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गुरुग्राम से बिहार तक: आठ दिन तक साइकिल चलाकर, 15 साल की बेटी मजबूर पिता को ले आई घर!

गुरुग्राम से बिहार तक: आठ दिन तक साइकिल चलाकर, 15 साल की बेटी मजबूर पिता को ले आई घर!

“सबको देखके हिम्मत आ गयी… गरीब हैं…पैसा नहीं था …..क्या करते बताईये?”

बहुत चाव से उसने साइकिल चलाना सीखा था। पर कभी अपनी साइकिल नहीं मिली चलाने को। और फिर जब मिली तो उसे एक हज़ार किलोमीटर तक इसे चलाते रहना पड़ा। न चलाती तो अपने बीमार पिता को घर कैसे पहुंचाती?

ये कोई कहानी नहीं बल्कि हकीकत है। बिहार के दरभंगा जिले के सिरुहुलिया (Siruhulia) गाँव की रहने वाली 15 वर्षीय ज्योति कुमारी पासवान की हकीकत। ज्योति अपने पिता को साइकिल के पीछे बिठाकर हरियाणा के गुरुग्राम से बिहार के दरभंगा तक अपने घर ले आई। पर आखिर ऐसा क्या हुआ था कि ज्योति को आठ दिन तक साइकिल चलाकर अपने घर आना पड़ा? आईये जानते हैं ज्योति की कहानी –

2018 तक –

ज्योति के पिता मोहन पासवान की गाँव में एक छोटी सी समोसे की दूकान थी, जिससे मुश्किल से दिन के 100-150 रूपये की कमाई होती थी। माँ आंगनवाड़ी में खाना बनाने का काम करती, जहाँ महीने के महज़ 1500 रूपये मिलते। बड़ी बहन की शादी हो चुकी थी और घर पर तीन और भाई-बहन भी थे। कई सालों तक घिसते-पिटते अपना संसार किसी तरह चलाते हुए ज्योति के पिता मोहन थक चुके थे। ऐसे में गाँव के ही कुछ युवकों की देखा-देखी उन्होंने गुरुग्राम जाकर कोई काम करने का फैसला किया।

2019 –

2019 में गुरुग्राम पहुंचकर मोहन ने एक ई-रिक्शा किराए पर ली और इसे चलाने लगे। इससे उनकी महीने में 10-12 हज़ार की कमाई हो जाती थी। ई-रिक्शा का किराया रु. 500 प्रति माह था और घर का किराया रु. 1500 था। हज़ार-दो हज़ार रूपये मोहन के खाने-पीने में लग जाते, पर बाकी पैसे वह घर भेज पाते थे। उनकी अच्छी कटने लगी। घर पर भी सब खुश थे। दो वक़्त की रोटी के अलावा इस परिवार को और चाहिए भी क्या था!

पर किस्मत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था।

2020 –

26 जनवरी 2020 की रात को मोहन अपनी रिक्शा में घर वापस लौट ही रहे थे कि किसीने उन्हें ज़ोर से टक्कर मार दी। इस दुर्घटना में उनके बाएं पैर का घुटना बुरी तरह ज़ख्मी हो गया और उनका ऑपरेशन करना पड़ा। जब खबर घरवालों तक पहुंची तो ज्योति के जीजा तुरंत ज्योति और उसकी माँ को साथ लिए गुरुग्राम पहुँच गए। इस परिवार ने अब तक जो कुछ भी बचाया था वह मोहन के इलाज में खर्च हो गया। खर्चा बचाने के लिए ज्योति के जीजा और उसकी माँ घर वापस चले गए। अपने पिता की देखभाल करने के लिए ज्योति उनके पास ही रह गयी। मोहन ने सोचा था कि महीने भर में ठीक होते ही वह रिक्शा चलाकर घर का और रिक्शे का किराया चुका देंगे, लेकिन इससे पहले कि ये हो पाता, लॉकडाउन शुरू हो गया।

