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खेती के साथ प्रोसेसिंग और इको-टूरिज्म भी, किसानों के लिए रोल मॉडल है यह दंपति!

कान सिंह और सुशीला के घर के दरवाजे उन सभी लोगों के लिए खुले हैं जो खेती तो करना चाहते हैं, लेकिन उनके पास ज़मीन नहीं है।

मारे देश में अक्सर गाँव के लोग अपने बच्चों की पढ़ाई और अच्छी ज़िंदगी के लिए शहरों में बसने का ख्वाब देखते हैं। खासकर तब जब उनके पास खेती में कोई साधन न हों तो लगता है कि इससे तो शहर की कोई नौकरी ही अच्छी है। लेकिन आज हम आपको रू-ब-रू करा रहे हैं एक ऐसे दंपति से, जिन्होंने अपने गाँव को ही इस कदर मशहूर कर दिया कि आज न सिर्फ शहरों से बल्कि विदेशों से लोग उनके यहाँ आते हैं।

हम बात कर रहे हैं राजस्थान के सीकर जिले में कठराथल गाँव के रहने वाले कान सिंह निर्वाण और उनकी पत्नी सुशीला राठौर की। इन दोनों ने अपने खेत को इको-टूरिज्म के हब के तौर पर विकसित किया है। इनका गेस्ट हाउस, ‘जोर की ढाणी’ सस्टेनेबल होम स्टे है। इसके निर्माण से लेकर यहाँ उपलब्ध हर एक सुविधा में आपको सस्टेनेबिलिटी की झलक दिखेगी। इसके साथ ही दोनों पति-पत्नी जैविक और प्राकृतिक तरीकों से फल, सब्जियां, मसाले, दाल और अनाज उगा रहे हैं और अन्य किसानों को ट्रेनिंग भी देते हैं। लगभग 3 साल पहले उन्होंने अपने खेतों पर ही प्रोसेसिंग यूनिट भी शुरू की है ताकि वह खुद ग्राहकों से जुड़कर उन्हें जैविक उताप्द बेच सकें।

द बेटर इंडिया ने कान सिंह और सुशीला राठौर से खास बातचीत कर उनके इस अनोखे और सफल मॉडल को जाना और आज हम आपके सामने पेश कर रहे हैं उनकी कहानी!

Organic Tourism with Farming
Kan Singh and Sushila

गाँव से शहर और फिर शहर से गाँव लौटे:

कान सिंह बताते हैं कि उनकी पुश्तैनी ज़मीन ठीक ठाक है और उनके हिस्से में लगभग 7-8 एकड़ आ जाती है। लेकिन उनके गाँव में पानी की उपलब्धता नहीं थी और उनके पास इतने साधन नहीं थे कि वह ट्यूबवेल लगवा पाते। इसलिए खेती में कोई भविष्य उन्हें दिख नहीं रहा था। ऐसे में, साल 2004 में कान सिंह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ सीकर जाकर रहने लगे।

उन्होंने बताया, “पढ़ाई तो मैंने की नहीं थी लेकिन लगा कि नौकरी करके गुजारा कर लेंगे। इस सोच के साथ बच्चे और पत्नी के साथ सीकर रहने चला गया, लेकिन हम वहां कुछ ही महीने रहे और लौट आए।”

कान सिंह और उनके परिवार के वापस लौटने की वजह थी सुशीला। मात्र 9वीं कक्षा तक पढ़ी सुशीला ने भी बचपन से खेती-किसानी देखी थी। उन्हें यह बात बिल्कुल नहीं जमी कि वह अपने खेतों को छोड़कर दूसरे शहर में कुछ रुपयों में गुज़ारा करें। उन्होंने हमेशा से ही मेहनत करके खाना-कमाना सीखा था। सुशीला बताती हैं, “मैं सोचती थी कि कम में गुज़ारा करने में कोई परेशानी नहीं है लेकिन बच्चे स्कूल चले जाएंगे और फिर घर का काम खत्म करने बाद मैं क्या करुँगी? खाली बैठने से तो अच्छा है कि कहीं मेहनत करके कुछ कमाया जाए और अगर मेहनत ही करनी है तो अपने खेतों में क्यों नहीं।”

Organic Tourism with Farming
In his Farm

कान सिंह और सुशीला जब अपने गाँव लौटे तो अपने खेतों पर जाकर रहने लगे। हालांकि, वहां कोई अच्छा घर या सुविधाएं नहीं थीं। लेकिन सुशीला ने ठान लिया था कि वे लोग वहीं रहेंगे और दिन-रात मेहनत करके इस ज़मीन से ही एकदिन अच्छा कमाएंगे। उन्होंने थोड़ी-बहुत करके जो फसलें उस समय हो सकतीं थीं उगानी शुरू की। प्राकृतिक खेती को समझा ताकि वह अपने यहाँ की ज़मीन और जलवायु का सही उपयोग करें।

