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भारत में क्यों बढ़ रहा है टिड्डों का झुंड? जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

टिड्डों का झुंड एक दिन में 35,000 लोगों का खाना खा सकता है। कोरोनावायरस के बीच यह स्थिति वास्तव में भयावह है, लेकिन फौरन कुछ कार्रवाई करके इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भारी नुकसान करने के बाद रेगिस्तानी टिड्डियों का झुंड महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है।

रेगिस्तानी टिड्डियाँ, टिड्डा समुदाय का हिस्सा हैं और हर साल जुलाई से अक्टूबर तक फसलों को अपना भोजन बनाती हैं। ये ज्यादातर छोटे और अगल-अगल समूहों में देखे जाती हैं। 

हालांकि, जलवायु परिवर्तन के कारण, ये प्रवासी टिड्डे भारत के कई हिस्सों में काफी ज़्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं।

ए. एम. भारिया कहते हैं, “इस तरह के तेज और बड़े पैमाने पर हमले, लगभग 27 साल पहले 1993 में देखे गए थे। इस तरह की घटनाओं के पैटर्न की कमी और वर्षा की अनिश्चितता को देखते हुए यह अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल है कि क्षेत्र में कितने टिड्डियां प्रवेश कर सकती हैं। इसलिए, हमले को नियंत्रित करने के लिए, हमारे समाधान बड़े पैमाने पर कीटनाशकों के छिड़काव पर निर्भर करते हैं।” भारिया लोकस्ट प्रोटेक्शन ऑर्गेनाइज़ेशन के साथ प्लांट प्रोटेक्शन अधिकारी है।

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रेगिस्तानी टिड्डे, टिड्डा समुदाय का हिस्सा हैं और दुनिया में सबसे खतरनाक प्रवासी कीट माने जाते हैं। वे सामान्य टिड्डों से अलग हैं क्योंकि वे अपने व्यवहार और आदतों को बदल सकते हैं और बड़ी दूरी पर पलायन कर सकते हैं।

पीछे के दो बड़े पैरों के साथ, ये कीट बड़े समूहों में चलते हैं और रोज़ाना करीब अपने वजन के बराबर, यानी दो ग्राम ताजा वनस्पति का सेवन कर सकते हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन महीनों में टिड्डियों ने राजस्थान के पांच लाख हेक्टेयर खेतों को नष्ट किया है, जिससे सैकड़ों किसानों की आजीविका प्रभावित हो रही है।

पिछले कुछ महीनों से गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश भी ऐसी ही स्थिति का सामना कर रहे हैं। दिसंबर 2019 में, टिड्डियों ने गुजरात में 25,000 हेक्टेयर में फैली फसलों को नष्ट कर दिया था।

टिड्डे झुंड का आकार एक वर्ग किलोमीटर तक भिन्न हो सकता है और झुंड में इसमें 80 मिलियन टिड्डियां शामिल हो सकती हैं और संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार ये टिड्डे एक ही दिन में 35,000 लोगों का भोजन खा सकते हैं।

इसका किसानों पर होने वाले प्रभाव को समझाते हुए भारिया कहते हैं, “ऐसी प्राकृतिक आपदाओं का निशाना सबसे हमेशा से किसान ही बनते हैं। टिड्डियों के हमलों से भी सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को ही होगा। यह उनके फसल नष्ट करेगा और वित्तीय रूप से भी नुकसान पहुंचाएगा।”

कुछ ही दिनों के भीतर फसलों और पौधों को अपना खाना बनाने के लिए वे एक साथ आते हैं और बारिश के दौरान तेजी से प्रजनन करते हैं। एफएओ  के अनुसार, “एक एकान्त मादा 95-158 अंडे देती है, जबकि झुंड में रहने वाली मादा आमतौर पर एक अंडे की फली में 80 से कम अंडे देती है। मादा अपने जीवनकाल में, आमतौर पर लगभग 6-11 दिनों के अंतराल पर, कम से कम तीन बार अंडे देती है। एक वर्ग मीटर में 1,000 से अधिक अंडे की फली मिली है।“

कोविड-19 के कारण देश भर में चल रहे लॉकडाइन ने पहले से ही किसानों के भोजन और आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है और अब तीव्र गति से होने वाले टिड्डों के हमलें उन्हें स्थिति और बुरे होने का संकेत दे रहे हैं।

केंद्र सरकार ने पहले ही प्रभावित राज्यों को चेतावनी जारी कर दी थी और पिछले हफ्ते दिल्ली को अलर्ट भेजा था।

