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घर-घर से चीजें इकट्ठा कर बेचती हैं यह महिला, कमाई से भरती हैं ज़रुरतमंदों बच्चों की फीस

देवयानी कहतीं हैं ‘री-स्टोर’ का उद्देश्य सिर्फ गरीब लोगों की मदद करना नहीं है बल्कि वह यह भी सन्देश देना चाहतीं हैं कि हम सबको रियूज, रिसायकल के सिद्धांत को समझना चाहिए!

पांच साल पहले जब देवयानी त्रिवेदी बेंगलुरू शिफ्ट हुईं तो उन्होंने देखा कि शहर की गगनचुम्बी इमारतों के पीछे कहीं कोई गाँव है तो कहीं कोई बस्ती। ये दोनों जगह भले ही एक ही शहर में हैं पर दोनों की दुनिया साफ अलग है। एक दुनिया में ऐसे लोग रहते हैं, जिनके पास सबकुछ है तो दूसरी दुनिया ऐसे लोगों की है, जो जीने के लिए हर दिन संघर्ष कर रहे हैं।

देवयानी बताती हैं, “मैं यहाँ वाइटफील्ड में रहती हूँ और इसके पीछे एक छोटा-सा गाँव है विजय नगर। विजय नगर के लोग वाइटफील्ड और शहर के अन्य जगहों पर काम करते हैं। मुझे हमेशा से सोशल वर्क में रूचि रही है। जब मैं बाहर रहती थी तो वहां भी किसी न किसी सोशल प्रोजेक्ट से जुड़ी रहती थी और यहाँ आकर भी मैंने यही काम किया।”

वाइटफील्ड राइजिंग एक सोशल ग्रुप है जिसे अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों ने मिलकर बनाया है। यह ग्रुप एक प्लेटफार्म है जिसके ज़रिए ये लोग समृद्ध और गरीब तबकों के बीच सेतु का काम करते हैं। देवयानी कुछ करना चाहती थीं और इसलिए उन्होंने इस ग्रुप से बात की और एक क्लॉथ डोनेशन ड्राइव आयोजित किया।

Devyani Trivedi

वाइटफील्ड राइजिंग ग्रुप ने देवयानी को ऐसे लोगों से जोड़ा जिन्होंने उन्हें कपड़े डोनेट किए। इसके बारे में देवयानी बताती हैं, “कपड़े तो मेरे पास इकट्ठे हो गए लेकिन मैं नहीं चाहती थी कि लोग उन्हें लेने के लिए कतार में खड़े हों। उन्हें भी पूरे सम्मान के साथ अपने लिए चीजें चुनकर लेने का हक है। इसलिए मैंने ‘री-स्टोर’ खोलने का फैसला किया।”

आखिर क्या है री-स्टोर

देवयानी ने एक छोटी-सी दुकान किराए पर लेकर यह स्टोर शुरू किया। इसमें डोनेशन के सभी सामान को अलग-अलग केटेगरी में रखकर उनका मूल्य तय किया गया। यहां से कोई भी 5 रुपये से लेकर 500 रुपये तक की चीज़ें खरीद सकता है। यहां पर मिलने वाले सामान में बच्चे-बड़े, महिला-पुरुष के कपड़ों से लेकर स्टेशनरी, बच्चों के लिए गेम्स, किताबें, बर्तन और फर्नीचर आदि शामिल हैं।

देवयानी कहती हैं कि कोई भी उनके स्टोर में आकर चीजें खरीद सकता है। महिलाएं 30-40 रुपये में अपने लिए कुर्ती ले सकती हैं। जींस 80-100 रुपये में मिल जाती है और कई बार उनको अपने घरों के लिए बेडशीट, पर्दे आदि भी काफी कम दाम में मिल जाते हैं। उन्होंने कहा, “हमारा स्टोर बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय है। उनके लिए तरह-तरह के गेम, पजल, किताबें यहाँ पर होती हैं और वह भी बहुत ही सस्ती। कई बार तो बच्चे स्टोर में मदद करते हैं और बदले में अपनी पसंद का खिलौना ले जाते हैं।”

Bengaluru Devyani Trivedi Restore
Re-Store

हालांकि, ऐसा नहीं है कि री-स्टोर में सिर्फ ज़रूरतमंद और गरीब तबके के लोगों के लिए ही सामान है। देवयानी ने बताया, “जब भी रीसायकल या फिर रियूज की बात आती है तो हम उसे गरीबी से जोड़ देते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। इस स्टोर से कोई भी आकर शॉपिंग कर सकता है। हमारा उद्देश्य लोगों को यह संदेश देना है कि हम सब अपने घर को सिर्फ भरते जा रहे हैं। मॉल से हम ढ़ेरों सामान ले आते हैं और फिर कुछ दिनों बाद इसे डोनेट करते हैं। यह बिल्कुल ही गलत तरीका है। इससे हमारे पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचता है। हमें रीसायकल, रीयूज और रीस्टोर के कांसेप्ट को समझना होगा। बहुत बार लोग डोनेशन में अपने घर की इलेक्ट्रिक चीजें भी देते हैं। ये चीजें बस पुरानी होती हैं खराब नहीं तो कोई भी इनका इस्तेमाल कर सकता है।”