सुशीला ने बताया, “उस समय सीकर इलाके में एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था काम कर रही थी। वे अक्सर विदेशी छात्रों को या फिर अन्य टूरिस्ट को हमारे यहाँ की संस्कृति और सभ्यता से पहचान कराने के लिए लाते थे। हम लोग खेत में ही रह रहे थे तो उन्होंने एक टूरिस्ट ग्रुप की ज़िम्मेदारी हमें दे दी कि हम अपनी ज़मीन और खेती के बारे में उन्हें बताएं। वे लोग लगभग एक-डेढ़ हफ्ता हमारे साथ रहे और तब हमने उन्हें किसी और की हवेली में ठहराया। तब हमें होम स्टे बनाने का ख्याल आया।”

सबसे अनोखा ‘जोर की ढाणी‘ होम स्टे:

Jor Ki Dhani Home Stay

अंतर्राष्ट्रीय फाउंडेशन के लोगों से सुशीला और कान सिंह की बात हुई। बातचीत में पति-पत्नी को समझ आया की उन्हें फायदा तभी है जब वे अपने होम स्टे को परम्परागत तरीकों से बनाएं। कान सिंह बताते हैं कि उन्होंने एक स्थानीय कारीगर की मदद ली और अपने खेतों में उपलब्ध साधनों से जैसे मिट्टी, गोबर, कृषि से निकलने वाला भूसा आदि से होम स्टे का निर्माण शुरू किया। कारीगर ने उनकी मदद की और मजदूरों का सभी काम इस दंपति ने खुद किया।

धीरे-धीरे करके आखिरकार उनका होम-स्टे तैयार हो गया। कान सिंह ने इसे ‘जोर की ढाणी’ नाम दिया, जिसका मतलब है टॉप-क्लास। उन्होंने सबसे पहले इसका निर्माण किया और फिर इसमें बाकी सुख-सुविधाओं को जोड़ा। आज यह इको-होम स्टे होने के साथ फार्म स्टे और खेती का ट्रेनिंग सेंटर भी है। ‘जोर की ढाणी’ गर्मियों में प्राकृतिक रूप से ठंडा रहता है और सर्दियों में गर्म। बिजली की खपत को सौर ऊर्जा से पूरा किया जा रहा है। यहाँ 11 कमरे हैं और हर एक कमरा दूसरे से भिन्न है। कोई मिट्टी और गोबर से बना है तो किसी में लकड़ी का काम ज्यादा है।

A glimpse to Jor ki Dhani

किसी-किसी कमरे में चिमनी भी है तो कुछ में बाथरूम अंदर ही बने हैं। इसके अलावा, चाहे कितने भी मेहमान हों सभी को पारंपरिक राजस्थानी खाना परोसा जाता है। यह खाना सुशीला खुद मिट्टी के बर्तनों में चूल्हे पर बनाती हैं। सभी चीजें उनके खेत में उगती हैं। यह दंपति मवेशी पालन भी कर रहा है।

सबसे अच्छी बात यह है कि यहाँ पर टूरिस्ट के अलावा, खेती सीखने की चाह रखने वाले लोग भी आकर रह सकते हैं। जो लोग कान सिंह और सुशीला के पास प्राकृतिक खेती सीखने आते हैं, उनके रहने-खाने की ज़िम्मेदारी यह दंपति स्वयं उठाता है। इसके बदले में लोगों को बस उनके साथ खेती सीखते हुए खेतों में काम करना होता है।

“हमारे यहाँ जो टूरिस्ट आते हैं, वे सभी हमारे खेत में वक्त गुजारते हैं। देशी हो या विदेशी, हर एक मेहमान हमारे लिए ख़ास हैं।”

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At the dining table

प्राकृतिक खेती और प्रोसेसिंग यूनिट:

कान सिंह बताते हैं कि उन्हें जब होम-स्टे से थोड़ा-बहुत फायदा हुआ तो उन्होंने सबसे पहले अपने खेतों में पानी की समस्या को दूर किया। उन्होंने ट्यूबवेल लगवाया ताकि वह बड़े स्तर पर खेती कर पाएं। पानी होने के बाद, उन्होंने अपनी बाकी बची ज़मीन पर अच्छे से खेती शुरू की। अपनी उपज को जैविक और प्राकृतिक रखने के लिए उन्होंने खेती के साथ-साथ पशुपालन भी किया। उन्हें घर के दूध-घी के साथ-साथ शुद्ध गोबर और गौमूत्र भी मिला। इससे वह खाद और अन्य जैविक पेस्टीसाइड तैयार करते हैं।

कान सिंह कहते हैं कि वह अपने खेत में मशीन का प्रयोग बहुत कम करते हैं। उन्होंने अपने खेत में एक ही तरह की फसल लगाने की बजाय अलग-अलग कई फसलें लगाईं। साथ ही, उन्होंने अनाज के साथ-साथ सब्जियों और फलों की भी खेती पर ध्यान दिया। अपनी उपज को बिचौलियों के ज़रिए बेचने की बजाय खुद इसकी मार्केटिंग की।

