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कारगिल युद्ध के दौरान इस महिला ने अकेले ही संभाला था कारगिल का AIR स्टेशन

“सेना ने हमें लाइट बंद रखने के लिए कहा, बहुत सारे गोले रेडियो स्टेशन के परिसर में गिरते रहे। हॉस्टल ध्वस्त हो गया। मेरे कुछ साथी मुश्किल से अपनी जान बचाकर भागे थे। मैंने किसी तरह स्टेशन को चालू रखा।” -शेरिंग अंग्मो शुनु

जून 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान एक शाम ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन (एआईआर) के अंदर दुश्मनों की भारी गोलीबारी के कारण इंजीनियर भाग गए, जबकि उनके प्रसारण का समय शाम 5 बजे निर्धारित था। तमाम उथल-पुथल के बीच एआईआर, लेह और कारगिल के स्टेशन डायरेक्टर शेरिंग अंग्मो शुनु ने प्रसारण के लिए कारगिल के ब्रिगेड कमांडर से मदद मांगी। उन्होंने कुछ सैनिकों को भेजा जिन्होंने एआईआर कारगिल का जनरेटर चालू करने में मदद की। इस तरह शाम 5 बजे प्रसारण शुरू हो पाया।

युद्ध के दौरान पाकिस्तानी रेडियो द्वारा भारतीय सैनिकों और भारतीय सेना के हेलिकॉप्टरों को मार गिराए जाने की झूठी खबरों और अफवाहों को फैलाने से रोकने में ऑल इंडिया रेडियो की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

स्टेशन डायरेक्टर शेरिंग अंग्मो शुनु प्रोपेगैंडा को रोकने के लिए न केवल प्रसारण जारी रखा, बल्कि सैनिकों को संदेश भेजकर उनके हौसले को भी बढ़ाया। जब भारतीय सेना को अपने सैनिकों की सहायता के लिए लोगों की आवश्यकता थी, तो उन्होंने लगातार संदेश शेयर किया और अपने 18 वर्षीय बेटे को सेना की मदद करने के लिए भेजा।

कारगिल युद्ध के समाचार का प्रसारण

6 जून 1999 को लद्दाख के लोगों ने ऑल इंडिया रेडियो (AIR) पर प्रसारित कारगिल युद्ध की खबरें सुनने के लिए रेडियो ट्यून किया। प्रसारण के दौरान हिंदी में एक विशेष घोषणा की गई।

अंग्मो ने कहा “भारतीय सेना को सामान आगे पहुंचाने के लिए कुली (पोर्टर्स) की आवश्यकता है। कृपया मदद के लिए आगे आएं, देश को आपकी जरूरत है। ”

अगले हफ्ते, रेडियो पर इसी तरह की एक और घोषणा हुई जिसमें परिवारों से अपने सक्षम बेटों को लेह पोलो ग्राउंड भेजने का अनुरोध किया गया था, जहां चयन हो रहे थे। यह घोषणा कर्नल विनय दत्ता के आदेश पर की गई थी, जो पहली घोषणा से एक दिन पहले अंग्मो से मिले थे।

उन्होंने अंग्मो को समझाया था कि युद्ध में हमला करने वाली बटालियनों की जरूरतों को पूरा करने के लिए कंपनी द्वारा जवानों की भर्ती की जा रही है।

पिछले साल प्रकाशित पुस्तक ‘कारगिल: अनटोल्ड स्टोरीज़ फ्रॉम द वार‘ की राईटर रत्ना बिष्ट रावत को अंग्मो ने बताया, “कर्नल दत्ता ने मुझे बताया कि पहाड़ों में सड़कें नहीं थीं और युद्ध के मैदान में भारतीय सेना के पास भोजन, गोला-बारूद और अन्य ज़रूरतों का सामान ढोने के लिए पर्याप्त कुली या खच्चर नहीं थे। उन्होंने मुझसे कहा कि क्या मैं लद्दाखी लड़कों को इस काम में मदद करने के लिए कह सकती हूं। मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि जितना संभव होगा, मैं करूंगी।”

हर सुबह वह अपने निर्धारित प्रसारण के बीच में श्रोताओं को बताती रहती थीं कि “भारतीय सेना हमारे लिए लड़ रही है। उनकी मदद करने की हमारी बारी है।”

वॉलंटियर के रूप में अपने बेटे को भेजना

लेह जिले में खेतिहर परिवार में जन्मी अंग्मो के पिता नायब तहसीलदार थे। लेह में मिडिल स्कूल तक की पढ़ाई करने के बाद वह कश्मीर चली गईं। अंग्मो ने द बेटर इंडिया को बताया, “एमए प्रथम वर्ष पूरा करने के बाद मेरी शादी हो गई और मुझे अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। मैंने 1975 में कार्यक्रम अधिकारी के रूप में ऑल इंडिया रेडियो लेह ज्वाइन किया।”

भारी गोलाबारी के बीच उन्होंने न सिर्फ ऑल इंडिया रेडियो कारगिल का नियमित प्रसारण किया बल्कि अपने 18 साल के बेटे स्टैनज़िन जयदुन (रिकी) को वालंटियर के रूप में कार्य करने के लिए भेजा। हालांकि रिकी वालंटियर में शामिल होने से डर रहा था लेकिन उन्होंने उसे जाने के लिए मना लिया।

सिर्फ चार दिनों के भीतर रिकी जैसे 10 से 35 साल के 200 लद्दाखी वालंटियर के तौर पर शामिल हो गए। इनके अंदर न केवल मातृभूमि की रक्षा के लिए जज्बा था बल्कि वे वहां के मौसम, ऊंचे स्थानों और इलाके के भी आदी थे।

