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राजस्थान के इस शख्स के 14 साल की मेहनत ने मरुनगरी को हरितनगरी में तब्दील कर दिया!

राजस्थान के बीकानेर जिले में राजकीय डूंगर कॉलेज में समाजशास्त्र के एक प्रोफेसर आखिर क्यों और कैसे एक ग्रीन लीडर बन गए? यह कहानी है प्रोफेसर श्याम सुन्दर ज्याणी की, जो अब तक 2,620 गांवों में 2,60,000 परिवारों से जुड़कर लगभग 7,40,000 पेड़ लगवा चुके हैं। उनके द्वारा की गयी पहल, “पारिवारिक वानिकी” के चर्चे देशभर में हैं और बहुत से परिवार इसे अपना रहें हैं।

पारिवारिक वानिकी एक संकल्पना है जिसके तहत प्रत्येक परिवार को अपने घर में कम से कम एक पेड़ लगाना चाहिए और उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह ही बरतना चाहिए।

जैसे समाज की मूलभूत इकाई परिवार होता है, उसी तरह परिवार में पेड़ भी महत्वपूर्ण सदस्य होना चाहिए। ऐसा करने से हमारे समाज के बच्चे-बूढ़े सभी में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता बढ़ेगी।

मूल रूप से राजस्थान के गंगानगर जिले के एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले श्याम सुन्दर ने समाजशास्त्र विषय में अपनी पढ़ाई की। किसान परिवार से होने के कारण हमेशा से ही श्याम सुन्दर को पेड़ों व प्रकृति से लगाव था। बचपन में स्कूल के बाद वह अक्सर अपने दोस्तों के साथ खेतों और खलिहानों में खेलने के लिए निकल जाते थे।

“जब भी बारिश के मौसम में नीम के पेड़ के नीचे गिरी निबोली से नए पौधे फुट आते तो हम उन्हें भी मिट्टी सहित उठाकर अलग जगह लगा देते थे ताकि किसी के पैरों के नीचे दबकर वे कुचल न जाएँ।”

एक बार जब वे आठवीं कक्षा में थे तो उन्होंने अपने घर के पास ही पड़ी एक खाली जगह में नीम का पौधा लगाया और वे उस पौधे को अपना दोस्त कहने लगे। जब वह पौधा थोड़ा बड़ा हुआ तो उसमें दीमक लग गए। अपने दोस्त को बचाने के लिए श्याम सुन्दर ने उसकी जड़ों में कीटनाशक डाल दिया। पर उल्टा इसकी वजह से पौधा मुरझा गया।

अपनी नादानी के चलते श्याम सुन्दर ने अपना दोस्त खो दिया। इस घटना से उन्हें बहुत आघात पहुंचा और इसके बाद उनका पेड़ों के साथ रिश्ता और भी गहरा हो गया।

साल 2002 में गंगानगर ज़िले में ही कॉलेज के शिक्षक के रूप में उनका चयन हुआ। पर एक साल के भीतर उन्हें, जुलाई 2003 में बीकानेर स्थानांतरित कर दिया गया। अपने तबादले के बाद वे बीकानेर आये तो उन्होंने देखा कि उनके कॉलेज में बहुत ज्यादा पेड़ नहीं हैं और जो कुछ नीम आदि के पेड़ हैं वे भी धीरे-धीरे मरते जा रहें थे।

उन्होंने बताया,

“मैंने इस बारे में कॉलेज प्रध्यापक से बात की तो उन्होंने कोई रूचि नहीं ली, उन्होंने कहा कि क्या करें यहां का तो मौसम ही ऐसा है।”

बीकानेर को मरुनगर भी कहा जाता है क्योंकि वह थार मरुस्थल का हिस्सा है। साल में बारिश होने की दर भी एकदम ना के बराबर है। सिंचाईं के लिए भी इंदिरानगर नहर का केवल एक हिस्सा बीकानेर को छूते हुए निकलता है।

