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पति थे बीमार, बेटे को भी खो चुकी थीं पर संघर्षों को चीरकर ऐसी लिखी अपनी दास्तान!

दादी का मानना है कि लड़कियों का पढ़ना और खुद के पैरों पर खड़ा होना बेहद ज़रूरी है। उन्हें स्कूटी से लेकर कार तक सबकुछ चलाना आना चाहिए ताकि वे किसी पर निर्भर न रहें।

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इंदौर को ‘मिनी मुम्बई’ भी कहा जाता है। जहाँ एक ओर यह मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी है वहीं इसे राज्य का एजुकेशन हब भी कहा जाता है। यहाँ कई महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान है, वहीं कई कोचिंग सेंटर भी इस शहर में हैं। इस वजह से यहाँ ढेर सारे हॉस्टल चलते हैं, जहाँ बाहर के बच्चे रहते हैं। ऐसा ही एक होस्टल है- गोकुल गर्ल्स होस्टल, जिसकी वार्डन हैं 75 वर्षीय कुसुम अग्रवाल, जो ‘दमदार दादी’ के नाम से मशहूर हैं।

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कुसुम अग्रवाल उर्फ़ दमदार दादी

इंदौर का गोकुल गर्ल्स होस्टल वैसे तो बहुत ही सामान्य सुविधा वाला हॉस्टल है, पर इसकी खास बात है इस हॉस्टल की वार्डन, यानी हमारी ‘दमदार दादी’। अपने दमखम के बल पर दादी न सिर्फ अपनी उम्र को चुनौती देती हैं, बल्कि उन सारी धारणाओं को भी तोड़ती हैं जो अक्सर वृद्ध महिलाओं के साथ जुड़ी होती हैं। जैसे – बुढ़ापे में शरीर कमज़ोर हो जाता है, ज़्यादा शारीरिक श्रम नहीं कर सकते, बड़े-बूढ़ों की सोच संकुचित होती है आदि। पर जैसे-जैसे आप इस ‘दमदार दादी’ के बारे में जानेंगे आपकी सारी धारणाएं अपने-आप टूटती जाएंगी और शायद आप भी ये सोचने पर मज़बूर होंगे कि क्या उम्र वाकई में बस एक अवधारणा है?

कड़क मिज़ाज वाली दादी

नौकरी के सिलसिले में मुझे वर्ष 2018 में इंदौर जाना पड़ा। वहाँ जब मैंने रहने के लिए गर्ल्स होस्टल की खोज शुरू की तो काफी सारे होस्टल देखने के बाद गोकुल गर्ल्स होस्टल में रहना तय किया, क्योंकि यह मेरे ऑफिस के नज़दीक था।

शुरूआत में तो मुझे दादी बिल्कुल पसंद नहीं आईं। क्योंकि दादी नियम-कायदों और समय की बेहद पाबंद थी। दादी की परमिशन और रजिस्टर में एंट्री किए बगैर कोई एक कदम भी बाहर नहीं रख सकता था। दादी के इस स्वभाव के कारण मैं समझती थी दादी उन तमाम महिलाओं की तरह ही हैं जो लड़कियों को नियंत्रण में रखना, बाहर जाने पर रोक-टोक करना और उनको घर की चाहरदीवारी में सिमट कर रखने में विश्वास करती हैं। लेकिन जैसे-जैसे दादी से संवाद शुरू हुआ, समझ में आया कि वास्तव में दादी की समझ और प्रवृत्ति मेरी सोच से विपरीत है। मैंने जाना कि दरअसल दादी महिलाओं के प्रति काफी प्रगतिशील रवैया रखती हैं और उनकी इस सख़्ती का असली मक़सद लड़कियों पर पाबंदी लगाना नहीं है।

दादी कहती हैं, “आम तौर पर सभी लड़कियाँ छोटे कस्बों से यहाँ आती हैं। वहाँ माता-पिता के नियंत्रण में रहती हैं। यहाँ आकर कोई उन्हें देखने-कहने वाला नहीं होता। शहर की चकाचौंध से इतनी  प्रभावित हो सकती हैं कि अपने लक्ष्य से उनके भटक जाने की सम्भावना होती है। इसलिए इन पर थोड़ी पाबंदी लगाना ज़रूरी है ताकि ये अपना समय और ऊर्जा अपने भविष्य को बनाने में लगाए।”

