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पिछले एक दशक से गौरेया को बचाने में जुटा है यह शख्स, शहर भर में लगाए 2000 घोंसले!

“अगर आपने आस-पास नियमित तौर पर पक्षी आपको दिख रहे हैं तो समझिए कि आप एक स्वस्थ वातावरण में रह रहे हैं और अगर नहीं तो यह चिंता का विषय है।”

क्या आपको याद है कि आपने आखिरी बार पक्षियों के चहचहाने की आवाज़ कब सुनी थी या फिर कब आखिरी बार आपने चिड़ियाँ देखी थी? शहर तो शहर, अजकल गांवों में भी घरेलू चिड़ियाँ नाममात्र रह गईं हैं और बहुत ही कम देखने को मिलती हैं। इसकी वजह स्पष्ट है- बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच हम इन पक्षियों को उनका घोंसला देना भूल गए हैं। शायद ही आपको किसी शहरी घर या फ्लैट में पक्षियों के लिए कोई घोंसला मिले और अगर कभी कोई पक्षी घोंसला बना भी ले तो हम उसे बाहर फेंकने में चंद पल नहीं लगाते।

लेकिन वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे लोग हैं जो उन पक्षियों को वापस लाने की जद्दोज़हद में लगे हुए हैं। इन लोगों ने न सिर्फ अपने घर में बल्कि पूरे शहर में गौरेया को वापस लाने के लिए अभियान छेड़ा हुआ है। द बेटर इंडिया पहले भी आपको गौरेया संरक्षण से जुड़े नायकों की कहानी से रू-ब-रू करवा चुका है। आज फिर हम आपको ऐसे ही एक और नायक से परिचित कराने जा रहे हैं, जो खुद तो पक्षी संरक्षण कर ही रहे हैं। साथ ही, दूसरों को भी सिखा रहे हैं कि वे कैसे गौरेया को अपने आस-पास और घरों में वापस ला सकते हैं।

Sparrow Conservation
N. Dhanasekar is rescuing and conserving sparrows

कोयम्बटूर में रहने वाले 39 वर्षीय एन. धनाशेखर को बचपन से ही पक्षियों से प्यार रहा। उनकी माँ और दादी जब कभी घर के आँगन में बैठकर सूप से गेहूं, चावल या बाजरा आदि साफ़ करतीं तो उनमें से कुछ दाने नीचे ही गिर जाते, जिन्हें चिड़ियाँ आकर चुगा करतीं थीं। बहुत बार तो दादी छत पर खासतौर से उनके लिए दाना-पानी रखने जाती।

वह बताते हैं, “आज की तरह पहले की जतन नहीं करने पड़ते थे गौरेया को घर बुलाने के लिए बल्कि हर घर के किसी न किसी कोने में आपको उनका एक घोंसला तो दिख ही जाता था। पहले की पीढियां अपने साथ-साथ प्रकृति का भी ख्याल रखती थी लेकिन वक़्त के साथ यह सब कहीं खो गया।”

शुरू किया ट्रस्ट:

अपने बचपन के दोस्तों को फिर से वापस लाने के लिए धनाशेखर ने साल 2014 में चित्तूकुरुविगल अरकत्तालाई ट्रस्ट की नींव रखी। वैसे तो वह अपने स्तर पर साल 2010 से इस बारे में काम कर रहे हैं। लेकिन अपने अभियान को बड़ा रूप देने और ज्यादा से ज्यादा लोगों से जुड़ने के लिए उन्होंने 2014 में यह ट्रस्ट शुरू किया।

Sparrow Conservation
He is placing nest boxes in different locations of the city

इस ट्रस्ट के ज़रिए स्कूल, कॉलेज और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में जागरूकता अभियान, सेमिनार और वर्कशॉप करने के साथ-साथ उन्होंने शहरभर में चिड़ियाँ घोंसले भी लगवाना शुरू किया। उन्होंने एक बार में 200 घोंसलों से शुरुआत की। इसके साथ ही, लोगों को समझाया कि जितनी जीवों को हमारी ज़रूरत है, उतनी है हमें उनकी ज़रूरत है।

अगर इसी तरह प्राकृतिक जीव-जंतु खत्म होते रहे तो इको-सिस्टम बिल्कुल बिगड़ जाएगा। वह कहते हैं कि लोगों की बदलती जीवन शैली ने प्रकृति में पहले ही बहुत से बदलाव किए हैं जैसे कि रासायनिक खेती की वजह से जीवों के लिए पोषक खाद्यान्न नहीं बचे हैं। धरती को हमने प्लास्टिक से भर दिया है, जिसका खामियाजा सबसे ज्यादा इन मासूम, बेजुबान जीवों को भरना पड़ रहा है। इसके अलावा, हमारे घर सिवाय सीमेंट की इमारतों के और कुछ भी नहीं।

धनाशेखर और उनकी टीम ने मिलकर पूरे शहर में लगभग 2000 घोंसले लगाये हैं। ये घोंसले ताड़ की लकड़ी के बने हुए हैं और इन्हें अलग-अलग इलाकों में लगाया गया है। वह कहते हैं कि बहुत से लोग गत्ते/कार्डबोर्ड के बने घोंसले भी लगाते हैं, लेकिन बारिश के समय में इनका बचाव करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए उन्होंने लकड़ी के घोंसले लगाने का फैसला लिया।

