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इस गाँव की महिलाएं बना रही हैं दो हज़ार वाटर टैंक ताकि आने वाली पीढ़ी को न हो पानी की कमी!

माँ जो होती है न, रोज़ सुबह सबसे पहले जागती हैं और सबको जगाती है। वैसे ही प्रदेश की महिलाएं जब साथ हो जाये तो वह पूरे प्रदेश को जगाने का काम करती है।

हम सभी ने अपने-अपने तरीके से मदर्स डे मनाया होगा। सोशल मिडीया से लेकर प्रिंट मीडिया 13 मई को मदर्स डे के उत्सव में खोया हुआ था। इसी बीच मुझे एक सज्जन मिले और कहने लगे मदर्स डे मनाने का सार्थक तरीका देखना है तो राजनांदगांव ज़िले की महिलाओं के कार्यों को देखो।

इस बात को समझने के लिए मैं उन सज्जन के साथ राजनांदगांव ज़िले के महरूकला गांव पंहुचा, जो राजनांदगांव से 15 किलोमीटर की दूरी पर है।

उस गांव में देखा कि हज़ारों की संख्या में महिलाएं एकत्रित हुई है।

इस तप्ती धूप में गुलाबी साड़ी में इतनी भारी संख्या में महिलायें यहाँ क्या कर रही हैं? कुछ समझ नहीं आया, अपनी कम समझ के अनुसार सोचा कि कोई राजनितिक सभा होगी लेकिन मेरा यह आंकलन तब टूट गया जब मैंने 75 वर्षीय एक दाई को अपनी लकड़ी के सहारे चलते हुए आते देखा।

मैंने पास जाकर दाई से पूछा – “दाई अतेक धुप में ते काबर आये हस?” (इतनी धुप में आप यहाँ क्या कर रहे हो?)।

इस पर दाई कहने लगी – “मैं तोर बर आए हो, तुमन मन ला आने वाले समय म पानी मिल सके एखर बर आए हो।” (मैं तेरे लिए आई हूँ , मैं तुम सभी के लिए आई हूँ, ताकि भविष्य में तुम बच्चों को पानी की समस्या ना हो )

यह सुनकर मैं हैरान हो गया! इस बूढी माँ की संवेदनशीलता और हिम्मत देखते ही बन रही थी।

फिर मेरी नज़र गयी सोख्ता गड्ढे (वाटर बैंक) की तरफ। जिन सज्जन के साथ मैं यहाँ आया था उन्होंने बताया कि राजनांदगांव ज़िले की महिलाएं 2000 सोख्ता गड्ढे का निर्माण कर रही हैं, जिनमें से एक हज़ार सोख्ता गड्ढे (वाटर बैंक) सफलतापूर्वक बना लिए गए है।

मैंने पूछा यह किस प्रकार का गड्ढा है तो मुझे पता चला कि यह 2 फ़ीट गहरा गड्ढा होता है जिसके माध्यम से जल संरक्षण किया जा सकता है। एक सोख्ता गड्ढा अनुमानित 55,000 लीटर पानी सोख लेता है। यह गड्ढे हैंड-पंप के पास, घर के भीतर बनाये जा रहै हैं और इन गड्ढो की खासियत यह है कि यह चार परतों का बनता है – प्रथम लेयर में पत्थर के टुकड़े, फिर ईट के टुकड़े, और अंतिम में कोयले एवं रेत से भराई की जाती है। सबसे पहले पानी रेत से होते हुए जाता है जिसके कारण दूषित पानी का सारा कचरा साफ़ हो जाता है वही कोयला पानी को पूरी तरह से शुद्ध कर देता है और अंतिम में पानी इंट और पत्थर से होते हुए जमीन में चला जाता है।

इन दो हज़ार गड्ढो का निर्माण कोई बहुराष्ट्रीय कंपनी या सरकारी एजेंसी नहीं कर रही बल्कि गांव की यह महिलाएं कर रही हैं।

सोख्ता गड्ढा

बातचीत के दौरान उन सज्जन ने बताया कि यह महिलाएं पिछले 15 वर्षो से जल संरक्षण हेतु निरंतर कार्य कर रही हैं। 2 अक्टूबर 2002, गांधी जयंती के अवसर पर पानी बचाओ अभियान की शुरुआत माँ बम्लेश्वरी स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने पदम्श्री फूलबासन यादव के नेतृत्व में की थी।

सबसे पहले ज़िले के 1000 से अधिक नदी नालों की बंधाई की गयी। इस पहल के माध्यम से रेत के बोरों से पानी को रोका और लाखो लीटर पानी बर्बाद होने से बचाया गया। इस पुरे कार्य में महिलाएं पिछले 15 साल से निरंतर श्रमदान कर रही हैं।

 

सच कहा था उस दाई (अम्मा ) ने मुझे कि मैं इतनी दूर से तुम्हारे लिए चल कर आई हूँ!

मुझे लगता है मदर्स डे को उत्सव की तरह मनाने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता। जिस धरती माँ ने हमें अनाज दिया, जल दिया और रहने को स्थान दिया,आज राजनांदगांव जिले की महिलाओं ने उस माँ को सच्चा तोहफ़ा दिया है। यह अभियान अपने आप में अनूठा है तथा देश के सामने एक सकारात्मक मिसाल है।

इसी बीच कार्यक्रम में महिलाओं ने नारे लगाए –

“फूल नहीं चिंगारी है, यह छत्तीसगढ़ महतारी (महतारी अर्थात माँ ) है”,

और इस नारे के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ!

(संपादन – मानबी कटोच)


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Written by जिनेन्द्र पारख

जिनेन्द्र पारख हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, रायपुर के छात्र हैं. छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से आते हैं. इनकी रुचियों में शुमार है – समकालीन विषयों पर पढ़ना, लिखना जीवन के हर हिस्से को सकारात्मक रूप से देखना , इतिहास पढ़ना एवं समझना.

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