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मिलिए अहमदाबाद की पहली दिव्यांग महिला ऑटो ड्राइवर से, उठा रहीं पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी!

पिता के कैंसर, घर की बंद आमदनी और जीरो बचत को ध्यान में रखते हुए अंकिता ने लीग से कुछ हटकर ऑटो रिक्शा चलाने का फैसला किया।

Ahemdabad auto driver

मैं राख़ हूँ, अंधकार हूँ, पाताल हूँ, विनाश हूँ,

सुबह की पहली रौशनी, अमृत की बहती धार हूँ,

मैं हूँ खुदी मिटाने वाली, हौंसला अपार हूँ,

रूह मैं भटकती, सुकून-ए-इंतज़ार हूँ!

कहते हैं इंसान अगर कुछ चाह ले तो क्या नहीं कर सकता और अगर वह एक औरत हो तो नामुमकिन कुछ भी नहीं!

लेकिन शायद हम उस समाज़ से वास्ता रखते है, जहाँ बाहरी रूप और क्षमता, आंतरिक बोल्डनेस और ताकत से अधिक मायने रखती है। जहाँ लोग विकलांगता को अयोग्यता मानते हैं और अपनी क्षमता साबित करने के लिए आपसे पूर्ण कार्यात्मक शरीर की मांग करते है। दुख की बात है, है न?

लेकिन किसी ने सच ही कहा है कि मुसीबतें चाहे जैसी भी हों, करने वाला कर गुज़रता है।

आज मैं आपसे अंकिता शाह की कहानी साझा करना चाहती हूँ, जिनपर ऊपर लिखी सभी बातें बिलकुल फिट बैठती हैं।

वैसे तो अंकिता इकोनॉमिक्स ग्रेजुएट हैं, लेकिन उनकी यह पढ़ाई और डिग्री किसी काम की नहीं। क्योंकि कंपनियों ने उनकी डिग्री नहीं बल्कि उनकी विकलांगता को ज़्यादा महत्व दिया। जिसके कारण उन्हें कभी अच्छी नौकरी मिल ही नहीं पायी। उन्हें या तो इंटरव्यू में ही छांट दिया जाता या फिर बाकी लोगों के मुकाबले आधी सैलरी ऑफर की जाती।

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अंकिता शाह

जब पोलियो ने छीना था बचपन 

गुजरात के पलिताना की रहने वाली अंकिता दस साल पहले अपने परिवार के साथ अहमदाबाद आ कर बस गई थीं।  वह बताती हैं, “मेरा दाहिना पैर बचपन में ही पोलियो के कारण काटना पड़ गया था। उस कटे हुए पैर का तो विकल्प मिल गया लेकिन अफसोस मेरे सपनों का नहीं।”

बेहतर आजीविका की तलाश में आये अंकिता के पिता को जल्द ही ख़राब स्वास्थ्य ने काम छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया और घर की सबसे बड़ी बेटी अंकिता को ही अपने 7 लोगों के परिवार की ज़रूरतों को पूरी करने की कोशिश शुरू करनी पड़ी।

अंकिता आगे बताती हैं, “पलिताना में मुझे एक स्थानीय हाई स्कूल में क्लर्क की नौकरी मिली थी। उन्होंने तीन महीने काम करने के बाद मुझे फिक्स्ड सैलरी देने का वादा किया। मैंने वहां दस महीने तक काम किया, लेकिन सैलरी के नाम पर एक भी रुपया नहीं मिला। यहाँ अहमदाबाद में मैंने हर तरह के काम किये। कॉल सेंटर, रियल एस्टेट, शेयर बाजार और यहाँ तक ​​कि होटल में एक हाउसकीपर के रूप में भी काम किया लेकिन मैं कहीं भी टिक नहीं पायी। एक कॉल सेंटर ने मुझे मेरी ख़राब अंग्रेजी के कारण नौकरी छोड़ने के लिए कहा जबकि रियल एस्टेट फर्म में मुझे पता चला कि मेरी विकलांगता के कारण मुझे कम सैलरी दी जा रही थी। कई इंटरव्यू में तो मुझे मेरी विकलांगता के कारण सीधे-सीधे मना कर दिया गया था। आप मुझे हैंडीकैप्ड भी कहोगे, जॉब भी नहीं दोगे तो मेरे पास क्या विकल्प बचेगा?”