Spreading Awareness

“इन घोंसलों को आप अपने घर में या फिर सार्वजानिक जगहों पर लगा सकते हैं। घोंसले को इस हिसाब से बनाया गया है कि यह चिड़ियाँ के लिए सुरक्षित और सहज रहे। एक तरफ से इसमें लगभग डेढ़ इंच का छेद रखा गया है ताकि चिड़ियाँ आसानी से घुस और निकल पाएं। साथ ही, दूसरे शिकारी पक्षी जैसे कौआ के लिए यह छेद बहुत छोटा है तो चिड़ियाँ उनसे भी सुरक्षित रहेंगी,” उन्होंने आगे कहा।

धनाशेखर के अभियानों में उनकी पत्नी और दो छोटी-छोटी बेटियाँ उनका पूरा सहयोग करती हैं। वह बताते हैं कि उनकी बेटियां चिड़ियाँ और अन्य जीव-जन्तुओं के प्रति काफी जागरूक हैं।

कैसे वापस ला सकते हैं गौरेया:

“यह कोई साइंटिफिक तकनीक नहीं है कि आप करें और दो दिन में आपको घर में चिड़ियाँ दिखने लगेंगी। इस प्रक्रिया में काफी समय लगता है क्योंकि प्रकृति को ढलने के लिए वक़्त चाहिए। इसके लिए, सबसे पहले आपको प्रकृति के प्रति जागरूक ही नहीं समर्पित भी होना होगा,” उन्होंने आगे कहा।

Sparrow Conservation
How to bring back sparrows

कुछ टिप्स जिन्हें नियमित तौर पर हमें फॉलो करना चाहिए:

1. सबसे पहले अपने दिन के शेड्यूल में से कम से कम 20 मिनट अपने लिए निकालिए। अपने फ़ोन, टैब, टीवी, लैपटॉप- सभी कुछ को छोड़कर अपने घर की बालकनी, छत या फिर आँगन में जाइये और अपने आस-पास की प्रकृति को जानने-समझने की कोशिश कीजिये।

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2. अपने घर का मुआयना करें और ऐसी जगह पर पक्षियों के लिए दाना रखें, जहां से उनका आना-जाना आसान हो। घर की छत पर या फिर बालकनी में फीडर ज़रूर लटकाएं। आप पुरानी प्लास्टिक की बोतलों से भी यह फीडर बना सकते हैं।

3. दाने के साथ-साथ पक्षियों के लिए पानी भी रखें। धनाशेखर कहते हैं, “गर्मियों में हम इंसान बिना पानी के नहीं रह सकते तो जरा, इन पक्षियों के बारे में सोचिये। उन मासूमों के लिए पानी मिलना कितना ज़रूरी है। इसलिए हमेशा अपनी छत या बालकनी में पानी भरकर रखें और नियमित रूप से इसे बदलते रहें।”

Put Nest Boxes and Bird Feeders for Birds

4. अगर आप चाहें तो अपने घर की किसी बाहरी दीवार पर चिड़ियाँ के लिए घोंसला भी लगा सकते हैं। आप घोंसला बाज़ार से खरीद सकते हैं या फिर किसी कार्डबोर्ड के डिब्बे को घर पर ही घोंसले का रूप देकर इसे लटका सकते हैं। कार्डबोर्ड से घोसला बनाना बहुत ही आसान है।

5. हो सकता है कि कई हफ्तों तक आपके घर कोई पक्षी न आए लेकिन इससे आपको निराश नहीं होना है क्योंकि इसमें वक़्त लगेगा। लेकिन जब एक बार पक्षी आपके यहाँ आने लगेंगे तो उन्हें आपके घर की आदत हो जाएगी।

6. इसके अलावा, आप अपने घर में थोड़े पेड़-पौधे भी लगाइए और सिर्फ घर में ही नहीं बल्कि आस-पड़ोस में भी आप पौधारोपण करते रहें और इनकी देखभाल करें।

धनाशेखर कहते हैं कि अगर आपके आस-पास नियमित तौर पर पक्षी आपको दिख रहे हैं तो समझिए कि आप एक स्वस्थ वातावरण में रह रहे हैं और अगर नहीं तो यह चिंता का विषय है। उनके प्रयासों से आज बहुत से लोग अपने घरों में इस प्रक्रिया को कर रहे हैं। बहुत से लोग उन्हें अपने यहाँ आने वाली चिड़ियाँ की तस्वीरें भेजते है। स्कूल के छात्र-छात्राएं, जिनकी वह वर्कशॉप करते हैं, उनसे अक्सर सवाल करते रहते हैं।

Sparrow Conservation

“मेरे लिए यही सबसे बड़ा ईनाम है कि लोग खुद मुझे चिड़ियाँ के दाना चुगने की तस्वीरें भेजते हैं। हफ्ते में दो बार मैं लोगों से सवाल-जवाब के सेशन करता हूँ। अच्छा लगता है यह जानकर कि लोग चिड़ियाँ और उनकी प्रजातियों के बारे में जानना चाहते हैं,” उन्होंने कहा।

लोगों की जिज्ञासा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने ट्रस्ट से एक मैगज़ीन भी शुरू की है। जिसके हर एक एडिशन में वह लुप्त हो रहीं अलग-अलग चिड़ियाँ की प्रजातियों के बारे में लिखते हैं। इस मैगज़ीन में पर्यावरणविदों और छात्र-छात्राओं द्वारा लिखे हुए लेख भी होते हैं। आप इस मैगज़ीन को इंग्लिश और तमिल में पढ़ सकते हैं।

धनाशेखर कहते हैं कि कोई भी उनसे चिड़ियाँ से संबंधित प्रश्न पूछ सकता है। अपना प्रश्न पोस्ट करने के लिए यहाँ क्लिक करें!

अगर आप और अधिक जानकारी चाहते हैं तो उन्हें chittukuruvigaltrust@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं!

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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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