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पूरे हॉस्टल को पिछले कई सालों से चला रही हैं दादी।

प्रगतिशील दादी

दादी की हर बात, हर सोच में उनकी पोती गुड्डो की बात शामिल होती है। दादी अपने बेटे को खो चुकी हैं। इसके बावजूद वह हमेशा यही चाहती हैं कि गुड्डो किसी तरह अपने पैर पर खड़ी हो जाए। वह कहती हैं, “जब उसकी शादी होगी तो मैं उसे भेंट स्वरूप एक स्कूटी देना चाहती हूँ, ताकि उसे कभी किसी के ऊपर निर्भर नहीं रहना पड़े और वह अकेले सभी जगह आ-जा सके।”

गुड्डो अपनी माँ के साथ मथुरा में रहती है, पर दादी चाहती है कि वह इंदौर आए, स्मार्ट बने, टू-व्हीलर, फोर व्हीलर चलाना सीखे। शहर में मिलने वाले तरह-तरह के व्यंजन बनाना सीखे। दादी चाहती है कि गुड्डो हर चीज सीखे और तेज-तर्रार बने, दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर चले।

प्रबंधक दादी

दादी की जिस बात से मैं सबसे ज्यादा प्रभावित हुई वह है उनकी कार्य-कुशलता। अपने जीवन में मैंने अब तक किसी 75 वर्षीय महिला को इतना फिट और फुर्ती से काम करते नहीं देखा था। दादी ने केवल 8वीं तक पढ़ाई की है, लेकिन जिस कुशलता और प्रोफेशनल तरीके से वह काम करती हैं, उससे हर किसी को सीख लेनी चाहिए। मैं हमेशा सोचती हूँ कि यदि दादी ने उच्च शिक्षा प्राप्त की होती और कहीं किसी सरकारी दफ्तर में या किसी बड़ी कम्पनी में जॉब किया होता तो शायद आज कुछ और ही कहानी हमारे सामने होती।

दुनिया के बाज़ार में अपनी जगह बनाने और जमे रहने के लिए दादी ने नए तौर-तरीकों को सीखा और उन्हें अपनाया। पर क्या इस उम्र में यह सब करना इतना आसान रहा होगा? 60 साल के बाद अक्सर लोग अपने जीवन में एक ठहराव पाते हैं और अपने कंफर्ट जोन में ही रहना पसंद करते हैं। लेकिन दादी के जीवन का असली संघर्ष ही 60 साल के बाद शुरू हुआ। वह 15 साल पहले इंदौर आई और इस हॉस्टल की वार्डन बनीं।

 उदार दादी

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इंसान को उसकी उम्र नहीं बल्कि उसकी उदारता ही बड़ा बनाती है। इस लिहाज़ से दादी वाकई मेरे मन में ऊँचा स्थान रखती हैं। हॉस्टल में ज्यादातर टीन एज की लड़कियाँ रहती हैं। और इस उम्र में उन्हें थोड़ी भी रोक-टोक पसंद नहीं होती है। अक्सर दादी जब किसी लड़की को देर से आने और सूचना न देने के लिए डाँटती तो, कुछ लड़कियाँ दादी से काफी बदतमीज़ी से बात करती थीं। परंतु दादी उनके इस बुरे व्यवहार के बाद भी उनके साथ हमेशा स्नेहपूर्वक व्यवहार ही करती थी।

इस हॉस्टल में सिर्फ रहने की व्यवस्था है। खाने का प्रबन्ध खुद करना होता है। इसके लिए तकरीबन सभी लड़कियाँ आस पास के किसी टिफिन सेंटर से टिफिन मंगवाती है।

 दादी का स्नेह

ठंड के मौसम में मैंने दादी को बताया कि मुझे जैकेट खरीदना है परंतु ऑफिस में काम की अधिकता के कारण मैं खरीदने के लिए  बाज़ार नहीं जा पा रही हूँ। इसके कुछ दिन बाद दादी ने मुझे अपने रूम में बुलाया और अलमारी से निकालकर एक जैकेट देते हुए कहा कि उन्होंने ये उनकी पोती के लिए लिया था। पर वो इस साल नहीं आ रही है तो इसे मैं रख लूँ। “अलमारी में रखा हुआ यह किसी काम का नहीं है। तुम इसे पहनोगी तो मुझे लगेगा कि मेरी पोती ने इसे पहना है।” यह सुनकर मन में उनके प्रति असीम करुणा जागी, दादी को इस हॉस्टल संचालन के लिए सिर्फ उतने ही पैसे मिलते हैं जितने में उनका गुज़ारा चल सके। इसके बावजूद यह उदारता देखकर मैं दंग रह गई।

