अपनी फ्रूट कंपनी की मदद से बागवानों को उनके सेब का उचित दाम दिलवा रहे हैं 18 वर्षीय नैतिक!

सेब की खरीद-फरोख्त के काम को बड़ा ही जोखिम भरा और पेचीदा माना जाता है, इसलिए इस काम में बहुत ही कम लोग लंबे समय तक टिक पाते हैं। चूँकि इस काम में बागवानों की पूरे सालभर की मेहनत की आमदनी दाँव पर लगी होती है, इसलिए सभी बागवान अपने सेबों को किसी नामी और अनुभवी आढ़ती के पास ही बेचने के लिए ले जाते हैं, जो उन्हें उनके सेबों का अच्छा दाम दिला सकें। ऐसे ही सेब आढ़ती के काम में हिमाचल प्रदेश में रोहडू क्षेत्र के खलावन गाँव के 18 साल के नैतिक सुंटा ने महारत पा रखी है। जो भी बागवान एक बार इनके पास अपने सेब बेचने के लिए आता है, वह दोबारा किसी और के पास नहीं जाता है। यही कारण है कि नैतिक सुंटा अपनी सुंटा फ्रूट कंपनी के माध्यम से हर साल लगभग 30 हजार बागवानों के सेब को बेचकर 6 करोड़ का कारोबार कर रहे हैं।

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नैतिक सुंटा

हिमाचल प्रदेश में हर साल लगभग 4 हजार करोड़ रूपये का सेब देश-विदेश में जाता है और हर साल हजारों ऐसे बागवान होते हैं जो बाहर से आए व्यापारियों के झांसे में आकर लाखों रूपये की ठगी का शिकार हो जाते हैं। लेकिन महज 14 साल की छोटी सी उम्र से सेब आढ़त का काम देख रहे नैतिक सुंटा ने अपने किसी भी बागवान के साथ न ही ठगी होने दी है और न ही सेब बागवानों के लिए घाटे का सौदा किया।

जब नैतिक के पिता सेब आढ़त का काम संभालते थे तब उन्हें गाँव-गाँव जाकर बागवानों को अपना सेब उनके पास बेचने के लिए मनाना पड़ता था, लेकिन जब से नैतिक ने सेब का कारोबार संभाला है तब से स्थिति बिल्कुल ही बदल गई है। बागवान खुद ही अपने मुनाफे को ध्यान में रखते हुए नैतिक की कंपनी में आते हैं और अपना सेब बेचने के लिए छोड़ जाते हैं।

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नैतिक महज 14 साल की उम्र से अपनी सुंटा फ्रूट कंपनी का काम संभाल रहे हैं।

12 साल की उम्र में दसवीं की परीक्षा पास करने और 18 साल की उम्र में ग्रेजुएशन करने वाले नैतिक सूंटा पिछले चार सालों से पिता की फ्रूट कंपनी का पूरी तरह से संभाल रहे हैं। नैतिक सुंटा ने द बेटर इंडिया को बताया, “जब मैं 10 साल का था तब पहली बार पिता के साथ सेब मंडी में आया था और पहले ही दिन पिता को व्यापार करते देख इसमें रूचि बन गई थी। क्योंकि मेरा स्कूल दोपहर 1 बजे से शुरू होता था और मंडी सुबह 10 बजे खुलती थी, मैं अपने पिता के साथ सेब मंडी में आ जाया करता था और सेब आढ़ती का काम सीखा करता था। इसके बाद जब मैं लगातार मंडी में आता रहा तो सारा काम सीख गया और जब 14 साल का हुआ तो मेरे पिता ने मुझे अपनी कंपनी का पूरा काम सौंप दिया, तब से मैं ही सेब मंडी में सेब कारोबार कर रहा हूँ।“

नैतिक सूंटा बताते हैं कि पिछले वर्ष उन्होंने 50 हजार सेब पेटियों को बेचकर छह करोड़ रूपये का कारोबार किया था। वह बताते हैं कि सेब का कारोबार करने के बाद उन्होंने सरकार के पास टैक्स के रूप में साढ़े पांच लाख रूपये जमा करवाए हैं।

करीब 30 हजार बागवान करते हैं नैतिक पर विश्वास

नैतिक बताते हैं कि उनके पास शिमला, किन्नौर और लाहौल-स्पीति जिले से लगभग 30 हजार से भी अधिक किसान सेब बेचने के लिए आते हैं। वह कहते हैं, “बाहरी राज्यों से आने वाले सेब खरीददार भोले-भाले बागवानों के सेब को बाद में पैसे देने के नाम पर ले जाते हैं और इसके बाद वापस हीं लौटते हैं, ऐसे लोगों से बागवानों को बचाने के लिए मैं किसानों में जागरूकता का काम करता हूँ ताकि बागवान ठगी से बच सकें।”

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सेब बेचने वाले बागवानों के साथ नैतिक

बागवानों को एक सप्ताह में देतें हैं पेमेंट

सेब बागवानों को सेब बाजार तक पहुंचाने तक साल भर मेहनत करनी पड़ती है और इसके लिए उन्हें बहुत पैसा खर्च करने के साथ कई बार कर्ज भी लेना पड़ जाता है। इसलिए बागवानों को समय पर पैसा मिल जाए, इसके लिए वह एक सप्ताह के भीतर बागवानों को सेब के बदले में पेमेंट कर देते हैं, ताकि उन्हें दिक्कतों का सामना न करना पडे़।

