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केवल ऊँगली नहीं, मज़दूरों की मदद की ज़िम्मेदारी भी उठा रहे हैं ये 5 पत्रकार

अपनी ख़बरों से इतर, मजदूरों की राशन व स्वास्थ्य जैसी ज़रूरतों के लिए मदद कर रहे हैं ये पत्रकार

journalists helping migrants

पिछले तीन महीनों से पूरा विश्व कोरोना वायरस के कहर से जूझ रहा है। अब तक दुनियाभर में इसने करीब 200 देशों के लगभग 60 लाख लोगों को अपनी चपेट में ले लिया है। भारत में कोरोना की रफ़्तार रिकॉर्ड तोड़ स्पीड से आगे बढ़ी जा रही है। तमाम छोटे-बड़े शहरों से मेहनतकश मजदूरों का पलायन देश के लिए एक दोहरी विपदा है। अपने घरों की ओर लौटते ये मज़दूर कभी सड़क हादसों का शिकार बन रहे हैं तो कभी भूख और प्यास की चपेट में आ रहे हैं। ये हम सब के लिए दुखद है लेकिन वो कहते हैं ना  “किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है, है अँधेरी रात पर दीपक जलाना कब मना है।”

‘हम अपने स्तर पर कैसे जरूरतमंदों तक मदद का हाथ पहुँचा सकते हैं या एक बेहतर भारत बना सकते हैं?’ ये सवाल हम आखिरकार कितनी बार खुद से पूछते हैं? ऐसे में हमारे बीच कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपने सामाजिक दायित्व को समझती हैं और उसे बखूबी पूरा करती हैं।

आज जहाँ भारत में पत्रकारिता पर कई बार सवाल उठाये जा चुके हैं वहीं हमारे बीच कुछ ऐसे पत्रकार भी मौजूद हैं जो अपने पेशे के साथ ईमानदार रहते हुए लोगों की मदद के लिए भी आगे आते हैं। इनकी जिम्मेदारी बस खबरें बनाकर पूरी नहीं होती, बल्कि अगर उस खबर में कहीं कोई पक्ष अन्याय से जूझ रहा है या उसे मदद की जरुरत है तो उसके लिए, ये जरुरी कदमों का उठाया जाना भी सुनिश्चित करते हैं। लॉकडाउन के बीच जब मज़दूर वर्ग राशन, स्वास्थ्य या दूसरी अहम जरूरतों से जूझ रहा है तब इन पत्रकारों का समूह लोगों की मदद के लिए आगे आ रहा है। ये पत्रकार जरूरतमंदों के लिए भारत के कई राज्यों तक मदद पहुंचा रहे हैं। कुछ नाम जो इनमें शामिल हैं- दया सागर (गाँव कनेक्शन), आनंद दत्ता (फ्रीलांसर: द प्रिंट, न्यूज़ क्लिक, डाउन टू अर्थ, एनबीटी), राहुल पांडेय (राज्यसभा टीवी) और निखिल साहू (नवभारत टाइम्स)।

 

सच को दिखाना है, गलत को सुधारना है

राजस्थान, झारखंड, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में मज़दूर और गरीब वर्ग के लिए गाँव कनेक्शन के पत्रकार दया सागर, समय पर जरुरी राशन, उपचार व आर्थिक मदद उपलब्ध करा रहे हैं।

दया सागर ने द बेटर इंडिया से बातचीत के दौरान कहा, “ऐसे हालातों में जब अपनी और दूसरों की सुरक्षा के लिए घर में रहना ही सही कदम है तब सोशल मीडिया एक जरिया है इन हालातों से लड़ने का और जीतने का।”

दया सागर अपने राज्य में रह कर भी समन्वय से दूसरे राज्यों तक मदद पहुंचाते हैं। जिस भी जानने वाले की जानकारी में कोई पुलिस अधिकारी या एनजीओ होता है वह उसके माध्यम से जरूरतमंदों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाते हैं।

उन्होंने बताया, “अभी हाल ही में सूरत में फंसे एक बीस वर्षीय मज़दूर को अपने घर लौटने के लिए आर्थिक मदद की जरुरत थी। घर लौट चुका वो मज़दूर अब अपने परिवार के साथ है और सुरक्षित है। अगर हम पत्रकार हैं तो हमें सच को ना ही सिर्फ दिखाना है बल्कि अगर कुछ गलत है तो उसे सुधारना भी है।”

Journalists Helping Migrants
पत्रकार दया सागर source

राज्यसभा टीवी से जुड़े पत्रकार, राहुल पांडेय के पास जब किन्हीं जरूरतमंद लोगों की खबर पहुंचती है, तो वह सबसे पहले अपने स्थानीय रिपोर्टरों के माध्यम से खबर को पुख्ता करने के बाद, वहां प्रशासन से बातचीत कर पीड़ित परिवारों तक राहत पहुंचाने के लिए जरुरी क़दमों का उठाया जाना सुनिश्चित करते हैं। वहीं अगर लॉकडाउन में मज़दूर परिवार में किसी की मृत्यु हो गई हो, तो उसे श्रम विभाग से भुगतान दिलाने की कोशिश रहती है। बिहार जिले में गोपालगंज के एक दलित परिवार तक 60-70 हज़ार रुपयों की सहयोग राशि पहुंचाई गई। परिवार के मुखिया गाजियाबाद में एक ट्रक ड्राइवर थे, जिनकी लॉकडाउन में मृत्यु हो गई थी। 32 वर्षीय मृत ड्राइवर पर अपनी तीन छोटी बच्चियों और बूढ़े पिता की जिम्मेदारी थी। राहुल का मानना है हम घर बैठे-बैठे भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभा सकते हैं। सोशल मीडिया पर जरूरतमंदों से जुड़े वो पोस्ट जो विश्वसनीय और पुख्ता हों, वहां हम अपनी थोड़ी सी भी धनराशि देकर उनकी मदद कर सकते हैं। हमें अपने पोस्ट के माध्यम से एक अमरीकी व्यक्ति से 25000 रुपयों की मदद भी मिली है। हमारी आज दी हुई आर्थिक मदद से कल किसी के घर का चूल्हा जल सकता है। सिर्फ शिकायत करने से समस्या नहीं सुलझती, हमें उसके हल के लिए प्रयास भी करने पड़ते हैं।