पिता के कैंसर ने दी हिम्मत 

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अंकिता शाह के माता-पिता

जून 2019 में उन्हें उनके पिता के आंतों के कैंसर के बारे में पता चला। वह जानती थीं कि उनकी लड़ाई अब और भी लंबी बन चुकी है।

उस वक़्त वह एक कॉल सेंटर में काम कर रही थीं, जहाँ की 12 घँटे की नौकरी ना तो उन्हें अपने पिता के साथ अस्पताल जाने की इजाज़त देती और न महीने के अंत में आने वाली सैलरी इलाज में सहायक होती। नतीजतन उन्होंने अगले महीने 10 जुलाई को अपनी नौकरी छोड़ने का फ़ैसला किया।

वह बताती हैं,  “उसके बाद मैंने एक बैक ऑफिस एक्जीक्यूटिव के पद के साथ-साथ दो और इंटरव्यू दिए लेकिन मुझे मेरी विकलांगता के कारण फिर से अस्वीकार कर दिया गया था। मैंने उसी दिन, उसी पल फ़ैसला लिया कि अब जो करुँगी अपने दम पर अपनी मर्ज़ी से करुँगी। अब और किसी की गुलामी नहीं करनी थी।”

पिता के कैंसर, घर की बंद आमदनी और जीरो बचत को ध्यान रखते हुए अंकिता ने काफ़ी चीज़ों के बारे में सोचा। काफ़ी तरह के काम के बारे में लोगों से बात की और ढ़ेरों विकल्पों के बाद उन्होंने लीग से कुछ हटकर ऑटो रिक्शा चलाने का फैसला किया।

पर एक लड़की ऑटो रिक्शा चलाये? यह कैसे हो सकता है? भूलियेगा नहीं मैंने शुरुआत में ही आपको हमारे समाज़ की ‘विडंबना’ बताई थी।

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बनी अहमदाबाद की पहली स्पेशली-एबल्ड महिला ऑटो ड्राइवर

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ऑटो चलातीं अंकिता

हाँ तो, मुश्किलें तो बहुत आईं। परिवार वालों की भी रज़ामंदी नहीं थी। लेकिन अंकिता ने फ़ैसला ले लिया था। उनके एक मित्र और साथी ड्राइवर लालजी बारोट ने उन्हें ऑटो चलाना सिखाया और साथ ही हाथ से संचालित होने वाले ब्रेक के साथ एक कस्टमाइज्ड ऑटो रिक्शा खोजने में भी मदद की।फिर क्या था, अंकिता के ऑटो और सपनों ने धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़नी शुरू कर दी।

अंकिता बताती हैं, “लगभग 10 महीने हो गए हैं मुझे ऑटो चलाते हुए। वैसे तो मैं रोज़ सुबह 11:30 बजे ऑटो चलाना शुरू करती थी और रात 8 बजे तक चलाती थी लेकिन अभी इस लॉकडाउन के कारण जल्दी ही जाना शुरू कर दिया है। मैं ज्यादातर चांदखेड़ा और कालीपुर रेलवे स्टेशन के बीच ही ऑटो चलाती हूँ। वैसे तो हर महीने लगभग 25,000 रुपये की आमदनी हो जाती थी लेकिन अभी लॉकडाउन के कारण घर भर चलाने को पैसे आ जाते हैं।” अंकिता अपनी डेस्क जॉब से ज़्यादा ऑटो चलाकर कमा रही थीं लेकिन मौजूदा परिस्थितियों ने उनके काम और जीवन को थोड़ा कठिन बना दिया है। पर उनके ऑटो की इएमआई, पेनाल्टी, घर का भाड़ा, पिता की दवाईयाँ उन्हें हार नहीं मानने देते।

लेकिन सिर्फ लॉकडाउन ही नहीं जिससे अंकिता को परेशानी हुई। लोगों का बेवजह घूरना, बाइकर्स द्वारा अक्सर उनका मज़ाक बनना, अन्य पुरुष ड्राइवरों द्वारा सेक्सिस्ट कमेंट्स का सामना करना, यह सब भी उनकी डेली रूटीन का हिस्सा है। और हो भी क्यों ना! आख़िर औरत है, भला ऑटो कैसे चला सकती हैं!! सही कहा ना मैंने?