हर 100 कुलियों को दो पल्टूनों में लेह से आठ घंटे की दूरी पर स्थित दाहा और हनु के बीच एक छोटे से गांव बिआमा में सेना के ट्रकों से पहुंचाया गया।

बिआमा में ये लड़के टमाटर उगाने वाले किसानों की जमीन पर शिविरों में रहते थे। हफ्ते के अंत तक वालंटियर की संख्या बढ़कर 800 हो गई।

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अगले दो महीनों तक वे पैदल बटालियन की मदद करते रहे। उन्होंने बटालिक-यलदोर-चोरबत ला सेक्टर जैसे सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में लड़ने वाली यूनिट की सहायता की। सामान्य तौर पर कोई भी कुली अपनी पीठ पर 10 किलोग्राम भार ले जाते थे लेकिन लद्दाखी पुरुषों ने 30 किलो का भार उठाया।

बेशक, उन्हें इसके लिए दैनिक वेतन का भुगतान किया जाता था, लेकिन उनका पूरा प्रयास राष्ट्र की सेवा और दिलोंजान से सेना की मदद करना था।

रिकी ने रचना से बातचीत करते हुए बताया, “कुछ लड़कों ने मृत और घायल सैनिकों को निकालने में भी मदद की। हम सभी जानते थे कि कारगिल युद्ध में हमारे सैनिकों को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। हम अपना काम करना चाहते थे।”

दुश्मन सेना के गोलाबारी क्षेत्र के बीच स्थित बिआमा में तेज धमाके करते थे। जब भी भारी गोलाबारी शुरू होती वे पास में एक पानी की टंकी के पीछे छिप जाते।

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कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सैनिक source

दुश्मनों के प्रोपेगैंडा को विफल करना

किसी भी युद्ध में संचार का माध्यम सबसे ज्यादा चपेट में आता है। आकाशवाणी कारगिल के पास नियमित गोलाबारी होती थी और कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए स्टेशन को बंद करने पर विचार किया गया।

वह याद करते हुए बताती हैं, “जिस समय गोलाबारी शुरू होती, हम ज़ांस्कर की ओर 15 किमी दूर स्थित मिंगी नामक एक छोटे से गांव में तेजी से कूद जाते जो दुश्मन की गोलाबारी की सीमा से बाहर था। हमने वहां एक कमरा किराए पर लिया था और अक्सर हम (आकाशवाणी कारगिल के कर्मचारी) फर्श पर सोते थे और फिर गोलाबारी बंद होने के बाद रेडियो प्रसारण को जारी रखने के लिए वापस चले जाते थे।”

इसके अलावा स्थानीय रेडियो ने नागरिकों से खच्चरों की व्यवस्था कर ऊंचे स्थानों पर, जहाँ लड़ाई चल रही थी, सेना के सामान को पहुंचाने में मदद करने के लिए कहा। उन दिनों कारगिल में औसतन 300 पाकिस्तानी गोले रोजाना गिरते थे लेकिन एक भी दिन के लिए काम बंद नहीं हुआ। सेना ने उन्हें चेतावनी दी थी कि वे रात के समय अपनी सभी लाइटें बंद कर लें ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इमारत में बमबारी न हो। लाइट जलाने से पहले उन्हें पर्दे खींचने और खिड़कियों को बंद करने के लिए कहा गया।

वह उन दिनों को याद करते हुए द बेटर इंडिया को बताती हैं, “पाकिस्तान की ओर से हर रोज गोलाबारी हो रही थी। बहुत सारे गोले रेडियो स्टेशन के परिसर में गिर गए। हॉस्टल ध्वस्त हो गया। मेरे कुछ साथी मुश्किल से अपनी जान बचाकर भागे थे। कस्बा सुनसान था। सेना ने हमें लाइट बंद रखने के लिए कहा, लेकिन गोले वैसे भी गिरते रहे। मैंने किसी तरह स्टेशन को चालू रखा। कभी-कभी, टेक्निशियन मदद करने से मना कर देते और मुझे सेना के टेक्निशियन को प्रसारण शुरू करने के लिए कहना पड़ा। युद्ध के समय नियम और कानून कभी काम नहीं करते हैं। दिल्ली के लोगों ने भी मुझे भागने के लिए कहा, लेकिन मैं स्टेशन को चालू रखने के अपने फैसले पर अड़ी रही।”

26 जुलाई को भारतीय सशस्त्र बलों की जीत के साथ युद्ध समाप्त हो गया। कई सैनिकों ने युद्ध के दौरान दृढ़ता से संघर्ष किया और देश सेवा की। उनके योगदान को आधिकारिक तौर पर मान्यता दी गई। सेना के महत्वपूर्ण योगदान के साथ ही उन सैकड़ों लद्दाखी नागरिकों को नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने अंग्मो की तरह युद्ध में अपना बड़ा योगदान दिया।

(इस रिपोर्ट को तैयार करने में रचना बिष्ट रावत और दावा टुंडुप की किताब ‘Kargil: Untold Stories from the War’ की मदद ली गई है।)

मूल लेख-RINCHEN NORBU WANGCHUK

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Written by अनूप कुमार सिंह

अनूप कुमार सिंह पिछले 6 वर्षों से लेखन और अनुवाद के क्षेत्र से जुड़े हैं. स्वास्थ्य एवं लाइफस्टाइल से जुड़े मुद्दों पर ये नियमित रूप से लिखते रहें हैं. अनूप ने कानपुर विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य विषय में स्नातक किया है. लेखन के अलावा घूमने फिरने एवं टेक्नोलॉजी से जुड़ी नई जानकारियां हासिल करने में इन्हें दिलचस्पी है. आप इनसे anoopdreams@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

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