कॉलेज प्रिंसिपल के रूख को देखकर श्याम सुन्दर ने अपने ही स्तर पर काम करने की ठानी। उन्होंने अपने कुछ विद्यार्थियों के सहयोग से उन पेड़ों की देख-रेख का कार्य शुरू करवाया। सबसे पहले अपने विद्यार्थियों के साथ मिलकर उन्होंने सभी पेड़ो के चारों और थोड़ी खुदाई करके थाम्बड़े बना दिये ताकि पानी संग्रहित होकर पेड़ों की जड़ों तक जाये। इतना ही नहीं उन्होंने अपने जेब-खर्च से एक पानी के टैंकर वाले को भी पेड़ों के लिए रोज पानी लाने के लिए नियुक्त किया।

लगभग एक महीने में ही सभी पेड़ हरे-भरे व स्वस्थ हो गए। तब उन्हें लगा कि कॉलेज की 108 एकड़ भूमि में और भी बहुत पेड़ लग सकते हैं।

उन्होंने धीरे-धीरे बाकी प्रांगण में भी पेड़ लगाये और अपने विद्यार्थियों के साथ रोज उन में पानी देने और देख-रेख का कार्य शुरू किया। इससे प्रभावित हो कर उन्हें एनएसएस का काम भी संभालने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी!

साल 2006 में राजस्थान सरकार के एक प्रोग्राम के तहत वे  बीकानेर के पास हिम्मतासर गांव में बच्चों के साथ कैंप के लिए गये। श्याम सुन्दर ने बताया,

“मुझे बहुत हैरानी हुई जब मैनें उस गांव के किसी भी घर में कोई पेड़ नहीं देखा और गांव की चौपाल पर भी 4-5 ही पेड़ थे। मुझे और मेरी टीम को गांव के लोगों की अकाल राहत कार्य के तहत जौहड़ की खुदाई में मदद करते देख गांव वाले साथ आ गए। धीरे-धीरे गांव वालों से जान-पहचान बढ़ी तो मैंने उन्हें प्रस्ताव दिया कि हम आपके हर घर में एक पेड़ लगाएंगे और उन्हें पेड़ों का महत्व समझाया।”

गांववालों के साथ से श्याम सुन्दर ने उस गांव के हर घर में और आस-पास पेड़ लगाए और आज की तारीख में उस गांव में लगभग 3,000 से भी अधिक पेड़ हैं। इन पेड़ों की लागत का सारा खर्चा श्याम सुन्दर ने अपने वेतन से दिया।

उसी गांव से श्याम सुन्दर की “पारिवारिक वानिकी” की शुरुआत हुई। जो सिलसिला हिम्मतासर में साल 2006 में शुरू हुआ वह आज भी बरकरार है।

इस गांव ने और भी बहुत से लोगों व आस-पास के गांवों को प्रेरित किया और वे सभी श्याम सुन्दर के पास जाने लगे। जो भी व्यक्ति श्याम सुन्दर के पास इस सिलसिले में जाता वे उसे अपने पैसों से खरीदकर पौधा देते।

जब श्याम सुन्दर ने देखा कि सरकार से मिलने वाले एनएसएस के फंड के लिए सिस्टम में भ्रष्टाचार हो रहा है, तो उन्होंने उस फंड को लेने से इंकार कर दिया । उन्होंने पारिवारिक वानिकी के कार्य को अपने व्यक्तिगत वेतन से चलाने का फैसला किया। उनके इस कदम पर उनके माता-पिता व उनकी पत्नी ने उन्हें पूर्ण सहयोग दिया।

“जब मैंने अपने घरवालों को बताया कि मेरा सपना है कि इस देश में हर घर और गांव-शहर में अधिक से अधिक पेड़ हों और लोग उन्हें अपने परिवार के सदस्य के रूप में बरतें; तो उन्होंने मेरा पूरा साथ दिया। यहां तक कि लगभग पिछले 10 सालों से मेरे बच्चों की स्कूल की फ़ीस भी मेरे पिताजी ने दी है।”

औरों के लिए भी बने प्रेरणा

साल 2016 में गंगानगर के पास एक गांव में श्याम सुन्दर पारिवारिक वानिकी के तहत कार्य कर रहे थे, जिसे देख कर दैनिक भास्कर के एक पत्रकार ने शिक्षक दिवस पर उनके काम पर एक लेख प्रकाशित किया। जिसके बाद लाखों लोग उनसे जुड़े। बिहार के नालंदा जिले से एक युवाओं के समूह ने श्याम सुन्दर को सम्पर्क किया। ये युवा भी अपने स्तर पर अपनी कमाई से ही नालन्दा के गांवों में मिशन हरियाली के तहत पेड़-पौधे लगा रहे थे। मिशन हरियाली के साथ मिल नालंदा जिले में अब तक पारिवारिक वानिकी के दो पर्यावरण मेले लगाये जा चुके हैं।