लेकिन अंकिता भी बड़ी हठी है, हार नहीं मानतीं! वह कहती हैं कि काफ़ी लोगों ने उन्हें अपनाया भी है। वह मानती हैं कि दूसरी औरतों को उनसे हिम्मत मिलेगी और आगे बढ़ने का हौसला मिलेगा। बाकी नकारात्मकता को नज़रअंदाज़ करना चाहिए।

द बेटर इंडिया से मिली मदद 

हमने अंकिता की कहानी पहले अंग्रेजी में प्रकाशित की थी जिसे पढ़ने के बाद उन्हें उबर से ऑटो ड्राइविंग का भी प्रस्ताव आया। भविष्य में वह अपने ऑटो की ईएमआई पूरी करने के बाद उबर या ओला में ही कैब चलाना चाहती हैं।

वह कहती हैं, “मैं खुश हूँ अपने काम से, मुझे इसी में अपना फ्यूचर बनाना है। जब जॉब करती थी तो दूसरों पर डिपेंडेंट रहना पड़ता था, अब अपने मन की करती हूँ। जब ऑटो चलाना होता है चलाती हूँ, जब अस्पताल या घर में ज़रुरत होती है तब वहाँ रहती हूँ, अपना धंधा अपने हिसाब से करती हूँ।”

जब अंकिता से फ़ोन पर बात कर रही थी तो उनकी मासूम सी आवाज़ और सरलता से लगा ही नहीं कि वह चलती फिरती ‘शक्ति’ की परिभाषा हैं। हाँ, हम औरतें अक्सर ख़ुद को नज़रअंदाज़ कर देती हैं।

“मैं किसी की भी बात या हरकत से प्रभावित नहीं होती हूँ, मैंने खुद को इतना मज़बूत बना लिया हैं,” अंकिता की कही इस बात ने मुझे याद दिलाया कि ख़ुद को नज़रअंदाज़ करना सबसे पहली और बड़ी असफलता है।

वर्तमान में अंकिता के छोटे भाइयों ने भी काम करना शुरू कर दिया है और वो भी अपने पिता के इलाज के लिए आर्थिक रूप से सहयोग करते हैं। पिता की कीमोथेरेपी की रिपोर्ट अब भी आनी बाकी है, जिसके बाद डॉक्टर उन्हें आगे के इलाज़ के बारे में बतायेंगे। शाह परिवार के लिए इस आर्थिक तंगी को झेलना और पार करना इतना आसान नहीं है। लेकिन वह उम्मीद करती हैं कि वक़्त के साथ सब सुधर जायेगा।

मैं भी यही उम्मीद करती हूँ कि उनके जीवन में धूप जल्द ही आये! अगर आप या आपके कोई परिचित अंकिता की आर्थिक रूप से सहायता करना चाहे तो नीचे दिए डिटेल्स की मदद से उन तक सहायता राशि पहुँचा सकते हैं।

Account number: 002401574160

Account holder’s name: SHAH ANKITABEN

IFSC Code: ICIC0000024

MMID: 9229869

संपादन- पार्थ निगम

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Written by सोनाली

लोगों की कहानियाँ सुनने और लिखने की शौक़ीन सोनाली मानती हैं कि हर व्यक्ति की कहानी अनोखी और ख़ास है। वे समाज के अछूते और अनकहे वर्गों पर अपने विचारों को बुनना काफ़ी पसंद करती है। लिखने के अलावा उन्हें सामाजिक मुद्दों पर पढ़ने का शौक़ हैं। सोनाली मानसिक स्वास्थ्य को काफ़ी महत्त्व देती हैं और लोगों को अपने दिल की बात कहने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। आप उन्हें www.theobstinategirl.com पर पढ़ सकते हैं!

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