in , ,

छत्तीसगढ़: ‘जल स्टार’ वीरेंद्र सिंह के अभियानों से एक नदी, 2 कुंड और 35 तालाब हुए स्वच्छ!

जल-अभियानों के साथ-साथ वीरेंद्र छुट्टी वाले दिन गाँव के बच्चों और महिलाओं के साथ मिलकर वृक्षारोपण और स्वच्छता अभियान चलाते हैं!

छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों का नाम आते ही ज़्यादातर लोगों के दिमाग में एक ऐसे क्षेत्र की छवि उभरकर सामने आती है जो पिछले कई वर्षों से हिंसा और संघर्ष से जूझ रहा है। लेकिन इस छवि के परे एक और छवि है, वह है वहां की हरियाली।

यहाँ के घने जंगल जो मीलों तक खत्म नहीं होते और सदियों पुरानी नदियों की गाथा भी विशाल है। शायद इसी परिवेश ने वीरेंद्र सिंह को प्रकृति के संरक्षण की ज़िम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित किया। दिन-प्रतिदिन इंसानों के स्वार्थ की भेंट चढ़ रही प्रकृति को बचाने के लिए वह पिछले 20 सालों से कार्यरत हैं।

बालोद जिला के दल्लीराजहरा गाँव में एक सामान्य किसान परिवार में जन्मे वीरेंद्र सिंह ने बचपन से प्रकृति से प्यार किया। उनके घर में ढेर सारे पेड़-पौधे थे वहीं गाँव के तालाबों में हमेशा पानी रहा करता था। लेकिन विकास की अंधी दौड़ में हम सब पेड़-पौधे से दूर होते चले गए।

हालांकि लोगों को आज समझ में आ रहा है कि पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों को बचाना ज़रूरी है। लेकिन वीरेंद्र सिंह की पहल तो आज से 20 साल पहले ही शुरू ही गई थी जब उन्होंने देखा कि गाँव के लोग लकड़ियों के लिए जंगलों का सफाया करते जा रहे हैं।

Virendra Singh

द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया, “मैंने कॉमर्स विषय से पढ़ाई की और एम.कॉम, एम.ए. अर्थशास्त्र में डिग्री हासिल की। इसके बाद 2000 में मैंने एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी ज्वाइन कर ली। उसी समय से मैंने पर्यावरण संरक्षण के लिए अभियान की शुरूआत की। स्कूल में बच्चों को पढ़ाते हुए उन्हें प्रकृति का महत्व भी समझाया और लगभग 25 बच्चों की टीम बनाकर पौधारोपण शुरू किया।”

अपने छात्रों के साथ मिलकर वह हर शनिवार पौधे लगाने के साथ-साथ स्वच्छता अभियान भी करते थे। उन्होंने लगभग 17 साल पहले 250 पौधे लगाए और फिर उनकी पूरी देखभाल की। हर साल वह उन पौधों का जन्मदिन भी मनाते हैं।

Plantation Drives

आज सभी पौधे घने पेड़ बन चुके हैं। इसके अलावा, भी उनका पौधारोपण कार्य और फिर इनकी देखभाल नियमित रूप से जारी रहती है। वृक्षारोपण के साथ-साथ उन्होंने अन्य कई तरह के अभियान भी शुरू किए ताकि वह लोगों के व्यवहार में परिवर्तन ला सकें।

“एक वक़्त था जब लोग ताने भी देते थे पर मैं अपने काम में लगा रहा। मेरा उद्देश्य अपने जंगलों और पानी के प्राकृतिक स्त्रोतों को बचाना है और मैं यह आजीवन करता रहूँगा। प्रकृति को सहेजने में कोई मुश्किल नहीं है, मुश्किल है तो लोगों की सोच बदलना। अगर लोग इस छोटी सी बात को समझ लेंगे कि बिना प्रकृति हमारा भी कोई अस्तित्व नही है तो चीजें बहुत आसान हो जाएंगी,” उन्होंने कहा।

He is doing all his drives with community participation

वीरेंद्र सिंह ने अपने सभी कार्य और अभियान जन-सहभागिता के साथ किए। उन्होंने अपने गाँव में काम करने के साथ साइकिल यात्राएँ भी की। सबसे पहले, 2007 में उन्होंने दुर्ग जिले से नेपाल तक की यात्रा की, जिसमें उनके साथ दस लोग थे। इसके बाद, वह 2008 में अपने 11 साथियों के साथ छत्तीसगढ़ के भ्रमण पर निकले और लोगों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। इसके अलावा, उन्होंने राजहरा से कुसुमकसा तक 7 किमी तक 15000 स्कूली छात्रों के साथ मिलकर मानव-श्रृंखला बनाई और लोगों को जागरूक किया।

उन्होंने अपने गाँव और आस-पास के गांवों में सार्वजनिक स्थानों पर अब तक हजारों की संख्या में पेड़-पौधे लगाए हैं।

