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पिंजरे साफ़ करते-करते बन गया रक्षक, 200+ जानवरों को बचा चुका है यह युवक!

प्रसन्ना और उनकी टीम के प्रयासों से ही शहर में चायनीज मांझे के प्रयोग पर रोक लगी और साथ ही, उन्होंने लोगों को वन्यजीव-जंतुओं के प्रति जागरूक करने के लिए भी अभियान चलाए हैं!

“पूरे भारत में शायद बेंगलुरू ऐसा शहर है जहां की बायोडायवर्सिटी इतनी समृद्ध है। जंगलों से लेकर यहाँ की झीलों तक और पशु-पक्षियों की प्रजातियों तक, आपको शायद ही दूसरा कोई शहर ऐसा मिले। लेकिन यहाँ लोगों की जनसंख्या भी इतनी ही है। ऐसे में, मेरी कोशिश सिर्फ लोगों और इन वन्य जीव-जंतुओं के बीच एक बैलेंस बनाने की रही है और मुझे ख़ुशी है कि बहुत से लोग अब इन वन्य जीवों का महत्व समझते हैं,” यह कहना है बेंगलुरू वाइल्डलाइफ वार्डन प्रसन्ना कुमार का।

जानवरों के साथ प्रसन्ना की दोस्ती मात्र 14 साल की उम्र से शुरू हुई। बेंगलुरू के समीप स्थित एक गाँव के रहने वाले प्रसन्ना, अपने माता-पिता के साथ साल 1992 में शहर आए और फिर यहीं के होकर रह गए। वह बताते हैं कि गाँव में उनके पिता की छोटी-सी ज़मीन थी लेकिन कुछ बचता नहीं था और घर चलाना मुश्किल हो रहा था। फिर जिस तरह भारत के अनगिनत किसान पेट पालने के लिए गाँव छोड़कर मजदूरी के लिए शहर पहुँच जाते हैं, वैसे ही प्रसन्ना का परिवार भी आया। उस समय यहाँ पर बेंगलुरू वाइल्डलाइफ रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर का काम चल रहा था।

कुछ निर्माण हो चुका था तो कुछ बाकी था। प्रसन्ना के माता-पिता को इसी अस्पताल में मजदूरी का काम मिल गया। माँ-बाप मजदूरी करते और प्रसन्ना बाकी छोटे-मोटे काम किया करते। “मैं जानवरों को संभालने में स्टॉफ की मदद करता था। कभी उनके उपकरण साफ़ कर देता तो कभी वहां पर रखे पिंजड़े आदि। वहां जो डॉक्टर आते और दूसरे लोग आते, उनसे हमेशा सुनने को मिलता कि ये वन्यजीव कितने ज़रूरी हैं। अगर ये नहीं होंगे तो मनुष्य भी नहीं रहेगा। उनकी बातें सुनते-सुनते ही मैं बड़ा हुआ और स्कूल की पढ़ाई के बाद मैंने वन्यजीव संरक्षण और बायोडायवर्सिटी पर कोर्स कर लिया,” उन्होंने आगे बताया।

Prasanna Kumar, Wildlife Rescue Volunteer

साल 2008 में उन्होंने बृहत बेंगलुरू महानगर पालिका की फारेस्ट सेल टीम को ज्वाइन किया। दूसरे लोगों के लिए यह शायद कोई नौकरी हो लेकिन प्रसन्ना के लिए यह उनकी ज़िंदगी का उद्देश्य है। बहुत बार उन्होंने अपनी ड्यूटी से आगे जाकर भी काम किए हैं। वह बताते हैं कि जब उन्होंने बीबीएमपी के साथ काम शुरू किया, तब बेंगलुरु के आस-पास के गांवों को भी नगरपालिका में जोड़ा जा रहा था। शहर का क्षेत्र बढ़ रहा था और साथ ही जनसंख्या भी। ऐसे में, सबसे ज्यादा मुश्किल थी इन मासूम जीवों के लिए।

“बहुत बार तो लोग उनके यहाँ कोई जंगली जानवर या फिर सांप आदि आने पर उन्हें मार दिया करते थे। जबकि उन्हें पता था कि वह रेस्क्यू टीम को बुला सकते हैं। बहुत ही कम लोग होते थे जो हमें फ़ोन करते थे। मुझे लगा कि यह ठीक नहीं है। इस तरह तो हम अपनी प्रकृति को खत्म कर रहे हैं। इसलिए मैंने अपने स्तर पर रेस्क्यू के साथ-साथ जागरूकता का काम भी किया। जहाँ भी टीम जाती, वहां हम लोगों को इकट्ठा करके समझाते कि अगर आपके आस-पास कोई भी वन्य जी आपको दिखे तो सीधा हमें फोन करें,” उन्होंने कहा।