डोनेशन लेते और देते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए

देवयानी कहती हैं कि यह ‘री-स्टोर’ है न कि कोई ‘डंपिंग स्टोर’! लोगों को लगता है कि गरीब लोग हैं तो कैसे भी फटे-पुराने कपड़े डोनेट कर सकते हैं। यह सोच बिल्कुल गलत है। ‘री-स्टोर में सिर्फ वही चीजें ली जाती हैं जो बिल्कुल सही और इस्तेमाल करने योग्य होती हैं। बहुत बार देवयानी डोनेशन का सामान वापस भेज देती हैं क्योंकि लोग उन्हें एकदम ही टूटी-फूटी क्राकरी या फिर फटे कपड़े भेज देते हैं।

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There is a barter system as well, Tehsin gets clothes from Re-store in exchange for stitching these napkins.

“आपके घर में ज़रूर ऐसी चीजें होंगी जो एकदम सही होती है बस आपका उन्हें और इस्तेमाल करने का मन नहीं होता। हम उन चीजों को स्वीकार करते हैं क्योंकि जो आपके उपयोग में नहीं आ रही वह किसी और के काम आ सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप अपने घर का कचरा यहाँ पर भेज दें। दान का उद्देश्य सिर्फ कुछ दे देना नहीं है बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि आपकी दी हुई चीज़ किसी के काम आ रही है। इसलिए बहुत ही सोच-समझ कर डोनेट करें,” उन्होंने कहा।

लोगों की भलाई के लिए जाती है स्टोर की कमाई

वह आगे बतातीं हैं कि री-स्टोर बिल्कुल सेल्फ-सस्टेनेबल है। शुरुआत में उन्हें स्टोर के किराए आदि के लिए फंडिंग करनी पड़ी लेकिन अब धीरे-धीरे यह स्टोर सेल्फ-सस्टेनेबल होता जा रहा है। इसका मुख्य कारण है लोगों में जागरूकता। अब बहुत से लोग बिना किसी ऊँच-नीच का भेदभाव किए उनके यहाँ खरीददारी करने आते हैं।

इस कमाई से स्टोर का किराया आ जाता है और साथ ही स्टोर में पर काम करने वाले कर्मचारी की सैलरी भी। इसके अलावा, पिछले 4 सालों में देवयानी का परिचय गाँव और बस्ती के बहुत से लोगों से हो गया है। वह उनसे उनकी समस्याएं-परेशानी पूछती रहती हैं और ज़रूरत पड़ने पर मदद भी करती हैं।

“हमने महिलाओं को घरेलू स्तर पर अपना काम करने की प्रेरणा भी दी है। कई महिलाएं सिलाई-कढ़ाई का काम कर देती हैं। जिसके बदले हम उन्हें पैसे देते हैं और स्टोर से सामान भी। इससे उनकी एक अतिरिक्त कमाई भी हो रही है। अब लोग खुद ही मेरे पास अपनी परेशानियाँ लेकर आते हैं और हम पूरी कोशिश करते हैं उनकी मदद करने की,” उन्होंने कहा।

Bengaluru Devyani Trivedi Restore
She is helping kids with books, stationery and also, get three girls admitted in a private school

इसके अलावा, उन्होंने सरकारी स्कूल में पढ़ाई करने वाली तीन लड़कियों का दाखिला एक प्राइवेट स्कूल में कराया है। ये बच्चियां पढने में काफी होशियार हैं। इनकी फीस का खर्च देवयानी इसी स्टोर की कमाई और कुछ अपनी जेब से देती हैं। समय-समय पर लोगों को जोड़कर वह सरकारी स्कूलों की मदद भी करतीं हैं।

देवयानी कहतीं हैं कि इस एक री-स्टोर ने समृद्ध और ज़रूरतमंद तबके के बीच की दीवार को तोड़ने का काम किया है। यह एक सेतु की तरह है जो इन दो दुनिया के बीच का रिश्ता बना रहा है। उनकी कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस तरह के कांसेप्ट से जुड़ें।

लॉकडाउन में उनका स्टोर बंद रहा लेकिन इस दौरान उन्होंने वाइटफील्ड राइजिंग टीम के साथ मिलकर ज़रुरतमंदों की मदद की। आगे भी उनका उद्देश्य समाज के लिए कुछ न कुछ करते रहना है। वह कहतीं हैं कि उन्हें किसी तरह की कोई आर्थिक मदद नहीं चाहिये। लेकिन अगर कोई कुछ कर सकता है तो अपने आस-पास के ज़रूरतमंद लोगों की मदद ज़रूर करें!


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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