in

दादी की रसोई : केवल 5 रुपये में हर रोज़ भर-पेट खाना खिलाते है नोयडा के अनूप खन्ना!

त्तर प्रदेश के नोयडा में ‘दादी की रसोई’ से लोगों को एक शख्स देसी घी में बना भोजन मात्र 5 रूपये में करा रहा है। यह शहर का वो ठिकाना है जहां खाना, कपड़े और दवाइयां बहुत सस्ती दरों पर उपलब्ध हैं।

पूरी दुनिया में लगभग 8150 लाख लोगों को एक स्वस्थ्य जीवन जीने के लिए भरपूर खाना नहीं मिलता, द वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम के मुताबिक, “लगभग 66 मिलियन प्राथमिक स्कूल के बच्चे विकाशसील देशों में भूखे स्कूल जाते हैं।”

60 वर्षीय समाज सेवक अनूप खन्ना ने साल 2015 में दादी की रसोई की पहल की। इसका उद्देश्य जरूरतमंदों को बहुत ही सस्ती दर पर अच्छा घर का खाना उपलब्ध कराना है।

source

इनके नोयडा में दो स्टॉल लगते हैं, सुबह 10 से 11:30 बजे सेक्टर-17 में और दोपहर 12 से 2 बजे तक सेक्टर 29 में। समाज के हर तबके के लोग, विद्यार्थी, कामकाजी व्यक्ति, रिक्शेवाले, दूकानदार और राहगीर भी खाने के लिए स्टॉल के आगे लाइन लगाते हैं। इस पहल को ‘दादी की रसोई’ का नाम दिया अनूप की बेटी स्वाति ने और उनके सपने को हक़ीक़त बनाने में उनके बाकी परिवार ने भी हमेशा उनका साथ दिया।

इस रसोई को अनूप ने लगभग 30,000 रूपये की लागत के साथ शुरू किया था और आज बहुत से लोगों से दादी की रसोई को दान मिल रहा है। अनूप हर रोज स्टॉल पर खाना बनाने के लिए सामग्री व अन्य जरूरी चीजों के लिए 2500 रूपये खर्च करते हैं।

द लॉजिकल इंडियन को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया, “दुकानदार रियायती मूल्यों पर मुझे सामन देते हैं। इसके अलावा लोग जन्मदिन, शादी की सालगिरह आदि के उत्सव पर ख़ास व्यंजन भी उपलब्ध कराते हैं। लोगों की तरफ से भी भरपूर साथ है।”

अनूप चाहे तो खाना मुफ्त में भी दे सकते हैं पर फिर भी वे न्यूतम 5 रूपये लेते हैं, उसके पीछे की वजह है।

वे कहते है “मैं चाहता तो ये खाना और कपड़े मुफ्त में भी दे सकता था, पर कम पैसे लेने की वजह सिर्फ यह है कि यहां भोजन करने वाले लोगों का स्वाभिमान बना रहे। हर तबके के व्यक्ति पांच रुपए देकर सम्मान से भोजन करते हैं। बाकि भोजन की गुणवत्ता का ध्यान में स्वयं रखता हूँ।”

अनूप इस भूखमरी की समस्या को पुरे नोयडा में खत्म करना चाहते हैं। उनसे प्रेरित होकर और भी लोग अपने मोहल्लों व बस्तियों में इस तरह के काम की पहल कर रहें हैं।

“कुछ भी अच्छा करना बहुत मुश्किल नहीं होता। ऐसा कुछ करने के लिए सिर्फ एक इंसान ही काफी है। मुझे बहुत लोगों ने सम्पर्क किया है कि वे अपने यहां भी ऐसा कुछ शुरू करना चाहते हैं तो मैं उनकी मदद करूं। मैंने उन्हें पहले दादी की रसोई पर कुछ समय व्यतीत करने के लिए कहा है ताकि उन्हें पता चले कि हर रोज कैसे काम होता है और हम क्या-क्या मुश्किलें झेलते हैं,” अनूप ने बताया।

अनूप का मानना हैं कि रोटी, कपडा और दवाइयां लोगों की मुलभूत जरूरतें हैं। वह केवल लोगों को यही सब काम पैसों में उपलब्ध कराने की कोशिशों में लगे हैं।

अनूप ने सद्भावना स्टोर की भी शुरुआत की है जिसके अंतर्गत वे लोगों को कपड़े, जूते, और किताबें उपलब्ध कराते हैं। ‘प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना केंद्र’ के अंतर्गत उन्होंने नोयडा में ‘प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र’ भी खोला है जहां जनमानस को सस्ती दरों पर अच्छी दवा मिलती है।

अनूप शहर में दो मेडिकल स्टोर भी चलाते हैं। किसी भी एमरजेंसी में अनूप तुरंत मदद के लिए तैयार रहते हैं। लोगों की सेवा की भावना बचपन से ही अनूप के मन में थी, जब उन्होंने अपने पिता को स्वतंत्र संग्राम में हिस्सा लेते हुए देखा।

हम अनूप की पहल को सलाम करते हैं, जो अपने स्तर पर भारत में भुखमरी की समस्या को सुलझाने की कोशिश कर रहें हैं।

( संपादन – मानबी कटोच )


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ बांटना चाहते हो तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखे, या Facebook और Twitter पर संपर्क करे।

शेयर करे

Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

उत्तर प्रदेश के खौराही गांव का मुखिया, जो गांव की लड़कियों के लिए बना पैडमैन!

दिल्ली में स्लम के बच्चों के जीवन में नए रंग भर रही है नूपुर भरद्वाज की पहल ‘लेसिन’!