भगत सिंह को अपनी प्रेरणा मानने वाले श्याम सुन्दर ने बताया कि यदि कोई भी आदर्श प्राप्त करना है तो उसके लिए दूसरों को कहने की बजाय शुरुआत खुद से करनी होगी। इतने सालों से पूरी निष्ठां और लगन से अपने सपने को साकार करने में लगे श्याम सुन्दर ने पिछले साल जब भगत सिंह की जयंती, 27 सितंबर, 2017 को अपने जानकार व अन्य लोगों से गुजारिश की कि वे इस दिन पर जहां भी हो सके पौधे लगाएं, तो देशभर में लोगों ने अपने स्तर पर लगभग 35,000 पौधे लगाए।

“जब देशभर से मुझे लोगों ने तस्वीरें भेजी कि उन्होंने वृक्षारोपण किया है तो मुझे लगा कि अब पारिवारिक वानिकी साकार हो रहा है,” उन्होंने बताया।

पारिवारिक वानिकी के जरिये और भी समस्यायों को सुलझाने की कोशिश

बेटी के जन्म पर पौधरोपण करते हुआ परिवार

श्याम सुन्दर का मानना है कि यदि घरों में फल के वृक्ष लगाए जाएँ तो एक वक़्त के बाद घर के सदस्यों के आहार में एक फल शामिल हो जाएगा। अगर हर गरीब के घर में कोई भी फल का वृक्ष हो तो बच्चों में कुपोषण की समस्या को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

इसके अलावा बढ़ते जलवायु परिवर्तन और घटते वनों के कारण बहुत से जीव जैसे तितलियाँ, चिड़ियाँ आदि की प्रजातियां लुप्त हो रही हैं तो घरों में पेड़ होने से उन्हें भी आश्रय और कुछ भोजन मिले तो हम अपनी बायोडायवर्सिटी को भी सहेज सकते हैं। बहुत से पेड़ों के पत्ते घरेलु जानवरों के चारे के रूप में भी इस्तेमाल हो सकते हैं।

श्याम सुन्दर का उद्देश्य पेड़ों को न केवल लोगों के घरों में बल्कि दिलों और विचारों में जगह दिलाना है। हर कोई पेड़ों को अपने जीवन का अहम् हिस्सा बनाये इसके लिए लोगों की मानसिकता में भी इनकी जगह होनी चाहिए। जैसे बच्चे के जन्म की ख़ुशी में भी उसके नामकरण पर पेड़ लगवाये जाएँ। उन्होंने कहा,

“शादी में जिस तरह सात वचन दूल्हा-दुल्हन लेते हैं और उन्हें जीवनभर निभाने का वादा करते हैं वैसे ही हमने लोगों से अपील की कि वे सात वचनों के अलावा एक आंठवा महावचन भी ले, जिसे हम हरित वचन कहेंगें कि वह दम्पति अपनी शादी पर एक पौधा जरूर लगाएगा और अन्य किसी दम्पति को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करेगा।”

ऐसे ही श्याम सुन्दर ने किसी की मृत्यु के पश्चात् महाभोज पर पैसे लगाने की बजाय उस व्यक्ति की याद में पुरे समुदाय द्वारा पेड़ लगवाने का सन्देश दिया। लगभग दो साल पहले ही जब श्याम सुन्दर की नानी की मृत्यु हुई तो उन्होंने गांव में बहुत से पेड़ व फलों की बेल लगवाईं।

“अभी कुछ समय पहले जब मैं गांव गया तो एक घर में मुझे अंगूर परोसे गए और उन्होंने बताया कि ये उसी बेल के अंगूर हैं जो नानी की याद में लगाई थी। तभी मैंने अपनी माँ से कहा कि नानी आज भी हमारे बीच हैं।”

