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मन की आवाज़ सुन छोड़ी शहरी नौकरी, गाँव लौट बंजर ज़मीन में डाली जान!

नरेन्द्र क्षेत्र के युवाओं के लिए भी स्वरोजगार की नई इबारत लिख रहे हैं। उन्हें देख कई अन्य युवा जैविक खेती की ओर अग्रसर हुए हैं।

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गाँव में बंजर पड़ी जमीन पर अपनी मेहनत से जैविक फसल लहलहाने वाले उत्तराखंड के नरेंद्र कफोला ने स्वरोजगार की अनोखी मिसाल पेश की है। 17 साल पहले गाँव से पलायन करने वाले नरेंद्र दिल्ली जैसे शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी से आजिज आ गाँव लौटे तो फिर पलायन के चलते कंटीली झाड़ियों से ढक चुकी जमीन पर हरियाली लहरा गई। आज इस जमीन पर सब्जी और मसाला उत्पादन हो रहा है। नरेंद्र ने अपनी मेहनत से शुरुआत में सालाना करीब पौने दो लाख रुपए की बचत की और आज इससे कहीं अधिक कमा रहे हैं। क्षेत्र के युवाओं के लिए भी वह स्वरोजगार की नई इबारत लिख रहे हैं। उन्हें देख कई अन्य युवा जैविक खेती की ओर अग्रसर हुए हैं।

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अपने खेत में नरेन्द्र कफोला

ऑर्गेनिक इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल अपनाया 

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित नगरासू गाँव के नरेंद्र कफोला ने दिल्ली से गाँव की ओर रिवर्स माइग्रेशन करने के बाद जब भविष्य के बारे में सोचा तो उनके दिमाग में सबसे पहले खेती का ख्याल आया। लेकिन वह गाँवों में हो रही परंपरागत खेती की राह नहीं पकड़ना चाहते थे। ऐसे में उन्होंने जैविक खेती पर फोकस किया। इसके लिए उन्होंने अपने छोटे भाई महेंद्र को साथ लिया। उसके साथ सब्जी और मसालों के उत्पादन की अपनी योजना साझा की। उन्होंने खेती के लिए ऑर्गेनिक इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल अपनाया। जैविक खेती को तरजीह देने के साथ ही सब्जी, मसाले,फल आदि सभी की एकीकृत कृषि की राह पकड़ी, जिसमें उद्यान विभाग की भी उन्हें पूरी-पूरी मदद मिली। सलाह के साथ ही विशेषज्ञ जनों का मार्गदर्शन भी, जिससे कफोला बंधुओं को अपने इरादों को हकीकत में बदलने की हिम्मत मिली। वह दुगुने उत्साह के साथ अपने काम में जुट गए।

महेंद्र कफोला

ग्रैजुएशन के बाद काम की तलाश में गए थे दिल्ली

 रूद्रप्रयाग जिला मुख्यालय से करीब 17 किलोमीटर दूर बद्रीनाथ हाईवे से लगे नगरासू गाँव के रहने वाले नरेंद्र कफोला बताते हैं, “ग्रैजुएशन के बाद आज से करीब 17 साल पहले 2003 में काम की तलाश में दिल्ली गया था। वहाँ 2004 से लेकर 2007 तक एक टेक्सटाइल कंपनी में काम किया। फिर एक वाहन निर्माता कंपनी से जुड़ गया। उसके बाद फिर मैंने नौकरी बदली और 2012 में एक रेफ्रिजरेटर से जुड़ी कंपनी से जुड़ गया।”

नौकरी करते हुए नरेंद्र का मन बार-बार उत्तराखंड की ओर भाग रहा था और आखिरकर 2018 में उन्होंने मन की बात सुन ली और गाँव लौट आए। नरेंद्र बताते हैं, “मैं बार-बार नौकरी बदल रह था। जीवन में कुछ कमी लग रही थी। आखिर 2018 तक आते-आते लगा कि अब गाँव लौट जाना चाहिए। अपने घर से बेहतर कुछ नहीं।”

पैतृक जमीन बनी बदलाव की वाहक

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खेत में काम करते नरेन्द्र व महेंद्र कफोला

नरेंद्र कफोला के पास अपनी पैतृक जमीन थी, जो बंजर पड़ी थी। उन्होंने छोटे भाई महेंद्र के साथ जमीन को उपजाऊ बनाने में पसीना बहाया और सब्जी उत्पादन की शुरुआत कर दी। आज वह हिमसोना टमाटर, बैंगन,मेहरा कद्दू,भिंडी, शिमला मिर्च, लौकी,खीरा, मिर्च,अदरक, हल्दी,धनिया उगा रहे हैं।