Rescuing wildlife and making people aware

प्रसन्ना और बीबीएमपी वाइल्डलाइफ रेस्क्यू टीम के प्रयास रंग लाने लगे और लोग उन्हें फ़ोन करते। प्रसन्ना के मुताबिक, एक वक़्त ऐसा भी था कि उन्हें दिन में लगभग 40 रेस्क्यू कॉल आतीं थीं। सभी जगह सर्विस दी जा सके, इसके लिए उन्होंने ट्रेनिंग प्रोग्राम्स किए। वार्ड स्तर पर और जोन के हिसाब के उन्होंने लोगों को रेस्क्यू ट्रेनिंग दी ताकि ज़रूरत पड़ने पर उनके और वॉलंटियर मदद के लिए पहुँच सकें।

आज भी हर दिन प्रसन्ना अपनी टीम के साथ मिलकर लगभग 3 रेस्क्यू तो कम से कम करते हैं। बाकी लॉकडाउन के दौरान यह नंबर और भी बढ़ गया था। पिछले दो-तीन महीनों में उन्होंने 198 वार्ड्स में अपनी टीम के साथ मिलकर 200 से भी ज्यादा जानवरों की जान बचाई है।

इतना ही नहीं, प्रसन्ना और उनकी टीम ने शहर में चायनीज मांझे के खिलाफ भी अभियान चलाया था। उन्होंने इस संदर्भ में न सिर्फ नागरिकों को बल्कि राज्य सरकार से भी गुहार लगायी। “पतंग फेस्टिवल के समय मांझे में उलझकर बहुत से पक्षियों की जान जाती थी। त्यौहार खत्म होने के बाद भी यह माझा पेड़ों पर अटका होता तो इससे भी पक्षियों को खतरा रहता था।”

He has lead various initiatives to conserve wildlife

“हमने लगभग एक-डेढ़ साल तक इस पर निरीक्षण किया और सैकड़ों पक्षियों को बचाया भी। इसके बाद हमने इस बारे में जागरूकता फैलानी शुरू की। साथ ही, राज्य सरकार से चायनीज मांझा बंद करने की अपील की। जब सरकार ने हमारी बात को समझकर इस पर बन लगाया तो बहुत ख़ुशी हुई थी,” प्रसन्ना ने गर्व से बताया।

जब उनसे पूछा गया कि क्या इस काम में रिस्क नहीं तो वह हंसते हुए कहते हैं कि रिस्क तो हर जगह है। वह दिन में जितने भी रेस्क्यू करते हैं, उन्हें हर कहीं खतरा होता है लेकिन उससे भी बड़ा खतरा है बायोडायवर्सिटी के ख़त्म होने का। अगर प्रकृति और प्रकृति के जीव ही नहीं होंगे तो इंसान कब तक जी पाएंगे। वह कहते हैं, “यह बात हमें पता है कि हम उन जानवरों के रेस्क्यू के लिए आए हैं लेकिन उन जानवरों को तो नहीं पता। जैसे हम उन्हें अपने लिए खतरा समझते हैं, वैसे ही हम उनके लिए खतरा हैं। बस यही टकराव है। जिस दिन हम इस टकराव की जगह एक बैलेंस बना लेंगे, उस दिन सही मायनों में कामयाब होंगे।”

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जानवरों के रेस्क्यू अभियानों के साथ-साथ प्रसन्ना खेती भी करते हैं। उन्होंने लगभग साढ़े चार एकड़ ज़मीन लीज पर ली हुई है और यहाँ वह प्राकृतिक खेती करते हैं। उनके खेत में ज्वार, मूंगफली, सूरजमुखी, और कई तरह की सब्ज़ियाँ उगती हैं। प्रसन्ना कहते हैं वह हमेशा से ही जैविक और प्राकृतिक तरीकों से खेती करते हैं।

“मुझे पता है केमिकल डालने से सभी कीट मर जाएंगे। लेकिन अगर कीट मर जाएंगे तो पक्षी क्या खायेंगे और अगर पक्षी नहीं होंगे तो दूसरी प्रजातियों का क्या होगा। इस तरह हमारी फ़ूड चेन गडबडा जाएगी। इसलिए यह हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि हम अपनी फ़ूड चेन को स्वस्थ तरीके से बनाए रखें। तभी हम स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।”

प्रसन्ना अपने जीवन में संतुष्ट हैं। उनके हिसाब से उन्हें इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए कि वह किसी की जान बचा पा रहे हैं। हर दिन वह रेस्क्यू ऑपरेशन पर जाते हैं। प्रसन्ना जिन भी जानवरों को रेस्क्यू करते हैं उन्हें इलाज के बाद जंगलों में छोड़ देते हैं। वह कहते हैं, “जानवरों का रेस्क्यू करना, उनका इलाज कराना और फिर उन्हें प्रकृति में छोड़ देना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है।”

अगर आप बेंगलुरु में रहते हैं तो किसी भी रेस्क्यू अभियान के लिए आप प्रसन्ना कुमार को 9902794711 पर कॉल कर सकते हैं!

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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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