मरुस्थली पेड़ों पर बडिंग तकनीक की पहल

श्याम सुन्दर ने इंडियन काउन्सिल ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च के वैज्ञानिकों के सामने प्रस्ताव रखा कि वे मरुस्थली पेड़ जैसे कि झारबेरी, जिसे पनपने के लिए ना के बराबर पानी की जरूरत होती है, उस पर बड़ा बेर (थाई एप्पल) की बडिंग कर दी जाये तो वह बिना किसी पानी की जरूरत के प्राकृतिक रूप में यह फल उग जाएगा।

पर श्याम सुन्दर के इस प्रस्ताव को उन्होंने असंभव बताते हुए मना कर दिया। लेकिन इसे चुनौती के रूप में लेने वाले श्याम सुन्दर ने अपने कुछ विद्यार्थियों के साथ मिल कर सम्भव कर दिखाया। उनका यह प्रयोग अन्य मरुस्थली पेड़ लसूदा और खेजड़ी पर भी कारगर साबित हुआ।

श्याम सुन्दर के आत्म-विश्वास और हौसले ने दिखा दिया कि यदि कुछ करने की ठान ली जाये तो यक़ीनन जीत हासिल होती है।

पारिवारिक वानिकी के तहत उनके काम के लिए श्याम सुन्दर को दो बार राष्ट्रपति द्वारा, साल 2012  में इंदिरा गाँधी एनएसएस नेशनल अवार्ड और साल 2016 में भी वर्तमान सरकार द्वारा पर्यावरण संरक्षण के लिए सम्मानित किया गया।लिम्का बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में भी दो बार पारिवारिक वानिकी का नाम दर्ज हुआ है।

श्याम सुन्दर का उद्देश्य पारिवारिक वानिकी को समाज के साथ-साथ शिक्षा से भी सही मायनों में जोड़ना है। अपनी इसी सोच पर काम करते हुए उन्होंने अपने कॉलेज, बीकानेर में ही तरह-तरह के पेड़ लगा एक छोटा-सा जंगल बनाया है; जो धीरे-धीरे अन्य छोटे-मोटे जीव जैसे तीतली, चिड़िया के आने से एक बायोडायवर्सिटी का रूप ले रहा है।

श्याम सुन्दर के इस जंगल में एक ‘पीपल्स नरसरी’ भी हैं जहां से लोग मुफ्त में पौधे ले जा सकते हैं।

श्याम सुन्दर का बीकानेर और आस-पास के जगहों के स्कूलों को यह प्रस्ताव है कि बच्चों को यहां ‘फारेस्ट वॉक’ के लिए लाया जाये, ताकि आने वाली पीढ़ी को जंगल क्या होता है और इसके क्या मायने हैं यह सिर्फ किताबों में ही न दिखाया जाये।

श्याम सुन्दर ने कहा,

“मैं एक मॉडल दे सकता हूँ जिसके तहत हम विद्यार्थियों को सही मायनों में उनका पर्यावरण दें सके और उसकी देख-रेख के गुर सिखा सके।”

उनका कहना है कि अगर सरकार उनका उचित सहयोग करे तो पुरे देश में पारिवारिक वानिकी को पहचान मिल सकती है। इसके अलावा बडिंग तकनीक को और आगे ले जाने के लिए भी सरकार और अधिकारीयों के साथ व सहयोग की आवश्यकता है।

हाल ही में, श्याम सुन्दर ने किसान इंटरनेशनल के नाम से एक यूट्यूब चैनल भी शुरू किया है, जिसे आप सब्सक्राइब कर श्याम सुन्दर से जुड़ सकते हैं।

इसके आलावा उनकी वेबसाइट familialforestry.org के माध्यम से उनकी पहल और अन्य प्रोजेक्ट्स के बारे में जान सकते हैं। उनकी दो मोबाइल एप, माय फॉरेस्ट और ग्रीन लीडर भी गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध हैं।

( संपादन – मानबी कटोच )


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Written by निशा डागर

Blessed with a talkative nature, Nisha has done her masters with the specialization in Communication Research. Interested in Development Communication and Rural development, she loves to learn new things. She loves to write feature stories and poetry. One can visit https://kahakasha.blogspot.com/ to read her poems.

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