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रजिस्टर का पूरा ध्यान रखतीं हैं कुसुम।

चुस्त-दुरूस्त दादी

गोकुल गर्ल्स होस्टल तीन मंजिला इमारत है। जब भी कोई लड़की रूम देखने आती तो दादी तीन मंजिल ऊपर चढ़कर उन्हें होस्टल दिखाती हैं, चढ़ते-उतरते हुए वह हाँफती हैं पर हार नहीं मानतीं। कई बार ऐसा होता जब मैं ऑफिस से थक-हार कर आती और जैसे ही होस्टल के अंदर प्रवेश करती, दादी मुस्कुराते हुए स्वागत करतीं। उस दौरान उन्हें देखकर लगता कि ये इस उम्र में दिनभर काम करने के बाद भी इनके चेहरे पर थकान नहीं दिख रही है और हम नौजवान थक रहे हैं?

संघर्षरत दादी

जब मैंने दादी को बताया कि मैं उनके बारे लिख रही हूँ तो दादी ने कहा – “मेरे बारे में लिखने योग्य क्या है? मेरा पूरा जीवन संघर्ष है, और ऐसा संघर्ष तो कितनों का होगा, बल्कि कई लोग तो बहुत ही बुरी स्थिति में है। अगर आपको खुश रहना है तो उन लोगों को देखना चाहिए जो आपसे ज़्यादा बुरी स्थिति में है।”

दादी का पूरा जीवन वाकई में संघर्षों से भरा है। जब आठवीं मैं पढ़ती थी तब उनकी शादी हो गई। इस कारण आठवीं की परीक्षा भी न दे सकीं। खेलने-कूदने की उम्र में विवाह जैसी ज़िम्मेदारी उनके सिर पर आ पड़ी। एक बाल-मन में किस तरह की उधेड़बुन होती होगी तब? जिस उम्र में खुद को समझने की, दुनियादारी की सुध-बुध न हो, उस उम्र में विवाह के बंधन में बांध दिया गया। बस्ते का बोझ उठाने की उम्र में रिश्तों का बोझ संभालना पड़ा। शादी करके ससुराल में आगरा रहने लगीं, उसके बाद अपने पति के साथ आगरा से रतलाम फिर रतलाम से आकर मथुरा रहने लगीं। इस दौरान सन 1996 में पति को पैरालिसिस अटैक हुआ और कुछ वर्षों बाद बेटे की एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई। मथुरा में किसी परिचित के माध्यम से यह बुजुर्ग दम्पति इंदौर आए और यहाँ आकर हॉस्टल का ज़िम्मा संभाला। आज 15-16 साल से वह इसी होस्टल में ही रह रहे हैं।

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दादी व उनके पति

अपने जीवन के अनुभवों से दादी ने यह समझा कि लड़कियों का पढ़ना और खुद के पैरों पर खड़ा होना कितना ज़रूरी है। बातों ही बातों में कई बार दादी ने यह भी कहा कि यदि उन्होंने पढ़ाई की होती और अच्छी नौकरी की होती तो आज इस तरह जीना नहीं पड़ता। परंतु इन तमाम बाधाओं के बावजूद कुसुम अग्रवाल उर्फ ‘दमदार दादी’ अपने पैरों पर खड़ी हैं और जीवन की चुनौतियों को चुनौती दे रही हैं।

दादी एक महिला के धैर्य, संयम, संघर्ष, सहनशीलता, उदारता और साहस का परिचायक हैं और यही बात इन्हें खास बनाती है। दादी उम्र के अनुसार नहीं बल्कि परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालकर बढ़ती गईं। हर बार नए रूप में सामने आईं। दादी को देखकर लगता है कि बुढ़ापा इंसान को कमज़ोर नहीं, बल्कि बदलते दौर में खुद को बदलना सिखाता है।

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