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मुंबई वालों के पसंदीदा फूलों की खेती कर बन गए लखपति, अब दूसरे किसानों को दे रहे प्रेरणा!

“जब मैंने मोगरा विक्रताओं को सोनचाफा के बारे में बताया, तो इससे पहले न तो उन्होंने इसके बारे में सुना था और न ही ऐसा कोई फूल देखा था। इसलिए मैं मुफ़्त में ही कई हफ़्तों तक उन्हें यह फूल देता रहा।” – रॉबर्ट डीब्रिटो

सोनचाफा, मुंबई में रहने वाले बहुत से लोगों का पसंदीदा फूल है। वे नियमित पूजा पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में सोनचाफा के फूल ही देवी देवताओं को चढ़ाते हैं। आम दिनों में दादर के फूल बाजार में 100 रुपये में 100 फूल मिल जाते हैं, लेकिन 11 दिनों के गणेशोत्सव के दौरान इनकी कीमत 700 रूपए तक हो जाती है। शादियों के मौसम और नवरात्रि त्यौहार के दौरान भी इस फूल की कीमत आसमान छूती है।

यह 64 वर्षीय रॉबर्ट डीब्रिटो की ही देन है कि आज पूरा मुंबई शहर इस मादक खूशबू वाले सुनहरे पीले फूल को जानता है। रॉबर्ट की ज़िंदगी भी इतनी आसान नहीं थी। उन्होनें अपने पिता की बीमारी के चलते पॉलिटेक्निक की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी। कई दूसरे लोगों की तरह वह भी दशकों से मोगरा की खेती कर रहे थे।

रॉबर्ट डी’ब्रिटो

 डीब्रिटो ने बताया कि “1998-99 में मोगरा की फसल में कीट की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई, तब मैंने सोनचाफा के बारे में अध्ययन करने के बाद इसकी तरफ रूख किया। दो दशक पहले तक मोगरा (Jasminum sambac) ही भक्तों की पहली पसंद थी। चाहे सिद्धि विनायक मंदिर हो या लालबाग के राजा, हर जगह लोग यही फूल अपने देवता को चढ़ाते थे।

लेकिन अब ग्यारह पंखुड़ियों वाला गहरे पीले रंग का सोनचाफा बहुत पॉपुलर है जिसे मुंबई के लोग मैगनोलिया चंपक कहते हैं।

सोनचाफा

सोनचाफा के पौधे की तलाश में डीब्रिटो, कुडल स्थित वेलांकर नर्सरी पहुँचे, जहाँ से इसके 225 पौधे खरीदे और इन्हें वसई तालुका के सताले गाँव में 30-गुंठा जमीन (30,000 वर्ग फुट के बराबर) में रोपा।

सोनचाफा की लताएँ 8-10 फीट तक चढ़ती हैं। इसमें हरे रंग के फूल खिलते हैं जो बाद में चलकर पीले हो जाते हैं। ये फूल काफी खूशबूदार होते हैं। तोड़ने के बाद भी फूल लंबे समय तक ताजे रहते हैं और पानी में रखने के बाद कई दिनों तक उनकी खूशबू बरकरार रहती है। शुरू में तो सोनचाफा आम पौधों की तरह बढ़ता है लेकिन 5-6 फीट बढ़ने के बाद लताएँ लगनी शुरू हो जाती हैं। इसे उगाने में पानी की कम जरूरत पड़ती है मतलब चार दिन में एक बार ही पानी देना पर्याप्त है।

डीब्रिटो बताते हैं,  “जब मैंने मोगरा विक्रताओं को सोनचाफा के बारे में बताया, तो इससे पहले न तो उन्होंने इसके बारे में सुना था और न ही ऐसा कोई फूल देखा था। इसलिए मैं मुफ़्त में ही कई हफ़्तों तक उन्हें यह फूल देता रहा। फूल विक्रताओं से अक्सर मैं तमिल में बात करता हूँ। अन्य फूलों की अपेक्षा जब उन्हें इसके कई दिनों तक टिके रहने वाले सुगंध के बारे में पता चला तो इसकी माँग बढ़ गई।

नए फूल की लोकप्रियता को देखते हुए पड़ोसी गाँवों के किसानों ने मोगरा की जगह सोनचाफा की खेती करनी शुरू कर दी।

वर्तमान में वसई और विरार में करीब 500 परिवार डीब्रिटो की देखरेख में सोनचाफा की खेती करते हैं। डीब्रिटो को 2012 में वसंतराव नाइक कृषि पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। इस पुरस्कार का नाम महाराष्ट्र के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मुख्यमंत्री के नाम पर रखा गया, जिसमें नई तकनीकों के उपयोग से अधिक उत्पादन करने वाले किसानों को 25,000 रुपये के नकद पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।

