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लॉकडाउन में मसीहा बने यूपी के आईएएस, सूखी नदी को किया ज़िंदा, 800 लोगों को मिला रोज़गार!

लॉकडाउन में मसीहा बने यूपी के आईएएस, सूखी नदी को किया ज़िंदा, 800 लोगों को मिला रोज़गार!

देश और दुनिया में कोविड-19 के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। मामलों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा की थी जिसका असर सबसे ज़्यादा दिहाड़ी मज़दूरों पर पड़ा। मज़दूरों के लिए इस कठिन समय को एक आईएएस ऑफिसर ने वरदान में बदल दिया और साथ ही वह गाँव की दो प्रमुख समस्याओं का हल निकालने में कामयाब रहे।

शायद ही किसी को इस बात का अंदाजा रहा होगा कि कोरोना महामारी इतना विकराल रूप ले लेगी और अपना देश हफ़्तों तक लॉकडाउन में रहेगा। जब लॉकडाउन लगा तो अपने घर से दूर फँसे लोगों की छटपटाहट पूरी दुनिया ने देखी थी। लेकिन आज की कहानी जिस शख्स की है वह उन भाग्यशाली लोगों में से एक थे जो मार्च में पूरे देश के लॉकडाउन की घोषणा किए जाने से ठीक पहले अपने घर पहुंच गए थे।

35 वर्षीय नाथू, उत्तर प्रदेश में बाराबंकी जिले के मवैया गाँव के निवासी हैं। वह लखनऊ में काम करते थे लेकिन फिर इस कठिन परिस्थिति में उनका काम बंद हो गया।

नाथू के गाँव में ही एक अन्य दिहाड़ी मजदूर, मनोज भी लॉकडाउन के कारण वहीं फंसे हुए थे और उनके पास किसी भी तरह का कोई काम नहीं था।

ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ मनोज और नाथू ही थे जिनके पास काम नहीं था बल्कि गांव में कई और भी लोग ऐसे थे जिनके पास लॉकडाउन के चलते कोई भी काम नहीं था। भूखे-प्यासे संघर्ष करते लोग कठिन समय का समना कर रहे थे। लेकिन जिलाधिकारी डॉ आदर्श सिंह ने इसे एक अवसर के रूप में बदल दिया। उन्होंने सूखी हुई नदी को पुनर्जीवित करने का एक प्रॉजेक्ट शुरू किया। इस प्रॉजेक्ट के ज़रिए गांव के करीब 800 ग्रामीणों को रोज़गार मिला जिनकी या तो नौकरी चली गई थी या वैश्विक महामारी के कारण आजीविका प्रभावित हुई थी।


नदी को पुनर्जीवित करने का काम, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) स्कीम के तहत हुआ है और इस पहले चरण के लिए 59 लाख रुपये से अधिक का बजट स्वीकृत किया गया।

प्रॉजेक्ट को खंडों में विभाजित किया गया है – मवैया में एक 2.6 किमी का हिस्सा, जिसे पुनर्जीवित किया गया है और पड़ोसी गाँव हैदरगढ़ में 1.5 किलोमीटर का हिस्सा, जहाँ अभी भी काम चल रहा है।

जिस कल्याणी नदी के लिए ये सभी कार्य कर रहे थे वह नदी कभी किसानों के लिए सिंचाई का स्रोत हुआ करती थी, लेकिन गाद जमा होने के कारण वह सूख गई। पिछले साल, जिला प्रशासन ने नदी को साफ करने के लिए योजना शुरू की थी लेकिन जनशक्ति की कमी के कारण इसे रोक दिया गया था।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए जिलाधिकारी डॉ. आदर्श सिंह ने बताया कि, “लॉकडाउन एक तरह से हमारे लिए वरदान की तरह साबित हुआ। जब हमने दिहाड़ी मज़दूरों की दुर्दशा के बारे में जाना और देखा कि कैसे उनकी आजीविका खतरे में थी, हमने उन्हें इस काम में शामिल कर दो समस्याओं को हल करने के बारे में सोचा। ”

60 दिनों में नदी हुई फिर जिंदा

IAS
कल्याणी नदी पहले(ऊपर), कल्याणी नदी बाद में (नीचे)