अब मोहन के पास किराया देने के भी पैसे नहीं थे।

लॉकडाउन के बाद 

“रिक्शा तो गयी ही, मकान मालिक भी घर खाली करने के लिए रोज़ धमकाने लगा था। हमने घर वापस जाने के लिए ट्रेन का रजिस्ट्रेशन भी करवाया पर उसमें हमारा नंबर 6 लाख से भी आगे था। इसका मतलब ट्रेन से घर जाने में हमें 6 महीने और लग जाते। मैं चिंता में पड़ गया कि अब मैं अपनी बेटी को लेकर कहाँ जाऊंगा? क्या खाऊंगा?” मोहन ने द बेटर इंडिया को फ़ोन पर बताया।

अपने पिता को परेशान देखकर ज्योति को अपने अकाउंट की याद आयी, जिसमें प्रधानमंत्री जन-धन योजना से आये हुए कुछ पैसे थे। ज्योति ने अपने पिता से इन पैसों से एक सेकंड हैंड साइकिल खरीदने को कहा। उसने कहा कि वह अपने पिता को खुद साइकिल पर बिठाकर गाँव ले जाएगी।

शुरू में तो मोहन इस बात से बिलकुल सहमत नहीं हुआ। पर बेटी की हिम्मत और ज़िद के आगे उसने घुटने टेक दिए। दरअसल उसके पास और कोई चारा भी तो नहीं था!

7 अप्रैल 2020 को 1600 रूपये में एक साइकिल खरीदकर और हाथ में सिर्फ 300 रूपये लेकर ज्योति अपने पिता को पीछे बिठाये गुरुग्राम से निकल पड़ी।

“रास्ते में जगह-जगह पर लोग खाना बाँट रहे थे। हम वही खा लेते। ज्योति थक जाती तो वहीं बैठ जाते और फिर चल देते। और आखिर 15 अप्रैल को रात के 8-9 बजे के करीब मेरी बेटी मुझे अपने गाँव तक ले आयी,” मोहन कहते हैं।

सिरुहुलिया पहुँचने पर मोहन को यहाँ के स्थानीय स्कूल में बने क्वारंटीन सेंटर में ले जाया गया। चूँकि इस सेंटर में और कोई महिला नहीं थी, इसलिए ज्योति को होम क्वारंटीन में रखा गया।

ज्योति और उसके पिता अब स्वस्थ हैं और रास्ते में मिले उन सभी लोगों के शुक्रगुज़ार हैं, जिन्होंने उन्हें खाने-पीने को दिया। ज्योति से मिलने आने वालों का तांता लगा हुआ है। आज अपने गाँव में वह किसी सेलेब्रिटी से कम नहीं।

जब हमने ज्योति से पूछा कि कैसे आई उनमें इतनी हिम्मत, कैसे कर दिखाया उन्होंने यह?

तो उन्होंने इस सवाल का जवाब भी एक सवाल से दिया,
“सबको देखके हिम्मत आ गयी… गरीब हैं…पैसा नहीं था …..क्या करते बताईये?”

पिता-बेटी का यह हिम्मती जोड़ा घर पहुँचने पर खुश तो है, लेकिन आगे अपने परिवार का भरण-पोषण वह कैसे करेंगे, यह आज भी उनके लिए एक बड़ा सवाल है। आप चाहे तो अगले कुछ महीनों के राशन के लिए उनकी मदद कर सकते हैं।

नीचे दिए गए ज्योति के अकाउंट में आप अपनी मदद की रकम भेज सकते हैं। पैसे ट्रांसफर करते हुए द बेटर इंडिया का नाम ज़रूर लिखें, ताकि हम आपका आभार व्यक्त कर सकें –

Name – Jyoti Kumari
Account Number – 36440737966
IFSC Code – SBIN0015580

ज्योति और मोहन जैसे लाखों प्रवासी मज़दूरों की मदद करने के लिए द बेटर इंडिया की मुहिम #BetterTogether से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

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फीचर्ड इमेज साभार – EPS

मानबी कटोच

मानबी बच्चर कटोच एक पूर्व अभियंता है तथा विप्रो और फ्रांकफिंन जैसी कंपनियो के साथ काम कर चुकी है. मानबी को बचपन से ही लिखने का शौक था और अब ये शौक ही उनका जीवन बन गया है. मानबी के निजी ब्लॉग्स पढ़ने के लिए उन्हे ट्विटर पर फॉलो करे @manabi5
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