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आविष्कार: मात्र रू. 5000 की इस मशीन से शुरू कर सकते हैं अगरबत्ती का बिज़नेस

बांस की खेती करने वाले लोग इस मशीन की मदद से अपने घर में ही बांस की प्रोसेसिंग का काम भी शुरू कर सकते हैं!

यह कहानी मिजोरम के दो ऐसे लोगों की है, जो हुनर की वजह से एक दूसरे से मिले। आगे चलकर इन दोनों ने कुछ ऐसी मशीनें बनाई हैं, जिससे कई लोगों को लाभ मिल रहा है।

मिज़ोरम के अइज़ोल छोटे-से गाँव में पले-बढ़े एल. राल्ते को बचपन से ही कला से बहुत प्रेम था। उनका मन पढ़ाई से ज्यादा कुछ न कुछ बनाने-करने में लगता था। ग्रैजुएशन के बाद वह साइनबोर्ड, मोटर नंबर प्लेट्स और कार्विंग जैसे काम करने लगे। वहीं दूसरी तरफ, एल. साइलो मिजोरम के ही चम्पई कस्बे में बड़े हुए। उनकी पढ़ाई ज्यादा नहीं हुई लेकिन मशीन बनाने के हुनर मानों उन्हें जन्म से ही मिला हुआ था।

राल्ते बताते हैं कि एक एनजीओ के माध्यम से उन्होंने बच्चों को वोकेशनल ट्रेनिंग देना शुरू किया। यहीं पर उन्हें पता चला कि उनके राज्य में बांस का उत्पादन और इसका व्यवसाय काफी ज्यादा है लेकिन बांस को काटने, इसकी स्टिक आदि बनाने के लिए बड़ी संख्या में श्रमिक की आवश्यकता होती है और यह काफी महंगा और मेहनत का काम होता है।

L. Ralte and L. Sailo made Bamboo Splint making machine

गौरतलब है कि बांस से अगरबत्ती, आइसक्रीम स्टिक, टूथपिक आदि बनाए जाते हैं। इसके अलावा भी यह काफी सारी चीजों में काम आता है।

राल्ते ने सोचा कि क्यों न कुछ ऐसा किया जाए जिससे कि बांस की ये पतली लकडियाँ हाथ से बनाने की ज़रूरत न पड़े बल्कि मशीन से यह काम हो जाए। इससे मेहनत कम होगी, समय कम लगेगा और साथ ही, मजदूरों को इस काम में लगने वाली चोटों को भी नज़रअन्दाज़ किया जा सकेगा।

इस मशीन को बनाने के सफ़र में ही राल्ते की मुलाक़ात साइलो से हुई। शुरूआत में उन्होंने दो अलग-अलग मशीन बनाई। एक मशीन से बांस को काटा जाता था तो दूसरी मशीन से इसकी सींक बनाई जाती थी।

बाद में, उन्होंने इस पर थोड़ा और काम किया और इसे एक ही मशीन का रूप दे दिया। इस मशीन से बांस को आसानी से काटा जा सकता है और उसकी पतली-पतली सींक बन जाती है।

राल्ते और साइलो की इस मशीन में आपको बस बांस डालना है और फिर कटर को आगे-पीछे करना है। आपको एक बार में ही 50 बांस की 1.2 मिमी चौड़ी और मोटी स्टिक मिल जाएंगी। राल्ते का कहना है कि इस मशीन से एक व्यक्ति एक घंटे में लगभग 5000 स्टिक बना सकता है। उनकी इस सफलता के बाद, उन्हें NEDFI (North Eastern Development Finance Corporation Ltd) के चेयरमैन से आर्थिक मदद मिली और उन्होंने उनके लिए वर्कशॉप खुलवाई। उनकी मदद की वजह से उनका यह इनोवेशन नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन तक पहुंचा।

NIF की मदद से राल्ते और साइलो ने इस मशीन को एडवांस्ड लेवल का बनाया और उन्हें इसकी मार्केटिंग करने में भी मदद मिली। जो कंपनी अगरबत्ती बनाती हैं, वहाँ इस तरह की मशीन की काफी मांग है क्योंकि उन्हें बिजली से काम करने वाली मशीन या फिर लेबर, दोनों ही काफी महंगे पड़ते हैं। लेकिन राल्ते और साइलो की मशीन से यह काम कम समय और कम लागत में हो जाता है।

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राल्ते और साइलो को उनकी इस मशीन का पेटेंट भी मिला हुआ है और इसकी कीमत 5 हज़ार रुपये है!

They won the National Innovation Award

राल्ते और साइलो, सीरियल आविष्कारक हैं। उन्होंने सिर्फ यही एक मशीन नहीं बनाई है। बल्कि उन्होंने लोगों की रोज़मर्रा की परेशानियों को दूर करने के लिए और भी कई इनोवेशन किए हैं। उनका एक और बड़ा इनोवेशन है सुपारी साफ़ करने की मशीन।

राल्ते कहते हैं कि सुपारी की क्लीनिंग मशीन को बनाने के लिए उन्हें 5 साल लगे हैं और कई ट्रायल्स के बाद उन्हें सफलता मिली है। इस मशीन से जरा-सी देर में छोटी और बड़ी, दोनों आकार की सुपारियों को साफ़ किया जा सकता है। इसकी कीमत 7 हज़ार रुपये है!

Areca Nut Cleaning Machine

इसके अलावा, उन्होंने हाल ही में, पैर से ऑपरेट होने वाली सैनीटाइज़र मशीन भी बनाई है।

राल्ते और साइलो अब तक 3500 से ज्यादा मशीनें बेच चुके हैं। उन्हें इन मशीनों के लिए कई और जगहों से भी सम्मान मिल चुका है। राल्ते कहते हैं कि जिन राज्यों में बांस का उत्पादन ज्यादा होता है वहां पर बांस का काम करने वाले भी बहुत लोग मिल जाएंगे। अगर ये लोग किसी और के लिए मजदूरी करने की बजाय उनकी मशीन से अपने घर पर ही छोटा-सा व्यवसाय करें तो अच्छा कमा सकते हैं।

साथ ही, अगर बांस के किसान साथ में प्रोसेसिंग का व्यवसाय करना चाहें तो उनके लिए भी यह मशीन कारगर है!

“अगर हम जैसे कम पढ़े-लिखे लोग अपने आइडिया की वजह से अपनी पहचान बना सकते हैं तो पढ़े-लिखे लोग तो बिल्कुल आगे बढ़ सकते हैं। इसलिए कभी भी हार नहीं मानें बस खुद पर भरोसा करके आगे बढ़ते रहें,” उन्होंने अंत में कहा।

अगर आप राल्ते से संपर्क करना चाहते हैं तो उन्हें 9436197191 पर मैसेज कर सकते हैं!


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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