं 90 हज़ार रूपये

यह बीना की ही मेहनत है, जिस कारण अब मशरुम की खेती उनके 105 पड़ोसी गाँवों में भी मशहूर हो गई है। इन इलाकों से बीना ने करीब 10,000 ग्रामीण महिलाओं को ट्रेनिंग दी है।

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सालों पहले बीना देवी की शादी बिहार के मुंगेर जिले के धौरी गाँव के एक परिवार में हुई थी। तब वहाँ चीज़ें वैसी ही थी जैसी देश के अधिकांश गावों में होती है। अन्य महिलाओं की तरह, वह भी घर की चार दिवारी में ही रहती थीं और अपना ज़्यादातर समय घर की सफाई, खाना पकाने और घर के अन्य कामों में लगाती थी। गाँव में ऐसा माना जाता था कि घर के बाहर का काम महिलाएँ नहीं कर सकती हैं।

लेकिन शायद कई लोगों को यह नहीं पता था कि बीना उनसे थोड़ी अलग हैं। थोड़े प्रोत्साहन और ट्रेनिंग के साथ, इस महिला ने खेती में हाथ आज़माया और जल्द ही पूरे मुंगेर में ‘मशरुम महिला’ के नाम से प्रसिद्ध हो गईं। इतना ही नहीं उन्होंने अपने ही जैसी कई अन्य महिलाओं को सशक्त बनाया। अपने हिम्मत और धैर्य के सहारे बीना ने वह मुकाम हासिल किया जिसके लिए उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा भी सम्मानित किया गया है। 

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बीना देवी

सरकार के अधीन आने वाले, मुंगेर का कृषि विज्ञान केंद्र कई महिलाओं को कृषि की ट्रेनिंग देता है। बीना ने भी वहाँ से ट्रेनिंग ली। उन्होंने द बेटर इंडिया को बताया, “मेरे भीतर एक आग थी। मुझे कुछ करना था, मैं रास्ते की तलाश में थी और कुछ समय बाद, मुझे वह दिशा मिल गई।”

कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा दी जाने वाली ट्रेनिंग, ग्रामीण महिलाओं को जैविक खेती में शामिल करने और उन्हें सशक्त बनाने का प्रयास है जिससे न केवल उन्हें आर्थिक रूप से लाभ पहुँचाएँ, बल्कि पर्यावरण को स्वच्छ रखने में भी योगदान देगा।

ट्रेनिंग प्रोग्राम से बीना के हाथों में खेती उपकरण आए। यह उनके लिए पहला कदम था। इस विषय में उनकी गहरी दिलचस्पी थी जिसने उनका परिचय मशरुम की खेती से कराया। बीना बताती हैं कि वह यह जानकर काफी चाकित थीं कि इसे कितनी आसानी से उगाया जाता है और उससे ज़्यादा आश्चर्य उन्हें यह जानकर हुआ कि इस बारे में बहुत कम लोग जानते हैं और काफी कम लोग इस व्यापार में शामिल हैं। फिर उन्होंने तय किया कि वह मशरुम की खेती करेंगी।

2013 में बीना ने गाँव की परंपरा को तोड़ते हुए अपने कदम घर से बाहर रखे। उन्होंने एक खाट के नीचे मशरुम उगाने से अपना काम शुरु किया।

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मशरूम की खेती की प्रक्रिया पूरे करती हुईं बीना देवी

बीना बताती हैं कि उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क किया जिन्होंने उसे मशरुम की खेती से संबंधित बारीकियों को समझाया। उन्होंने बताया, “मेरे पास एक पुराना पलंग था। उस पलंग के नीचे एक किलो मशरूम उगाना शुरू किया। मशरूम बहुत अधिक पौष्टिक होते हैं और कई अन्य फलों या सब्जियों की तुलना में बाजार में भी इसकी कीमत ज़्यादा होती है। मैं न सिर्फ घर पर खेती कर रही थी, बल्कि बाहर जा कर हाट या बाजार में इसे बेच रही थी और यह काम केवल मैं ही नहीं बल्कि क्षेत्र की कई महिलाएँ कर रही थी।”

इसी साल  बीना को भारत के राष्ट्रपति, रामनाथ कोविद द्वारा नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। 8 मार्च को, 16 अन्य महिलाओं के साथ उन्हें भी इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाज़ा गया था। 

बीना कहती हैं, “मैं राष्ट्रपति से मिल कर और इतने बड़े पुरस्कार को हासिल कर बेहद खुश हूँ। मैंने यह काम परिवार की मदद करने के लिए शुरु किया था। मैं चाहती थी कि मैं कुछ काम करुँ…ये समाज जो मुझसे उम्मीद करता है, उससे ज़्यादा कुछ करुँ और बदले में मुझे पूरी दुनिया ही मिल गई।”

