in ,

मिट्टी से बने ये ‘गोल घर’ बड़े से बड़े चक्रवात को भी आसानी से झेल सकते हैं!

1975 के बाद से आंध्र प्रदेश ने 1977 के चक्रवात सहित 60 से अधिक चक्रवातों का सामना किया है इस दौरान तटीय क्षेत्रो के लोगों ने इस तरह के घर बनाकर खुद का बचाव किया!

Mud house

मुझे आज भी याद है मैं बचपन में जब भी मिट्टी के घर बनाता था तो उसे सही आकार देने के लिए नारियल के गोलों का इस्तेमाल करता था। ये छोटे घर उन दिनों की बात है जब मेरी कल्पना तो असीमित थी लेकिन घर बनाने के लिए चीजें कम थी। ऐसे में हम नारियल से ही प्रयोग करते थे। सालों बाद जब मैंने आंध्रप्रदेश के मछुआरों द्वारा मिट्टी से बनायी जाने वाली अनोखी चुतिल्लू (Chutillu) झोपड़ियों को देखा तो उसके बारे में और ज्यादा जानने के लिए उत्साहित हो गया। ये झोपड़ियां राज्य की तटीय वास्तुकला का एक अभिन्न हिस्सा हैं जो कि इस क्षेत्र में आने वाली चक्रवाती हवाओं का सामना करने के लिए बनाई जाती हैं।

चुतिल्लू (Chutillu) घर के बारे में और अधिक जानने के लिए मैंने चेन्नई के बेनी कुरियाकोज से संपर्क किया जो लॉरी बेकर के पहले शिष्यों में से एक थे जिन्हेंवास्तुकला का गाँधी भी कहा जाता है। कुरियाकोज ने आंध्रप्रदेश के अनोखी संरचना चुतिल्लू घर के बारे में द बेटर इंडिया को विस्तार से बताया। 

जीवन को बेहतर आयाम देते ये गोल घर

source

कुरियाकोज बताते हैं, “चुतिल्लू (गोल घर) को कोब वॉल तकनीक का उपयोग करके मिट्टी से बनाया जाता है। इसमें मिट्टी, पानी और पुआल मिलाकर एक मोटा मिश्रण तैयार किया जाता है। यहाँ मिट्टी के गाढ़ेपन को ध्यान में रखा जाता है।

मिट्टी के इन गोलों को फिर दीवार बनाने के लिए पंक्तियों में रखा जाता है। चूंकि मिट्टी की दीवार कई चरण में बनती है इसलिए इस प्रक्रिया में समय लगता है। कुरियाकोज बताते हैं, सबसे पहले हम दो फीट की दीवार बनाते हैं और इसे एक दिन सूखने के लिए छोड़ देते हैं। फिर हम दीवार की दूसरी परत और इसी तरह अगली परत बनाते हैं। फिर अंत में हम चूने से पुताई करते हैं।

कुरियाकोज आगे बताते हैं कि रॉफ्टर जो कि इस घर को खड़ा रखने में मदद करता है, आंध्रप्रदेश के तटीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले पालमीरा पाम से बनाया जाता है। इसी पाम ट्री के पत्तों को सुखाया जाता है और इनका उपयोग चुतिल्लू घर की छत बनाने में किया जाता है।

उन्होंने कहा, आमतौर पर झोपड़ियों की छतें खपरैल की बनी हुई ही देखने को मिलती हैं, जबकि चुतिल्लू के छप्पर लटकते हैं और आमतौर पर जमीन को छूते हैं। यह मिट्टी को खराब मौसम से बचाने के लिए होते हैं। इसके अलावा इनके छत की ढलान न्यूनतम 45 डिग्री पर होती है ताकि पानी घर में प्रवेश न करे। अतिरिक्त सुरक्षा के लिए झोपड़ी पर घास फूस का छप्पर लगाने से पहले टिंबर और मिट्टी से बनी एक अंदरुनी छत बनाई जाती है।

चुतिल्लू घर को दक्षिण चित्र संग्रहालय में शामिल किया गया है जो कला, वास्तुकला, जीवन शैली, शिल्प और दक्षिण भारत की प्रदर्शन कला का एक जीवंत संग्रहालय है। तमिलनाडु के मुथुकादु में स्थित संग्रहालय ने दक्षिण भारत के लिए 18 विरासत घरों को फिर से जीवंत बनाया है। संग्रहालय में स्थित चुतिल्लू घर का निर्माण आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम जिले के येलमानचिल्ली मंडल के हरिपुरम गाँव के निवासियों द्वारा किया गया था।

कुरियाकोज उन वास्तुकारों में से एक थे जिन्होंने संग्रहालय को डिजाइन किया था।

चक्रवात का सामना करना

Promotion
mud house
source

1975 के बाद से आंध्र प्रदेश ने 1977 के चक्रवात सहित 60 से अधिक चक्रवातों का सामना किया जिसमें 10,000 लोग मारे गए और दस लाख से अधिक घरों को नुकसान पहुँचा। इस दौरान चुतिल्लू घरों की अनूठी संरचना तेज हवाओं का सामना करती है और तटीय क्षेत्रों में रहने वाले कई मछुआरों की जिंदगी बचाती है।

