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छत पर लगाए 800 से ज्यादा पेड़-पौधे, अनाथ-आश्रम में दान करतीं हैं अपनी उगाई सब्ज़ियाँ

28 वर्षीया ज्योति ने 8 महीनों में लगभग 45 किलोग्राम सब्ज़ियाँ अनाथ-आश्रमों को पहुंचाई हैं। लॉकडाउन के दौरान भी उन्होंने बहुत से ज़रूरतमंदों को अपनी उगाई हुई सब्जियाँ बांटी!

“जब आपको कोई फूल पसंद आता है तो आप उसे तोड़ लेते हैं। लेकिन जब आप किसी फूल से प्यार करते हैं तो आप हर रोज़ उसे पानी देकर सींचते हैं। जो भी व्यक्ति इस बात को समझ लेता है, उसे ज़िंदगी की समझ हो जाती है,” यह मानना है तेलांगना के भद्राचलम की रहने वाली 28 वर्षीया ज्योति प्रियंका का।

ज्योति का घर किसी बड़े बागान से कम नहीं है। उनकी छत पर 800 से ज्यादा पेड़-पौधे हैं जिनमें फूल, साग-सब्ज़ियाँ आदि शामिल हैं। पेड़-पौधों के प्रति उनका लगाव जग-जाहिर है। खुद मिट्टी तैयार करने से लेकर सभी पौधों की देखभाल का काम वह खुद करती हैं। कभी-कभी उनके माता-पिता भी उनका हाथ बंटाते हैं।

बचपन में स्कूल के दिनों में ज्योति को गार्डनिंग करने और सीखने का मौका मिला और बस तब से ही उन्हें पेड़-पौधों से खास लगाव हो गया। इस लागव की एक और वजह थी और वह था अकेलापन।

Jyoti Priyanka in her Garden

ज्योति बताती हैं कि उनके माता-पिता ने प्रेम-विवाह किया था, जिस वजह से उन्हें पिता पक्ष के लोगों का स्नेह नहीं मिला। उनकी माँ अक्सर अपने मायके में रहती थी। कलह इतनी ज्यादा हो गई कि बचपन में ज्योति को उनकी बुआ के घर पर रहना पड़ा। घर की इस कलह का उनकी माँ पर बहुत असर पड़ा और वह अवसाद में चलीं गईं।

“8वीं कक्षा तक मुझे माँ के प्यार और दुलार से दूर रहना पड़ा। मैं अपनी बुआ के घर ऐसे रहती थी जैसे कि हॉस्टल में रह रही हूँ। पर पेड़-पौधों के साथ मुझे ख़ुशी मिलती। हमारे स्कूल में बहुत से पौधे थे और मैं घर पर भी कुछ न कुछ करती रहती। सबसे अच्छा समय होता था, जब मुझे ननिहाल माँ के पास जाने का मौका मिलता। वहां पर खेती-बाड़ी होती है। भले ही माँ अपने दुःख में मुझ पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पातीं थी लेकिन मैं खेत-खलिहानों में ही बहुत खुश रहती थी,” उन्होंने बताया।

वक़्त के साथ हालात बदले और उन्हें अपने माता-पिता के साथ रहने का मौका मिला। उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और हैदराबाद में नौकरी करने लगीं। लेकिन उन्हें सुबह से शाम तक की नौकरी में अच्छा नहीं लग रहा था। उन्हें अपने आस-पास कुछ न कुछ कमी महसूस होती।

“इधर घर पर भी माँ को मेरी ज़रूरत थी क्योंकि भले ही स्थिति ठीक हो गई लेकिन उनके मन की निराशा और दुःख आज भी हैं। वह आज भी पूरी तरह से अपने दुःख और अवसाद से उभर नहीं पाई हैं। इसलिए मैंने अपनी नौकरी छोड़कर घर वापस आने का फैसला किया,” उन्होंने आगे कहा।

साल 2018 में ज्योति घर आ गईं और अपनी माँ की देखभाल करने लगीं। साथ ही, उन्होंने अपने बचपन के सपने पर काम करना शुरू किया और वह था अपना गार्डन लगाना। उनकी शुरुआत फूलों के पेड़ लगाने से हुई। पहले 20 गमले आए फिर वह 40 हुए और देखते ही देखते कब 100 से ज्यादा पेड़-पौधे उनके यहाँ हो गए पता ही नहीं चला। उन्होंने बताया कि इसके साथ ही उन्होंने साग-सब्ज़ियाँ भी उगाना शुरू किया। वह गोभी, कद्दू, पेठा, मिर्च, बैंगन, आलू, करेला, शहजन, तोरई आदि उगातीं हैं।

पॉटिंग मिक्स तैयार करने के लिए वह मिट्टी, जैविक खाद और वर्मीकंपोस्ट का इस्तेमाल करतीं हैं। इसके अलावा, पेड़-पौधों में पानी देना, उनमें लगने वाले कीटों का ध्यान रखना और साथ ही, समय-समय पर पोषक तत्व देते रहना उनका मुख्य काम है। इस काम में उनकी मदद उनके माता-पिता भी करते हैं।

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ज्योति कहती हैं, “इतने सारे पेड़-पौधों की देखभाल काफी मुश्किल काम है। यह शारीरिक तौर पर मुझे बहुत थका देता है लेकिन सबसे अच्छी बात है इनसे हमारे घर को मिलने वाली सकारात्मक ऊर्जा। मेरी माँ को अवसाद से उबारने में गार्डनिंग ने बहुत मदद की है। उनकी स्थिति में पहले से बहुत सुधार है। हमारे घर का माहौल पेड़ों की वजह से बहुत खुशनुमा रहता है।”

इसके साथ ही, वह अपने पिता पर बहुत गर्व करती हैं और कहती हैं कि जैसे सूरज की धूप पौधों को पोषण देती हैं और उन्हें ऊपर बढ़ने की ताकत देती है। वैसे ही उनके पिता ने उन्हें संभाला और वह आज जो कुछ भी हैं सिर्फ अपने पिता की मेहनत की वजह से हैं।

ज्योति के मुताबिक, उन्हें अपने गार्डन से काफी ज्यादा साग-सब्जियां और फूल मिलते हैं। जिन्हें वह अपने आस-पड़ोस में बाँट देती हैं। उन्होंने शुरुआत में आठ महीने शहर के तीन अनाथ आश्रमों को भी अपने गार्डन की सब्जियां दान की। सीजन में वह हर हफ्ते लगभग 3 किलो सब्जियां दान करतीं हैं।

लॉकडाउन के दौरान उन्होंने गरीब और ज़रूरतमंद लोगों को सब्ज़ियाँ भी बाँटना शुरू किया। वह कहतीं हैं, “अगर मैं किसी के काम आ सकती हूँ तो क्या बुरा है। लॉकडाउन में मैं अपने गार्डन की वजह से बहुत से लोगों की मदद कर पाई, इससे अच्छा और क्या हो सकता है।”

ज्योति का सपना है कि एक दिन वह कुछ एकड़ ज़मीन लेकर उस पर किसानी करें। इससे वह दूसरों को भी रोज़गार दे पाएंगी। वह कहतीं हैं कि हर एक इंसान को अपने हिस्से का अच्छा काम ज़रूर करना चाहिए। दूसरों की मदद करने से बेहतर कुछ नहीं। वह गार्डनिंग से न इरफ अपनी बल्कि दूसरे लोगों और पर्यावरण की मदद कर रही हैं!

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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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