Natural Farming and processing he is doing

उन्हें अपने मेहमानों में ही ग्राहक मिलने लगे जो उन्हें उनकी मेहनत का सही मूल्य देते। देखते ही देखते, उन्होंने अपनी खेती को 7 एकड़ से 30-32 एकड़ में कर लिया ,बाकी ज़मीन उन्होंने लीज पर ले ली। आज वह 25 तरह के फलों के पेड़ जैसे पपीता, अनार, चीकू, बेल पत्र, जामुन, लेसवा, अमरुद, शहजन, आम, और बेर आदि का अच्छा उत्पादन ले रहे हैं। इसके अलावा, चना, सरसों, 4-5 तरह की दालें, धान, गेंहू जैसी फसलें भी प्राकृतिक तरीकों से उगा रहे हैं। मौसमी सब्जियों के साथ-साथ वह औषधीय पौधों की भी खेती करते हैं।

आज उनके खेतों से गाँव के बहुत से लोगों को रोज़गार भी मिला हुआ है। भले ही उनके यहाँ अब मजदूर हैं लेकिन इसके बावजूद वे खेत में खुद भी मेहनत करते हैं।

तीन साल पहले उन्होंने अपनी खुद की प्रोसेसिंग यूनिट भी शुरू की है। यहाँ से वे खुद घी, तेल, मसाले और आटा आदि तैयार करते हैं और ग्राहकों तक पहुंचाते हैं। अपनी लागत और सालाना कमाई के बारे में पूछने पर कान सिंह कहते हैं, “कभी हिसाब नहीं जोड़ा। बस यह पता है कि हमारा कोई काम नहीं रूका है। बच्चों की अच्छी पढ़ाई हुई। बेटा अंतर्राष्ट्रीय घुड़सवार है तो बेटी होमस्टे संभाल रही है।“

Training for farmers

सीखने की चाह में पार की हर चुनौती:

कान सिंह कहते हैं कि उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाने वाली उनकी पत्नी हैं। यह सुशीला ही थी जिन्होंने उन्हें हमेशा हौसला दिया और खुद उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। अगर सुशीला चाहती तो बिना कोई मेहनत किए शहर में रह सकती थी लेकिन उन्होंने मेहनत से अपनी पहचान बनाई।

इस बारे में सुशीला कहतीं हैं, “भले ही हर कदम पर परेशानी थी लेकिन घर में बैठकर परेशानी को हम दूर नहीं कर सकते हैं। अगर कल को बेहतर करना है तो आज खुद को संघर्ष में झोंकना ही होगा। मैं जिस जगह और जिस संस्कृति से आती हूँ वहां महिलाओं पर बहुत से पहरे हैं। हमारे समाज की महिलाएं खुद बाहर निकलकर इतना सब कुछ करने की हिम्मत नहीं करतीं। लेकिन मैंने की क्योंकि मुझे अपनी पहचान बनानी थी और अपने पुरखों की ज़मीन को यूँ ही बंजर नहीं होने देना था।”

Organic Tourism with Farming

मात्र 9वीं तक पढ़ी सुशीला ने अपने पति का साथ देने के लिए न सिर्फ खेती बल्कि आधुनिक समय की मांग के अनुसार दूसरे हुनर भी सीखे। आज वह ट्रेक्टर, सफारी चलाने के साथ-साथ घुड़सवारी भी करती हैं। अपनी पत्नी और बेटे के घोड़ों के लिए प्रेम को देखकर, कान सिंह ने अपने यहाँ घुड़सवारी भी शुरू की। आज उनके पास लगभग 35 घोड़े-घोड़ियाँ हैं। इसके अलावा, सुशीला अपनी पढ़ाई भी पूरी करने की चाह रखती हैं। उन्होंने अपने सबसे छोटे बेटे के साथ दसवीं की परीक्षा पास की और अब 12वीं के फॉर्म भरे हैं। इसके बाद वह कॉलेज भी करेंगी।

“मुझे हर कदम पर सीखना अच्छा लगता है। अगर मैं अपने समाज की बाकी औरतों की तरह शर्म में घर के अंदर ही बैठी रहती तो कभी यह ज़िंदगी नहीं जी पाती। मैंने हिम्मत की और अपनी ज़िंदगी को अपने मन-मुताबिक जीने की राह बनाई। आज भी मैं कुछ न कुछ नया करते रहने में विश्वास करती हूँ,” उन्होंने कहा।

यह भी पढ़ें: IIT से पढ़े इस शख्स ने खड़ा किया जैविक खेती और प्रोसेसिंग का सफल मॉडल!

कान सिंह और सुशीला, देश के हर किसान परिवार के लिए एक प्रेरणा हैं, जो अपने खेत को अपना जीवन मानते हैं और अपनी माटी के लिए कुछ अलग करना चाहते हैं। उनसे संपर्क करने के लिए 86193 00046 पर मैसेज करें!

तस्वीर साभार: कान सिंह


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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