कुरियाकोज ने बताया कि चौकोर आकार के या आयताकार घरों के विपरीत ये गोल आकार के घर इस तरह से बनाए जाते हैं कि हवा घर के अंदर से गुजरती है। कुरियाकोज को उनकी टिकाऊ वास्तुकला के लिए चार्ल्स वैलेस (भारत) ट्रस्ट अवार्ड (1986), इनसाइड आउटसाइड मैगजीन (2002) द्वारा डिजाइनर ऑफ द ईयर अवार्ड जैसे कई अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।

कुरियाकोज घरों के निर्माण के लिए टिकाऊ सामग्री का प्रयोग करने के महत्व पर जोर देते है, खासतौर से तब जब आपदा प्रभावित क्षेत्रों में घर का निर्माण करना हो। वह कहते हैं,  “हमारी हर समस्या का समाधान प्रकृति में मिल सकता है। इसी तरह आपदाओं के मामले में प्रकृति के पास इसका सामना करने की अनोखी तकनीक है।

तमिलनाडु के सिविल इंजीनियर अरविंद मोहन का भी यही मानना है। 27 वर्षीय अरविंद  ‘पिझाई अझागु’ (‘Pizhai Azhagu) नाम की कंस्ट्रक्शन कंपनी चलाते हैं। उनका मानना है कि पर्यावरण और उनके घर के बीच एक अटूट रिश्ता है।


अरविंद पारंपरिक तकनीकों और प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग करके कई इमारतों का निर्माण कर चुके हैं। वह कहते हैं, “पारंपरिक वास्तुकला से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। सबसे महत्वपूर्ण बात है इसका सादापन। जितना अधिक हम सरल तकनीक और सामग्रियों का उपयोग करेंगे, उतना ही यह प्रकृति के करीब होगा। इसी तरह चुतिल्लू घर अपने सादेपन के कारण काफी हद तक तेज हवाओं का सामना करने को तैयार रहता है।

अरविंद कहते हैं, मिट्टी, चूने और बांस जैसी स्थानीय सामग्रियों का इस्तेमाल करना उन घरों के निर्माण के लिए एक बेहतर तरीका है जो खराब जलवायु का सामना करते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि इन टिकाऊ घरों में हवा का अद्भुत संचार होता है और इसे बनाने में खर्चा भी कम आता है।

चुतिल्लू घरों के बारे में अधिक जानने से मुझे प्रकृति में समाधान खोजने और निर्माण के पारंपरिक तरीकों को आजमाने और परीक्षण करने की शक्ति का अहसास हुआ। स्थानीय राजमिस्त्री और कारीगरों को इसका पर्याप्त ज्ञान है। ऐसे अनिश्चित समय में जब हम अचानक आने वाली प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहे हैं, यह आवश्यक है कि उस ज्ञान को उपयोग में लाया जाए और शहरी क्षेत्रों में भी टिकाऊ उपायों को अपनाया जाए।

मूल लेख-SERENE SARAH ZACHARIAH

यह भी पढ़ें- चेन्नई जाएं तो 200 साल पुरानी इस लाइब्रेरी को जरूर देखें जहाँ आया करते थे सुभाष चंद्र बोस!

यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है, या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ साझा करना चाहते हो, तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखें, या Facebook और Twitter पर संपर्क करें। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर व्हाट्सएप कर सकते हैं।

Promotion

देश में हो रही हर अच्छी ख़बर को द बेटर इंडिया आप तक पहुँचाना चाहता है। सकारात्मक पत्रकारिता के ज़रिए हम भारत को बेहतर बनाना चाहते हैं, जो आपके साथ के बिना मुमकिन नहीं है। यदि आप द बेटर इंडिया पर छपी इन अच्छी ख़बरों को पढ़ते हैं, पसंद करते हैं और इन्हें पढ़कर अपने देश पर गर्व महसूस करते हैं, तो इस मुहिम को आगे बढ़ाने में हमारा साथ दें। नीचे दिए बटन पर क्लिक करें -

₹   999 ₹   2999
mm

Written by अनूप कुमार सिंह

अनूप कुमार सिंह पिछले 6 वर्षों से लेखन और अनुवाद के क्षेत्र से जुड़े हैं. स्वास्थ्य एवं लाइफस्टाइल से जुड़े मुद्दों पर ये नियमित रूप से लिखते रहें हैं. अनूप ने कानपुर विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य विषय में स्नातक किया है. लेखन के अलावा घूमने फिरने एवं टेक्नोलॉजी से जुड़ी नई जानकारियां हासिल करने में इन्हें दिलचस्पी है. आप इनसे anoopdreams@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

locust attack

टिड्डियों को भगा सकता है पद्म श्री से सम्मानित इस किसान का ‘कीचड़ वाला फार्मूला’!

कोरोना काल में कुछ ऐसा होगा सफ़र, घूमने के शौक़ीन हो जाएँ तैयार!