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दादर के फूल बाज़ार में फूल बेचने के लिए तैयार करते रॉबर्ट

डीब्रिटो के दिन की शुरूआत फूल तोड़ने से होती है। वह कहते हैं,  “सुगंधित बगीचे में अपना दिन शुरू करने से मुझे एक सुखद एहसास और अनमोल अनुभव मिलता है।

सोनचाफा के फूलों को 100 के बैच में पॉली बैग में पैक करके मुंबई भेजा जाता है। डीब्रिटो के बागीचे से रोजाना औसतन 10,000-11,000 फूल तोड़े जाते हैं और एक ही बैग का इस्तेमाल कई बार किया जाता है।

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डीब्रिटो कहते हैं, ‘सोनचाफा में पूरे साल फूल लगते हैं और मार्च से लेकर अक्टूबर तक हर पौधे में 150 से 200 फूल लगते हैं। ठंड के महीनों में थोड़े कम फूल लगते हैं। हालाँकि यदि पौधों की लताओं को चौड़ाई में फैलने की जगह हो तो फूलों की संख्या बढ़ाना आसान है, इससे फूलों को तोड़ने में भी आसानी रहती है। मैं पौधों को उगाने के लिए गाय के गोबर के पाउडर का इस्तेमाल करता हूँ।

वर्कर सुबह 9.09 बजे विरार से चर्चगेट वाली लोकल पकड़कर सुबह 10.45 तक दादर फूल मार्केट तक पहुँचते हैं। डीब्रिटो बताते हैं कि वह इस फूल से महीने में करीब 75,000 रुपये कमाते हैं और सारे खर्चों के बाद लगभग 9 लाख रुपये सालाना की बचत होती है।

COVID-19 और उसके बाद के लॉकडाउन ने उन्हें कैसे प्रभावित किया?

लॉकडाउन के शुरुआती 15 दिनों तक डीब्रिटो को काफी नुकसान हुआ क्योंकि फूल मार्केट 58 किलोमीटर दूर था और फूलों को बाजार तक ले जाने के लिए परिवहन की व्यवस्था नहीं थी। इसका मतलब यह था कि फूलों को बिना तोड़े ही छोड़ देना।

लेकिन उन्होंने इसका एक समाधान खोज निकाला। वह बताते हैं, “जब तक शहर की लोकल ट्रेनें बंद थीं तब तक हम अपने वाहन से फूल ले जा रहे थे।

वर्तमान में, वसई तालुका में 25 से अधिक गाँवों जैसे जलोड़ी, अगाशी, नाला, राजौरी, नवापुर, मोटेकोरिया आदि में स्प्रिंकलर का इस्तेमाल करके सोनचाफा पौधों की सिंचाई की जा रही है।

65 वर्षीय सिल्वेस्टर एफ मिरांडा के अनुसार वसई तालुका सोनचाफा फ्लोरीकल्चर हब के रूप में उभरा है, जहाँ बाजार पास में होने के कारण सोनचाफा की खेती करने वालों की संख्या बढ़ी है। वह अदला गाँव में पार्ट टाइम किसानी करते हैं और उत्तन स्थित सेंट जोसेफ हाई स्कूल और जूनियर कॉलेज के पूर्व वाइस-प्रिंसिपल हैं।

जो लोग सोनचाफा की खेती करना चाहते हैं, उन्हें डीब्रिटो यह सलाह देते हैं,  इसे किसी भी मिट्टी में उगाया जा सकता है, जहाँ पानी जमा नहीं होता है। लेकिन इसे उगाने से पहले आपको आस-पास इसके बिक्री के लिए बाज़ार की तलाश करना जरूरी है और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि पौधों के फूल के लिए आपको दो साल तक इंतज़ार करना पड़ेगा।

मूल लेख- HIREN KUMAR BOSE

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Written by अनूप कुमार सिंह

अनूप कुमार सिंह पिछले 6 वर्षों से लेखन और अनुवाद के क्षेत्र से जुड़े हैं. स्वास्थ्य एवं लाइफस्टाइल से जुड़े मुद्दों पर ये नियमित रूप से लिखते रहें हैं. अनूप ने कानपुर विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य विषय में स्नातक किया है. लेखन के अलावा घूमने फिरने एवं टेक्नोलॉजी से जुड़ी नई जानकारियां हासिल करने में इन्हें दिलचस्पी है. आप इनसे anoopdreams@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

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