क्या कहते हैं नैतिक की कंपनी को सेब बेचने वाले बागवान

सुंटा फ्रूट कंपनी के माध्यम से अपने सेब को बचने वाले रोहडू के बागवान गीता राम बताते हैं, “जब से नैतिक ने आढ़त का काम संभाला है तब से उन्हें सेब के अच्छे दाम मिल रहे हैं। उसे सेब की सही परख है और मार्केट में भी सही पकड़ है। बाहरी राज्यों से आए खरीददारों के साथ अच्छे संबंध होने के चलते अब मुझे अपने सेब के लिए पहले से अधिक दाम मिल रहे हैं।”

इनके अलावा टिक्कर क्षेत्र के अन्य बागवान, भागचंद रांटा ने बताया, “मेरी पास करीब 4000 सेब की पेटियाँ होती हैं और मैं हमेशा इन्हें नैतिक के पास ही बेचने के लिए आता हूँ। नैतिक के साथ काम करने का एक फायदा यह है कि एक तो दाम सही मिलता है दूसरा पैसा समय पर मिल जाता है। जिससे सभी प्रकार की देनदारियाँ समय पर निपट जाती हैं।

बागवान सुरेंद्र चैहान नैतिक जन संपर्क की तारीफ करते हुए कहते हैं, “कई बार सेब में सही रंग या सही साइज न होने की वजह से बाजार में कहीं भी भाव नहीं मिलता है ऐसे में नैतिक का फ्रूट प्रोसेसिंग से जुडी कंपनियों के साथ संपर्क काम आता है। वह सेब जिसे कोई खरीददार नहीं मिलता उसे भी जूस बनाने वाली या फ्रूट प्रोसेसिंग से जुड़ी कंपनियों को बेच दिया जाता है ताकि बागवानों को उनकी उपज का कुछ न कुछ तो मिल जाए।“

अकेले 40 बीघे का बगीचा भी संभाल रहे  नैतिक  

नैतिक सुंटा बताते हैं कि उनका एक सेब का 40 बीघे का पुश्तैनी बगीचा है। इस बगीचे में कटिंग से लेकर सेब से संबधित सभी कार्यों को नैतिक खुद ही देखते हैं और इस काम में उनके घरवाले भी उनकी मदद करते हैं। उन्होंने बताया कि उनके बगीचे में हर साल लगभग 4 से 5 हजार पेटी सेब होता है। इसलिए सेब के बगीचे की ओर भी वह विशेष ध्यान देते हैं।

अपने सेब के बाग़ में काम करते नैतिक।

बेहतर आईक्यू के लिए राज्यपाल और मुख्यमंत्री कर चुके हैं सम्मानित

नैतिक के तेज दिमाग को देखते हुए प्रदेश सरकार ने उन्हें तीन बार एक साथ दो कक्षाओं की परीक्षाएं देने का मौका भी दिया था। मात्र सात वर्ष में उन्होंने पांचवीं पास की। इसके बाद 10 वर्ष में 8वीं पास कर सबको चौंका दिया था। इसके अलावा उन्हें पूर्व राज्यपाल आचार्य देवव्रत, पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह व अन्य कई मंत्रियों द्वारा भी अवार्ड्स मिल चुके हैं। वहीं कई संस्थाएं भी नैतिक को सेब के कुशल कारोबार के लिए सम्मानित कर चुकी हैं।

नैतिक को पुरस्कृत करते हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह

निष्टा फाउंडेशन से जुड़े नैतिक अक्षम लोगों की भी कर रहे मदद

नैतिक अपने पिता द्वारा चलाये जा रहे एनजीओ ‘निष्टा फाउंडेशन’ के तहत अक्षम लोगों की भी भरसक मदद कर रहे हैं। वह यूपीएससी की परीक्षा पास कर सिविल सर्विस में जाना चाहते हैं।नैतिक का कहना है कि वह समाज में कमज़ोर तबके लोगों को ऊपर उठाने के लिए सिविल सर्वेंट बनना चाहते हैं। वह बताते हैं कि इसके लिए उन्होंने तैयारियाँ शुरू कर दी हैं और जब सेब मंडी में कारोबार नहीं होता है उस समय यूपीएससी की कोचिंग लेते हैं।

बागवानों की मेहनत का उचित दाम लगाकर उन्हें समय पर पैसा दिलाने के काम में जुटे नैतिक की फ्रूट कंपनी के साथ यदि आप व्यापार करना चाहते हैं या अक्षमों की सेवा के लिए किसी प्रकार का सहयोग करना चाहते हैं तो आप उन्हें 8219530991 नंबर पर संपर्क कर सकते हैं।

संपादन- पार्थ निगम

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पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, सक्सेस स्टोरी, यात्रा वृतांत और जलवायु परिवर्तन व पर्यावरण के बारे में लिखने के शौकिन रोहित पराशर हिमाचल से हैं। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से मास्टर इन मास कम्यूनिकेशन करने के बाद पिछले एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुडे़ हुए हैं। देश के प्रतिष्ठित समाचारपत्र दैनिक भास्कर और पर्यावरण के क्षेत्र की बेहतरिन मैग्जीन डाउन टू अर्थ में सक्रीय रूप से लिखते हैं। लोगों से उनके अनुभवों के बारे में बाते करने का शौक रखते हैं और पहाड़ों से खासा लगाव रखते हैं।
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