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इतवारी घुमक्कड़ी: चलें वहां जहां बाल सूर्य की अठखेलियां दिखती हैं सबसे पहले।

अपने हिंदुस्तान पर गुरूर का अहसास पुख्ता कराएगा देश का यह कोना।

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मखौल नहीं होगा फिर से पैरों में पहिए बांधना, कतई आसान नहीं होगा घर से निकल पड़ना। यायावरी के जो पंख अदृश्‍य विषाणु कतर चुका है, उन्‍हें फिर उड़ान की खातिर तैयार करने में वक्‍़त लेगा। तो भी ‘नामुमकिन’ तो हम घुमक्‍कड़ों की शब्‍दावली से नदारद है, लिहाज़ा सब ठीक-ठाक होते ही हम फिर से नन्हें-नन्हें डग भरना सीखेंगे। हम फिर आसमान का रुख करेंगे। हम फिर धरती नापेंगे, समंदर की लहरों पर कूदेंगे, पहाड़ों से मिलेंगे।

माना कि वह बेख्‍याली नहीं होगी जिसके आदी हो चुके थे हम और आप, तो भी कुछ जगहें हैं जहां हालात बदलने के बाद घुमक्‍कड़ पैरों को लेकर निकल पड़ना सुकून भरा अनुभव होगा। मसलन, सूरज की पहली किरण की धमक सुनने वाला पूरब का प्रदेश यानी अरुणाचल प्रदेश।

Arunachal

सोशल डिस्‍टेंसिंग होगी आसान

अरुणाचल पूर्वोत्‍तर का विशाल प्रदेश है जहां एक वर्ग किलोमीटर में बमुश्किल 17 लोग रहते हैं, यानी देश में 370 के जनसंख्‍या घनत्‍व की तुलना में बहुत कम आबादी के दर्शन यहाँ होते हैं। आप दिन-भर यहाँ से वहाँ हो आइये, गांव-गांव, जंगल-जंगल और लोग मिलेंगे मुट्ठीभर। सोशल डिस्‍टेंसिंग का इंतज़ाम और वह भी अपने आप जहाँ हो, वहाँ क्‍यों न चला जाए।

मेहनतकश और हंसमुख ट्राइबल्‍स का घर है अरुणाचल

आपातीनी, न्‍यीशी, गालो, बुगुन, मिश्‍मी जैसे नाम अगर आपको चौंकाते हैं, तो निश्चित ही इन जनजातियों का यह घर भी आपको लुभाएगा। आप तो बस चले आइये।

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पूर्वोत्‍तर में बसे अरुणाचल में करीब 26 प्रमुख ट्राइब्‍स और 100 से ऊपर सब-ट्राइब्‍स हैं जिनके अनोखे रीति-रिवाज़, रोचक तीज-त्‍योहार, अद्भुत परंपरायें और बिंदास रहन-सहन आपको यकीनन रास आएगा। बस ध्‍यान इतना रहे कि उनकी आस्‍था, जीवनशैली, आदतें, व्‍यवहार, खान-पान, खेत-खलिहान, घर-देहात से लेकर उनके आंगन, पहाड़, खेत और उनका रूप-रंग, बोलियाँ आपसे बहुत फर्क होंगी। विविधता के दर्शन करने का इरादा हो तो, चले आइये अरुणाचल।

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दूरियों को कम न आंकना

देश के दूसरे हिस्‍सों से इस ज़मीन तक पहुंचना बहुत आसान नहीं है, एक या दो उड़ानों के बाद पूर्वोत्तर के प्रवेशद्वार यानी गुवाहाटी या डिब्रूगढ़ तक पहुंचने के बाद शुरू होता है ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर, कमर-तोड़ू यात्राओं का लंबा सिलसिला। पब्लिक ट्रांसपोर्ट की उम्मीद बेकार है। शेयर्ड जीप या प्राइवेट कैब से सफर आम है। और दिन-दिनभर दूरियां नापने के लिए कैब में गुजारने के लिए भी तैयार रहना!

कस्बाई हदों से निकलते-निकलते मोबाइल के सिग्नल दम तोड़ चुके होंगे और ऐन उस घड़ी कुदरत के दिलफरेब नज़ारे आंखों के रास्ते रूह में उतरने चले आएंगे। अपने हिंदुस्तान पर गुरूर का अहसास पुख्ता कराएगा देश का यह कोना।

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पूर्वोत्तर की सात सखियों में से अरुणाचल देश का इकलौता ऐसा राज्य है जिसमें घुसने के लिए परमिट लेना पड़ता है! यह काम ज्यादा मुश्किल या मंहगा नहीं है।  टूर ऑपरेटर को अपना परिचय-पत्र ईमेल से भेजकर इसका आसानी से इंतज़ाम हो जाता है। वरना, पूर्वोत्‍तर के प्रवेशद्वार यानी असम में गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ या अरुणाचल प्रदेश में इटानगर के नज़दीक नाहरलगुन स्‍टेशन पर पहुंचकर भी इसे बनवाया जा सकता है।