Promotion
Banner

पिछले 10 वर्षों से वह एक प्राइवेट कंपनी में काम कर रहे हैं। वह अपने वेतन का एक हिस्सा पर्यावरण संरक्षण के लिए खर्च करते हैं। छुट्टी का दिन उनके अभियानों के लिए है और वह बहुत ही रचनात्मक तरीकों से अपना संदेश देते हैं। कभी अपने शरीर पर पेंटिंग कराकर तो कभी जोश भर देने वाले नारे लगाकर।

Spreading awareness

उन्होंने ग्लोबल वार्मिंग और बाघों को बचाने के लिए अपने शरीर पर पेंटिंग बनाकार लोगों को संदेश दिया था। इसके अलावा उनके कुछ प्रमुख नारे हैं- बच्चा एक, वृक्ष अनेक, हमने ये ठाना है, पर्यावरण बचना है, स्वच्छ घर, स्वच्छ शहर आदि। पर्यावरण के अलावा भी वह कई सामाजिक मुद्दों पर ग्रामीणों को जागरूक करते हैं, जैसे एड्स जागरूकता अभियान, साक्षरता अभियान, मतदान अभियान आदि।

“13 साल पहले हमें गाँव के एक कुंड की साफ़ सफाई कर उसे सहेजा था और फिर इस पर सरकार के सहयोग से घाट बन गया। आज सभी लोग इस घाट का आनंद लेते हैं। उस कुंड से शुरू हुआ जल-स्त्रोतों को सहेजने का काम लगातार चलता रहा। हमने अब तक 35 तालाबों, 2 कुंड, तन्दला नदी और कई नालों की साफ़-सफाई की है,” उन्होंने बताया।

अभी भी वीरेंद्र लोगों के साथ मिलकर कांकेर और बालोद में तालाबों और कुओं के संरक्षण कार्य में जुटे हुए हैं। वह कहते हैं कि अगर हम अपने पारंपरिक जल-स्त्रोतों को नहीं बचाएंगे तो भूजल स्तर कैसे बढ़ेगा और जिस तरह से भूजल स्तर घट रहा है, उस हिसाब से तो चंद सालों में भारत प्यासा मरने लगेगा।

Reviving Water Resources

वीरेंद्र को उनकी पहलों और कार्यों के लिए आम लोगों के समर्थन के साथ-साथ सरकार की सराहना भी मिल रही है। उन्हें अब तक कोई छोटे -बड़े पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है जिसमें, तरुण भूषण, छत्तीसगढ़ जल-स्टार अवॉर्ड आदि शामिल हैं। कुछ समय पहले जलशक्ति मंत्रालय ने भी उनके कार्यों की सराहना करते हुए पोस्ट की थी।

‘ग्रीन कमांडो’ और ‘जल स्टार’ जैसे नामों से प्रसिद्ध वीरेंद्र सिंह हर साल रक्षाबंधन के मौके पर वेस्ट मटेरियल से राखी भी बनाते हैं। इसके पीछे उनका उद्देश्य लोगों को पर्यावरण की देखभाल करने के लिए प्रेरित करना है। वीरेंद्र कहते हैं कि उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई उन्हें सराह रहा है या नहीं। उनका लक्ष्य लोगों को प्रकृति के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास करना है।

अगर आपको वीरेंद्र सिंह की कहानी से प्रेरणा मिली है तो आप उनसे 9685090631 पर संपर्क कर सकते हैं और उनके अभियानों में उनकी मदद कर सकते हैं!

यह भी पढ़ें: उस शख्स की कहानी जिसने सतपुड़ा के जंगलों को टूरिस्ट स्पॉट में बदल डाला!


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है, या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ साझा करना चाहते हो, तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखें, या Facebook और Twitter पर संपर्क करें। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर व्हाट्सएप कर सकते हैं।

Promotion
Banner

देश में हो रही हर अच्छी ख़बर को द बेटर इंडिया आप तक पहुँचाना चाहता है। सकारात्मक पत्रकारिता के ज़रिए हम भारत को बेहतर बनाना चाहते हैं, जो आपके साथ के बिना मुमकिन नहीं है। यदि आप द बेटर इंडिया पर छपी इन अच्छी ख़बरों को पढ़ते हैं, पसंद करते हैं और इन्हें पढ़कर अपने देश पर गर्व महसूस करते हैं, तो इस मुहिम को आगे बढ़ाने में हमारा साथ दें। नीचे दिए बटन पर क्लिक करें -

₹   999 ₹   2999

Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

चीड़ पेड़ के पत्तों से बिजली उत्पादन कर महीने के लगभग 45 हज़ार रुपये कमा रहा है यह शख्स!

IBM की नौकरी छोड़ शुरू किया खुद का काम,अब बनातीं हैं ऐसे बर्तन, जिन्हें खा भी सकते हैं आप।