इस काम को पूरा करने के लिए, आईएएस अधिकारी, डिप्टी कमिश्नर, मनरेगा-बाराबंकी, एनडी द्विवेदी और ब्लॉक डेवलप्मेंट ऑफिसर हेमंत कुमार यादव ने कई उपाय अपनाए। ग्रमीणों को जागरूक किया गया, नदी किनारे अतिक्रमणों को खत्म किया गया, कचरा की डंपिंग बंद की गयी और खुले में शौच करने से रोका गया।

आधिकारिक तौर पर मवैया सफाई में 500 और हैदरगढ़ में 300 श्रमिकों को पंजीकृत करने के बाद, अधिकारियों ने श्रमिकों को प्रक्रिया के बारे में निर्देश दिए।

यादव ने द बेटर इंडिया से बात करते हुए कहा, “एक चीज़ जो इस प्रॉजेक्ट को ख़ास बनाती है वह है काम करने का उत्साह। यह प्रॉजेक्ट कई ग्रामीणों के लिए आशा की किरण के रूप में आया था जो संघर्ष कर रहे थे। एक और कारण यह था कि यदि सूखी हुई नदी फिर ज़िंदा हो जाती है तो इससे लाभ उन्हें ही मिलेगा। इस प्रॉजेक्ट का उदेश्य पानी का संरक्षण और भूजल को रिचार्ज करना है।”

अगला कदम नदी के नज़दीक हुए अतिक्रमणों को हटाना था। इस काम को आसान बनाने के लिए पुलिस और राजस्व विभाग ने मदद की। जिलाधिकारी डॉ. आदर्श सिंह ने लोगों को नदी में खुले में शौच करने और कचरे को डंप करने से होने वाले नुकसान के बारे में भी जागरूक किया। डॉ. सिंह कहते हैं कि लोगों के सहयोग प्राप्त करना मुश्किल नहीं था क्योंकि उन्हें बताया कि नदी का पानी खेती में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

काम के दौरान दिहाड़ी मज़दूरों ने जमी गाद को हटाया, नदी को 1.5 मीटर गहरा खोदा और वर्षा जल को संग्रहित करने के लिए इसे 25 मीटर चौड़ा किया। उन्होंने जलग्रहण क्षेत्र की मरम्मत भी की। मवैया में इस काम को पूरा करने में 60 दिनों का समय लगा। वहीं हैदरगढ़ में काम अब भी चल रहा है। डॉ. सिंह के अनुसार,  यह 30 जून तक पूरा हो जाना चाहिए।

डॉ सिंह आगे बताते हैं कि प्रॉजेक्ट का पहला चरण काफी सफल रहा है और वह इसे अन्य गाँवों तक बढ़ाने की योजना बना रहे हैं (कल्याणी नदी 170 किलोमीटर लंबी है)। वह कहते हैं कि उनके पास अब ज़रूरी जनशक्ति है और इस प्रॉजेक्ट के बाद उन्हें कौशल और अन्य जानकारी भी मिल गई है। उन्हें उम्मीद है कि मानसून के बाद वह अन्य गाँवों में इस मॉडल को लागू करेंगे।

भारत कई हफ़्तों तक लॉकडाउन में रहा है और इस कारण कई लोगों की नौकरियां हुई हैं। कोविड-19 मामले लगातार बढ़ रहे हैं, जिससे भविष्य के लिए अनिश्चितता बनी हुई है। तो ऐसे में हमें देखना और समझना चाहिए कि इस समय और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है। सिंह जैसे अधिकारी कई लोगों के लिए प्रेरणा हैं।

मूल लेख-

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पूजा दास

पूजा दास पिछले दस वर्षों से मीडिया से जुड़ी हैं। स्वास्थ्य और फैशन से जुड़े मुद्दों पर नियमित तौर पर लिखती रही हैं। पूजा ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से मास्टर्स किया है और नेकवर्क 18 के हिंदी चैनल, आईबीएन7, प्रज्ञा टीवी, इंडियास्पेंड.कॉम में सक्रिय योगदान दिया है। लेखन के अलावा पूजा की दिलचस्पी यात्रा करने और खाना बनाने में है।
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