दिन की जल्‍द शुरुआत जरूरी है

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पूरब की इस धरती पर शाम के साढ़े चार बजते-बजते सूरज बाबा की पालकी उठ लेती है और पाँच बजे तक तो पूरी रात घिर आती है। दिन और रात के पहर यहाँ आते ही गड्मगड हो लेते हैं। क्षितिज के उस पार डूबा सूरज का गोला ठीक बारह घंटे गायब रहने के बाद मचलने लगता है और सवेरे चार-सवा चार बजे तक नए दिन का घंटा बजा देता है। शुरू के 4-5 दिन तो सूरज की इन मनमानियों को समझने में ही गुजर जाते हैं और आप सहज ही पूछ बैठते हैं कि आखिर इस धरती पर एक अलग टाइमज़ोन क्‍यों नहीं होना चाहिए?

धुर पूरब यानी अरुणाचल की यात्रा कई स्‍तरों पर नएपन के अहसास से भरती है। इसकी एक खास नदी है सियांग जिसकी लहरों पर राफ्टिंग के अरमान पूरे किए जा सकते हैं। अरुणाचल में इसे देखकर मेरा मन तिब्बत पहुंच चुका था जहां इसकी मूल धारा से मिलन का योग बना था छह साल पहले कैलास परिक्रमा पथ पर। वहाँ इसका नाम यारलुंग त्सांग्पो है और यहां अरुणाचल में सियांग या दिहांग जो असम में ब्रहृमपुत्र हो लेती है, फिर बांग्लादेश में जमुना (यह हमारी यमुना से अलग है) और आगे चलकर खुद को गंगा (जो पद्मा कहलाती है) में समो देती है। अपने अंतिम पड़ाव में यह मेघना हो जाती है, बांग्लादेश की मेघना और फिर अपने वजूद को भुलाकर बंगाल की खाड़ी से मिलन को आतुर हो लेती है। अरुणाचल की यात्रा ऐसी कितनी ही नदियों की जीवन यात्राओं से रूबरू कराती है। प्रकृति प्रेमी हैं, नदियों और पहाड़ों से मिलन की आस है तो अरुणाचल को अगली मंजिल बनाएं।

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शहरों में ट्रैवलसे अलग है फलसफा

यहां न पार्टी सीन है न क्‍लब-पब और न भव्‍य पांच सितारा होटल। यहां तो लोकल ट्राइबल्‍स से कुछ इस अंदाज़ में मिलने के मौके हैं कदम-कदम पर।

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एकदम खालिस अनुभव हासिल करने का मन बनाकर इस तरफ आने वाला ही यहाँ खुश रह सकता है। इन बांस-खपच्चियों के सेतुओं पर से दिल थामकर गुजरने का माद्दा हो तो बेझिझक चले आइये इस तरफ। अलग-अलग जिलों में, गांवों में ट्राइबल इंजीनियरिंग के इन नमूनों को देखकर आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे।

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‘अरुणाचल’ सिर्फ मंजिल नहीं, एक अहसास है और अगर अब तक इस अहसास को जीने से चूकते रहे हैं, तो अब चले आइये। कुदरत ने बड़ी फुर्सतों में इसे बनाया है और आदिवासी समाजों ने दिल-खोलकर संवारा है। अद्भुत है अरुणाचल।

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एक-दो जरूरी बात बताती चलूंगी।

अरुणाचल में बारिश नहीं आसमान बरसता है, और पूरी धरती तर-बतर हो जाती है। लैंडस्लाइड, टूटी सड़कें, प्रमुख आकर्षणों के बंद हो जाने, जंगलों-झरनों तक पहुंचने के रास्ते खुले नहीं होने और जोंक के अलावा कीटों-सांपों आदि के खतरे मानसून में आम है। गर्मियों में मार्च से मई और सर्दी में अक्‍टूबर से फरवरी में अरुणाचल की यात्रा में सुकून रहता है।

अरुणाचल में सफर करना मंहगा है। प्राइवेट कैब में हर दिन करीब 10 से 11 हजार रूपये आसानी से खर्च हो जाते हैं। उस पर दूरियां भी जालिम हैं। खानपीन, रहने-ठहरने की सुविधाएं लगभग बेसिक हैं। और उस पर अगर आप वेजीटेरियन हैं तो दिक्कतें कुछ और बढ़ जाती हैं।

संपादन- पार्थ निगम

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