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मोबाइल क्रेचएस: निर्माण कार्य से जुड़े मज़दूरो के बच्चो की देखभाल करता पालना घर!

यदि मैं आपसे एक बच्चे की कल्पना करने को कहूँ, तो आपको क्या नज़र आएगा?

ज़ाहिर है आप कहेंगे, एक हँसता, खिलखिलाता हुआ चेहरा, एक उर्जा से भरी हुई हँसी, भविष्य के सपनो से भरी हुई दो आँखें और एक चिंतामुक्त जीवन।

पर यदि यह कल्पना एक ज़मीन पर पड़े हुए, धूल मिट्टी से भरे, दूध के लिए बिलखते बच्चे में बदल जाए तो?

देश के हज़ारो निर्माण कार्य से जुड़े मज़दूरो के बच्चो के लिए कड़वा ही सही पर यही सच है। ये बच्चे ऐसे ही धूल मिट्टी से भरा बचपन जीने के लिए मजबूर है। और इन बच्चो के माँ बाप भी ग़रीब और लाचार होने के कारण इन्हे ऐसा ही जीवन दे सकते है। ऐसे मे इन बच्चो की देखभाल कैसे हो? कैसे सावांरा जाए इनके फूल से बचपन को?

भारत के हर बच्चे को अच्छा और सुखमय बचपन मिले इस स्वप्न को लिए मोबाइल क्रेचएस, ‘चाइल्ड फ्रेंड्ली साइट्स'(बच्चो के अनुकूल साइट) के अपने मिशन को पूरा कर रहा है। इस मिशन का मूल आधार निर्माण कार्य के साइटो पे मज़दूरो के बच्चो की हर तरह से देखभाल करना है। इन मज़दूरो के बच्चो को स्वस्थ तथा हँसता खेलता बचपन देना ही इसका उद्देश्य है।

मोबाइल क्रेचएस मीरा महादेवन द्वारा १९६९ मे  दिल्ली मे इसी भावना के साथ शुरू किया गया था कि हर बच्चे को स्वास्थ, शिक्षा तथा सुरक्षा का मौलिक अधिकार होना चाहिए। मीरा, जो उस वक़्त एक गृहणी थी, एक निर्माण कार्य स्थल के पास से गुज़र रही थी। तब उनका सामना एक ऐसे ही कड़ी धूप मे, ज़मीन पर लेटे, धूल मिट्टी से सने हुए बच्चे से हुआ।

अगले ही दिन मीरा ने वहाँ एक टेंट लगाया तथा कुछ लोगो की मदत से अपना पहला मोबाइल क्रेच(चलता फिरता पालना घर) खोला। यही से एक सामाजिक आंदोलन की शुरूवात हुई जिसका सिद्धांत था – बचपन मायने रखता है!

करीब तीन दशक तक सिर्फ़ एक संस्था के रूप मे काम करता मोबाइल क्रेचएस सन् २००७ मे तीन विभागो मे बँटा- मोबाइल क्रेचएस (दिल्ली), मुंबई मोबाइल क्रेचएस और तारा मोबाइल क्रेचएस (पुणे)। मुंबई मोबाइल क्रेचएस की एक सदस्या, देवीका महादेवन, इस मुहीम से गत पाँच वर्षो से जुड़ी हुई है।

संस्था की पूर्व सीईओ ने बताया , “मेरी दादी, श्रीमती रुक्मिणी महादेवन चाहती थी कि यह संस्था मुंबई मे भी कार्यरत हो। उन्होने अपनी बहन तथा मेरे पिता को भी इसमे शामिल कर लिया और वे भी इसके सदस्य बने। यह मुहीम इसीलिए इतना ख़ास है क्यूंकी देश मे इस तरह की और कोई संस्था नही है जो निर्माण कार्य से जुड़े इन प्रवासी मज़दूरो के विषय मे सोचे। इन मज़दूरो की परेशानियो को हमेशा से ही टाला गया है। परंतु अब जब देश के हर बच्चे को पढ़ने लिखने का अधिकार है और ६ साल से उपर की आयु के बच्चो का विद्यालय जाना अनिवार्य है। हमे लगता है की हम इन बच्चो के लिए एक बेहतर भविष्य बनाने का माध्यम बन सकते है। हमारी इस मुहीम को पूरा करने के लिए हमने एक और पहल की। हम इन  साइट्स पर काम कर रही मज़दूर महिलाओ को शिक्षिका बनने का प्रशिक्षण देने लगे। आज मुंबई  मे हमारे २८ केंद्र है जिसमे ४० फीसदी शिक्षिकाए इन्ही निर्माण कार्य स्थल से है। हम इन्हे काम के दौरान ही ११ महीने का प्रशिक्षण देते है।”