पांच नाली जमीन से शुरू किया काम

दोनों भाईयों ने पावर वीडर से बंजर खेतों की खुदाई कर खेती लायक बनाया। पहले चरण में उन्होंने पांच नाली जमीन (उत्तराखंड में जमीन मापक प्रणाली को नाली कहा जाता है) पर जैविक विधि से मेंड़ बनाकर सब्जी उत्पादन शुरू किया। कड़ी मेहनत का बेहतर फल सामने आया। उनकी जमीन पर कंटीली झाड़ियों की जगह हरियाली दिखाई देने लगी। नरेंद्र कफोला बताते हैं कि उनकी पहली कमाई करीब डेढ़ लाख थी। आज वह इससे कहीं ज्यादा कमा रहे हैं।

नरेन्द्र कफोला के खेत में मटर की फसल।

फलों के लगाए 300 पौधे

 इंटीग्रेटेड फार्मिंग के तहत केवल सब्जी और मसाला उत्पादन तक ही नरेंद्र और महेंद्र सीमित नहीं हैं। उन दोनों ने फलों के भी 300 पौधे लगाए हैं। इनमें आम,संतरा, नींबू,इलायची,अखरोट,अमरूद, आडू शामिल हैं। उनकी तमाम सब्जी स्थानीय क्षेत्रों में ही आसानी से बिक रही है। धीरे-धीरे लोगों में जैविक उत्पाद खरीदने का क्रेज बढ़ रहा है, जिसका इन्हें फायदा मिल रहा है।

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कर रहे हैं इंटीग्रेटेड फार्मिंग

अब कफोला भाइयों की योजना 50 नाली जमीन पर सब्जी उत्पादन के साथ ही दुग्ध डेयरी,फूलोत्पादन,मत्स्य पालन और मुर्गी पालन की है। इसके लिए उन्होंने प्रक्रिया शुरू कर दी है। उनका कहना है कि इंटीग्रेटेड फार्मिंग से फसलों की लागत कम आती है और मुनाफा ज्यादा होता है। इसमें से ज्यादातर व्यवसाय अपने खेत और घर में किए जा सकते हैं। पशुपालन,मत्स्य, उद्यान विभाग से इनके लिए सब्सिडी भी दी जाती है।

 

उद्यान विभाग ने दी मदद, जमीन की तारबाड़ की

रूद्रप्रयाग के जिला उद्यान अधिकारी योगेंद्र सिंह चौधरी भी दोनों भाईयों के प्रयासों से बेहद प्रभावित हैं। चौधरी बताते हैं, “अभी जैविक सब्जी के क्षेत्र में लोग आगे आ रहे हैं। सब्जी और मसाला उत्पादन के क्षेत्र में नरेंद्र कफोला और उनके भाई महेंद्र कफोला अच्छा कार्य कर रहे हैं। जंगली सूअर और बंदरों से उनके खेतों की सुरक्षा के लिए उद्यान विभाग ने बाड़ लगाई है।”

 गाँवों में रहकर जैविक खेती से बदल सकते हैं भविष्य

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नरेंन्द्र कफोला के खेत में गोभी की फसल।

नरेंद्र कफोला की दूसरे युवाओं को सलाह है कि वह अपने गांवों को वीरान कर शहरों की ओर न दौड़ें। अपने अनुभव से वह दूसरों को सीखने की नसीहत देते हैं। उनका कहना है, “गांवों में रहकर भी बेहतर काम किया जा सकता है। लाखों रुपये कमाए जा सकते हैं। खास तौर पर अब जैविक खेती से जुड़े फल और सब्जी उत्पादन में बहुत मार्जिन है। थोड़े महंगे होने के बावजूद लोग स्वास्थ्य की बेहतरी की वजह से अब इन्हें खरीदने में अधिक दिलचस्पी दिखा रहे हैं। मेहनत हर काम में है। लेकिन नौकरी में हम दूसरों के लिए काम करते हैं,जबकि अपने काम में मेहनत से सुकून मिलता है। ”

कफोला बंधु से 90129 42416 पर संपर्क किया जा सकता है।

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Written by प्रवेश कुमारी

प्रवेश कुमारी मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन कर चुकीं हैं। लिखने के साथ ही उन्हें ट्रेवलिंग का भी शौक है। सकारात्मक ख़बरों को सामने लाना उन्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरी लगता है।

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