एक किलोग्राम मशरुम उगाने से लेकर ‘मशरुम महिला’ के नाम से जाने जाने का सफर बीना के लिए काफी असाधारण रहा है।

43 वर्षीय बीना की ही मेहनत है जिस कारण अब मशरुम की खेती जिले के पाँच ब्लॉकों और 105 पड़ोसी गांवों में भी मशहूर हो गई है। इन इलाकों से बीना ने करीब 10,000 ग्रामीण महिलाओं को ट्रेनिंग दी है। इनमें से पहले ही 1,500 महिलाएँ मशरूम की खेती को अपना चुकी हैं और इसके लाभ उठा रही हैं।

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राष्ट्रपति द्वारा नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित बीना

हालाँकि, बीना के लिए पितृसत्ता की सीमा तोड़ना आसान नहीं था। बीना याद करते हुए कहती हैं कि जब उन्होंने यह काम शुरु किया तब काफी लोगों ने उन्हें हतोत्साहित किया और मज़ाक उड़ाया। वहीं गाँव के लोगों को लगता था कि यह पागलपन है। वह बताती हैं, “सामान्य सब्जी की खेती में भी, मैं गाय के मूत्र और गोबर जैसे डेयरी कचरे का उपयोग करके जैविक खाद बनाती थी  और लोगों को अक्सर यह भी पसंद नहीं आता था और मेरा मज़ाक उड़ाने का एक भी मौका नहीं छोड़ते थे।”

बीना कहती हैं कि लोगों की प्रतिक्रिया पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया और कड़ी मेहनत जारी रखी और कुछ ही समय में परिणाम सबके सामने था। वह बताती हैं कि उन्हें कुछ कहने की ज़रुरत ही नहीं पड़ी, उनके काम ने ही सबकी बातों का जवाब दे दिया। उनके काम ने ही काफी लोगों का दृष्टिकोण भी बदल दिया। जल्द ही कई अन्य महिलाएँ भी उनके साथ जुड़ गई।

महिलाओं और किसानों की मदद करना

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अब तक दस हज़ार महिलाओं को मशरूम की खेती के गुर सिखा चुकी हैं बीना

बीना महिलाओं को डिजिटल रुप से साक्षर बनाने का काम भी कर रही हैं। 700 महिलाओं को मोबाइल का उपयोग करना सिखाने के लिए उन्हें टाटा ट्रस्ट की तरफ से सम्मानित भी किया गया है। उन्होंने 2,500 किसानों को स्वंय-सहायता समूह बनाने में मदद की है और उन्हें फसल की खेती के लिए सिस्टम ऑफ राइस इंटेसिफिकेशन (एसआरआई) पद्धति सिखाई है।

इस क्षेत्र में व्यापक काम के साथ-साथ ग्रामीण विकास में योगदान के कारण, बीना पाँच साल तक टेटियाबंबर ब्लॉक में धौरी पंचायत की सरपंच भी रही हैं। अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने न केवल जैविक और मशरूम की खेती को बढ़ावा दिया, बल्कि लोगों को वर्मी-कम्पोस्ट उत्पादन, जैविक कीटनाशक और डेयरी खेती में प्रशिक्षित किया।

आज, वह हर महीने 90,000 रुपये की कमाई के साथ (मशरूम की खेती से 30,000 रुपये और सब्जियों की जैविक खेती से 60,000 रुपये) अपने 18 सदस्यों वाले पूरे परिवार का भार उठा रही हैं। साथ ही वह अपने चार बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च भी उठाती हैं।

उन्होंने अपने बच्चों के बारे में बताया, “मेरे 3 बेटे और 1 बेटी है। सभी पढ़ाई कर रहे हैं। मेरे लड़कों के साथ  मेरी बेटी भी इंजीनियर बनने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है। लोग उसकी शादी के बारे में पूछते रहते हैं और मैं कहती हूँ कि मुझे शादी ही परवाह नहीं है क्योंकि मैं चाहती हूँ कि वह पहले आत्मनिर्भर हो। यह सबसे महत्वपूर्ण उपहार है जो एक अभिभावक अपने बच्चों, विशेषकर बेटियों को दे सकते हैं। क्योंकि, जब महिलाओं को प्रोत्साहित किया जाता है और उनका समर्थन किया जाता है तो वह वास्तव में किसी भी असंभव काम को संभव कर सकती हैं!”

मूल लेख- ANANYA BARUA

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Written by पूजा दास

पूजा दास पिछले दस वर्षों से मीडिया से जुड़ी हैं। स्वास्थ्य और फैशन से जुड़े मुद्दों पर नियमित तौर पर लिखती रही हैं। पूजा ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से मास्टर्स किया है और नेकवर्क 18 के हिंदी चैनल, आईबीएन7, प्रज्ञा टीवी, इंडियास्पेंड.कॉम में सक्रिय योगदान दिया है। लेखन के अलावा पूजा की दिलचस्पी यात्रा करने और खाना बनाने में है।

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