भारत में आक्रमण और फैलाव

Locust Attack in India
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रेगिस्तानी टिड्डे का मूल अफ्रीकी देश और अरब प्रायद्वीप माना जाता है।  हरियाली और नमी की तलाश में वे ईरान और पाकिस्तान गए और फिर भारत आए।

हालांकि, टिड्डियों ने लगातार दो सायक्लोन (मेकुनु और लुबान) के मद्देनजर 2018 में अरब प्रायद्वीप में प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थितियां पाईं। उनकी संख्या में काफी वृद्धि हुई और इस प्रकार प्रवास का प्रकोप शुरू हुआ। पिछले अप्रैल में पाकिस्तान में लगभग 40 फीसदी फसलों को नष्ट करने के बाद, भारी बारिश और सायक्लोन के कारण रेगिस्तानी टिड्डियों ने 2019 में भारत में प्रवेश किया।

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रॉक्सी मैथ्यू कोल ने हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए बताया, “पूर्वी अफ्रीका और अरब प्रायद्वीप पर भारी बारिश के बाद प्रकोप शुरू हुआ। भारी वर्षा से शुष्क क्षेत्रों में वनस्पतियां बढ़ती हैं , जहां रेगिस्तानी टिड्डे बढ़ सकते हैं और प्रजनन कर सकते हैं। इसके अलावार, ग्लोबल वार्मिंग के कारण बढ़ते तापमान ने पश्चिमी हिंद महासागर को विशेष रूप से गर्म बना दिया है।”

रॉक्सी मैथ्यू कोल पुणे में, इंडिया इन्स्टिटूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलोजी ( आईआईटीएम ) में एक जलवायु वैज्ञानिक हैं।

क्या किया जा सकता है

भारिया कहते हैं, “टिड्डियों को नियंत्रित करने के लिए कीटनाशकों या ऑर्गनोफॉस्फेट केमिकल का छिड़काव होना सबसे पहला कदम है। हवाई और जमीन पर वाहन या स्प्रेयर के माध्यम से इसे छोटी केंद्रित खुराक (अल्ट्रा-लो वॉल्यूम- ULV कहा जाता है) में लागू किया जाना चाहिए।”

सरकार की आकस्मिक योजना के अनुसार, मालाथियन 96 फीसदी ULV को हमेशा 5,000 लीटर के स्टॉक के रूप में रखा जाता है। लगभग एक लीटर केमिकल से एक हेक्टेयर का उपचार किया जा सकता है।

ध्यान रहें कि इन केमिकल्स को विशेषज्ञों की देखरेख व सलाह से ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए, क्यों ये विषैले होते हैं। 

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भारिया बताते हैं, “उनके व्यवहार पैटर्न के अनुसार, टिड्डे रात के दौरान शांत हो जाते हैं और ज्यादातर पेड़ों पर रहते हैं और यही वह समय है जब कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता है। वाहन स्प्रेयर (100 लीटर तक की क्षमता वाले) खेत में जाते हैं और स्प्रे करते हैं। हम उन किसानों को भी शामिल करते हैं जिनके पास ट्रैक्टर से चलने वाले स्प्रेयर हैं। इसके अलावा, फायर ब्रिगेड को भी तैयार रखा जाता है क्योंकि वे बड़े पेड़ों को कवर कर सकते हैं।”

एग्रीकल्चर टेक्नोलोजी मैनेजमेंट एजेंसी, के प्रॉजेक्ट डायरेक्टर, बी आर करवा कहते हैं, इस वर्ष हमले की प्रकृति बेहद घातक है, और इससे लड़ने के लिए, भारत पहली बार ड्रोन और विमानों का उपयोग करेगा।

इस बीच, एफएओ ने भविष्यवाणी की है कि आने वाले हफ्तों में हमला बढ़ने वाला है। 90 देशों में 45 मिलियन वर्ग किमी भूमि पर रेगिस्तान टिड्डी के आक्रमण का खतरा है। ऐसे अनिश्चित समय में, हमें उम्मीद है कि केमिकल और कीटनाशक पर्याप्त होंगे। हालांकि, लंबे समय के लिए, चरम जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए एक व्यापक योजना की ज़रूरत है।

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मूल लेख – गोपी करेलिया

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Written by पूजा दास

पूजा दास पिछले दस वर्षों से मीडिया से जुड़ी हैं। स्वास्थ्य और फैशन से जुड़े मुद्दों पर नियमित तौर पर लिखती रही हैं। पूजा ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से मास्टर्स किया है और नेकवर्क 18 के हिंदी चैनल, आईबीएन7, प्रज्ञा टीवी, इंडियास्पेंड.कॉम में सक्रिय योगदान दिया है। लेखन के अलावा पूजा की दिलचस्पी यात्रा करने और खाना बनाने में है।

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