आयु उपयुक्त शिक्षण

‘बचपन बचाओ’ के सिद्धांत को लिए शुरू किए गये मोबाइल क्रेचएस मे एक पालने घर को भी व्यापक तौर पर विकसित किया गया, जिसमे  बच्चो के शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक ज़रूरतो की पूर्ति होती है। इस तरह से प्रवासी मज़दूरो के बच्चो के लिए देश के प्रथम अर्ली चाइल्ड केयर एजुकेशन (ए.सी.सी.ए ) की नीव रखी गयी। पिछले चार दशको से यह संस्था इन बच्चो के अधिकारो को उचित न्याय देने हेतु अभिभावको, निर्माण उद्योगियो, मज़दूर संगठनो एवं सरकारी और ग़ैरसरकारी संस्थाओ के साथ मिलकर काम कर रही है।

children at mobile creche
मोबाइल क्रेच मे हँसते खेलते बच्चे!

 

देवीका ने बताया की तीन साल से कम आयु के बच्चो के लिए संस्था एक ख़ास कार्यक्रम चलाती है जिससे कि उन्हे एक स्वस्थ बचपन मिले। इसके अलावा कई शैक्षणिक गतिविधियाँ तथा स्वास्थवर्धक जीवन जीने की कला भी सिखाई जाती है। एक उपयुक्त आयु के बाद इन बच्चो को नज़दीकी सरकारी स्कूलो मे भी भेजा जाता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार इस संस्था के एक केंद्र मे करीब १७ राज्यो के बच्चे एक साथ थे। ऐसे मे भाषा एक बहोत बड़ी चुनौती के रूप मे सामने आया। परंतु अपने शुरूवाती दौर के शिक्षण मे होने की वजह से इन बच्चो ने इस चुनौती को भी पार कर लिया।

मोबाइल क्रेचएस ये मानते है कि शिक्षण का कार्य जन्म से शुरू होकर स्कूल अथवा उच्च विद्यालय तक निरंतर चलता है। एक बच्चे के जीवन को सशक्त बनाता है। सन् २००७-८ मे इस संस्था ने ५००० बच्चो का जीवन सँवारा, २००८-९ मे ५५०० का और २००९-१० मे यह आँकड़ा ६००० तक  पहुँच गया।  देवीका एक उज्वल भविष्य की कल्पना करते हुए इस मुहीम को और आगे से आगे बढ़ाना चाहती है। इसके साथ ही वे सरकारी संस्थाओ के साथ मिलकर इस मुहीम को सफल बनाना चाहती है। निर्माण कार्य के मज़दूरो के बच्चो को बेशक एक आम बच्चे के मुक़ाबले ज़्यादा मुसीबतो से गुज़रकर मंज़िल मिले पर उनकी मंज़िल उन्हे ज़रूर मिलनी चाहिए।मोबाइल क्रेचएस की इस पहल को हमारा शत शत प्रणाम जिसके कारण आज इन बच्चो का भविष्य सुरक्षित हाथो मे है।

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मूल लेख श्रेय – उन्नति नारंग

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Written by मानबी कटोच

मानबी बच्चर कटोच एक पूर्व अभियंता है तथा विप्रो और फ्रांकफिंन जैसी कंपनियो के साथ काम कर चुकी है. मानबी को बचपन से ही लिखने का शौक था और अब ये शौक ही उनका जीवन बन गया है. मानबी के निजी ब्लॉग्स पढ़ने के लिए उन्हे ट्विटर पर फॉलो करे @manabi5

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