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पत्रकार राहुल पाण्डेय source- RSTV

कई राज्यों तक पहुंचे मदद के हाथ

फ्रीलान्स पत्रकार, आनंद दत्त बताते हैं कई बार हमने ट्वीट के माध्यम से भी लोगों तक मदद पहुंचाई है। तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और झारखंड तक राशन व्यवस्था या आर्थिक मदद दी गई है। नोएडा में झारखंड के करीब 50 लोग फंसे हुए हैं। ट्विटर पर प्रशासनिक अधिकारियों को टैग करने पर कई बार मदद समय पर तो कभी देर से भी मिलती है। लद्दाख में कई पहाड़ी आदिवासी फंसे हुए हैं जिसके लिए हमने झारखंड सरकार से बात की है। आनंद मानते हैं सरकार को पत्रकारों की, लॉकडाउन में पीड़ित लोगों से जुड़ी ख़बरों पर समय रहते ज़रुरी कदम उठाना चाहिए।

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पत्रकार निखिल साहू, नवभारत टाइम्स से जुड़े हुए हैं। छत्तीसगढ़, दिल्ली और गाजियाबाद में अपने फ्रेंड सर्किल की मदद से ये जरुरी स्वास्थ्य और राशन सुविधा उपलब्ध करा चुके हैं। मेरठ में लॉकडाउन के बीच एक गर्भवती महिला की डिलीवरी के लिए अस्पताल का मिलना मुश्किल हो गया था। खबर मिलने पर निखिल अपने साथियों के साथ महिला की मदद कर पाए। हालांकि लॉकडाउन के बीच एक ऐसी घटना भी सामने आई जो जांच पड़ताल के बाद झूठी निकली इसलिए सतर्क रहते हुई ये भी जरुरी है कि सूचना को पुख्ता भी किया जाए।

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फ़ोटो में सबसे बाईं ओर खड़े पत्रकार निखिल साहू

मदद करने के लिए संसाधनों से पहले इच्छाशक्ति की जरुरत होती है

छत्तीसगढ़ से द बेटर इंडिया के संवाददाता जिनेन्द्र पारख ने अपने अनुभव से सीखा है कि मदद करने के लिए संसाधनों से पहले इच्छाशक्ति की जरुरत होती है। जिंतेंद्र को जब पता चला कि जालना, महाराष्ट्र से साइकिल चलाकर आ रहे कुछ मज़दूरों का समूह अपने घर गंजाम, ओडिशा तक जाना चाहता है और इसके लिए वो हर रात लगभग 70-80 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं और दिन में सड़क के किनारे सो जाते हैं। उन्हें कभी खाना मिलता है, तो कभी नहीं मिलता। जिंतेंद्र ने अपने एक परिचित की मदद से समर्थ ट्रस्ट और वी द पीपल संस्था द्वारा इनके लिए गाड़ी की व्यवस्था करवाई, जिससे इन मज़दूरों का घर पहुंचने का लंबा सफर आसानी से खत्म हो सके।

भारत में मीडिया प्लेटफॉर्म द बेटर इंडिया ने, जो सकारात्मक कहानियों के ज़रिए देश में बदलाव ला रहा रहा है, #BetterTogether नाम से एक पहल शुरू की है जिसके ज़रिए ये प्रशासनिक अधिकारियों का साथ देना चाहता है ताकि दिहाड़ी मजदूरों, सबसे आगे खड़े स्वास्थ्य कर्मचारियों और ज़रूरतमंदों को इस मुश्किल समय में मदद मिलती रहे। आप भी इस मुहिम से जुड़ सकते हैं। जुड़ने के लिए यहां क्लिक करें! 

देश के निर्माण में एक मजदूर बहुमूल्य भूमिका निभाता है। डर और आशंकाओं की इस स्थिति में हम घर पर बैठे-बैठे ज़रुरी सुविधाओं का लाभ तो उठा रहे हैं लेकिन एक बार उनका सोचिये जो शहर में भूख से बेहाल हैं, पैसों की तंगी झेल रहे हैं और इस अंधेरे में उन्हें दिख रहा है बस अपने गांव का एक घर। यही समय है इन पत्रकारों की तरह अपने स्तर पर अपना सामाजिक दायित्व निभाने का। आखिर अब नहीं तो कब!

संपादन- पार्थ निगम

कृपया नोट करें – पत्रकार निखिल द्वारा पहले गलती से किसी और की तस्वीर भेजी गई थी, जिसे अब उनसे संपर्क करके सही तस्वीर के साथ बदल दिया गया है। त्रुटि के लिए खेद है।

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Written by ईश्वरी शुक्ला

ईश्वरी शुक्ला एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में द बेटर इंडिया के साथ जुड़ी हैं।

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