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छत्तीसगढ़ के आईएएस की पहल, 3 लाख श्रमिकों तक पहुंचाई मदद

इस महामारी में सोनमणि बोरा की प्रशासनिक कुशलता और मानवीय चेहरा एक बड़ा उदाहरण है, न केवल युवा अधिकारियों के लिए बल्कि हम सभी के लिए।

कोरोना महामारी की वजह से आज पूरा विश्व थम सा गया है। चाहे यातायात हो या पर्यटन या फिर निर्माण क्षेत्र, हर जगह इस महामारी का प्रभाव दिख रहा है। इन सभी सेक्टर में प्रमुख भूमिका निभाते हैं श्रमिक और यही वर्ग सबसे अधिक प्रभावित है। इस विषम परिस्थिति में श्रमिकों की हरसंभव मदद करने की जरुरत है।

लॉकडाउन के समय से अभी तक छत्तीसगढ़ का श्रम विभाग लगभग 3 लाख ज़रुरतमंदों तक मदद पहुंचा चुका है, जिसमें दूसरे प्रदेश से आए श्रमिक भी हैं और छत्तीसगढ़ के भी हैं जो अन्य राज्यों में फंसे हैं। ऐसा भी नहीं है कि विभाग केवल मजदूरों तक ही सहायता पहुंचा रहा है ट्विटर से, हेल्पलाइन नम्बर से या अन्य जिन भी माध्यमों से जानकारी मिल रही है, उन्हें तत्काल संज्ञान में लेकर मदद पहुंचाने का काम किया जा रहा है।

1999 बैच के आईएएस सोनमणि बोरा वर्तमान में सचिव राजभवन, सचिव श्रमिकों को प्रदेश में वापस लाने की मुहिम के नोडल अधिकारी हैं। बोरा कहते हैं कॉल, व्हाट्सप्प, मैसेज, ट्विटर, हेल्पलाइन नंबर के माध्यम से कई संवेदनशील मामले सामने आते हैं जिनपर तत्काल कार्यवाही आवश्यक होती है। श्रमिकों की समस्याएं सुनना, दूसरे राज्यों के अधिकारियों से कोऑर्डिनेट करना, कलेक्टरों  से बात कर अपडेट लेना, वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के माध्यम से प्रदेश की स्थिति समझना और बैठकों में हिस्सा लेना ही अब दिनचर्या बन गया है।

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31,000 मज़दूरों को दिलवाया 37 करोड़ का भुगतान।


देश में अचानक हुए लॉकडाउन की वजह से कई ठेकदारों, फैक्ट्रियों ने अपने श्रमिकों का बकाया भुगतान नहीं किया था। जिसकी जानकारी छत्तीसगढ़ के श्रम विभाग को मिली और विभाग के सचिव सोनमणि बोरा के आदेश पर विभाग ने ठेकेदारों से, फैक्ट्री प्रबंधन से बात कर, राज्य के 31,000 मज़दूरों को 37 करोड़ का भुगतान करवाया है। लॉकडाउन के समय इन मजदूरों को  उनका मेहनताना मिलने से आनेवाले दिनों में बड़ी राहत मिलेगी।


पीलिया से पीड़ित सुखमती का गुरुग्राम में करवाया इलाज

भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी सोनमणि बोरा को छत्तीसगढ़ के 24 मजदूरों के गुरुग्राम में फंसे होने की जानकारी मिली थी। उन्हें राशन की समस्या थी साथ ही एक महिला श्रमिक सुखमती को पीलिया भी हो गया था। इस विपरीत समय में एक तो घर से दूर रहना और फिर पीलिया जैसी बीमारी।

बोरा ने द बेटर इंडिया को बताया, सबसे पहले उनके लिए राशन की व्यवस्था की गई और इसके बाद दिल्ली में हेल्थ टीम के माध्यम से सुखमती का इलाज करवाया गया और अब सुखमती को उसके बेहतर देखरेख और इलाज के लिए एम्बुलेंस के माध्यम से छत्तीसगढ़ वापस ला लिया गया है। आने वाले समय में सुखमती का बेहतर उपचार  हो सके इसके लिए आर्थिक सहायता भी कर दी गई है।

श्रम विभाग हर ऐसे मामलों में कोशिश कर रहा है कि ज़रूरतमंद की समस्या को संज्ञान में लेकर जल्द से जल्द उन तक राहत पहुंचाई जाए।



बहन की मृत्यु और दिव्यांग पति की देखभाल के लिए नूरी को पहुंचाया घर

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Noori reached home


एक अन्य मामले में बिलासपुर के रैन बसेरा में भिलाई की एक महिला एक महीने से रहती थी। उनके घर में दिव्यांग पति, बहन और बच्चे हैं। एक दिन नूरी को पता चला कि छोटी बहन का देहांत हो गया है। बहन के निधन का गम, छोटी बेटी, दिव्यांग पति की चिंता और लॉकडाउन में अपने घर वापस न जा पाने के कारण नूरी असहाय महसूस कर रही थी। यह मामला जैसे ही ट्विटर के माध्यम से पता चला तो विभाग ने तत्काल नूरी के स्वास्थ्य की जांच करने के बाद उसे प्राइवेट गाड़ी में घर भेजने का प्रबंध कर दिया। श्रम विभाग के द्वारा उन्हें ज़रुरत की सारी चीज़ें  मुहैया करवा दी गई और उन्हें घर तक छोड़ा गया है।

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इस घटना के बारे में बोरा कहते हैं, नूरी के मामले ने हम सबको झकझोर कर रख दिया था। हमने इस मामले में सरकारी आदेशों का पालन करते हुए यह सुनिश्चित किया कि किसी भी प्रकार के पेपर वर्क के कारण नूरी को घर पहुंचने में विलंब न हो। ऐसी अनेक चुनौतियां सामने आ रही हैं, पर विभाग और हमारी टीम लगभग हर मामले में तत्काल संज्ञान में लेकर कार्यवाही कर रही है।”

 


मनरेगा के माध्यम से पहुंच रही है राहत।

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लॉकडाउन में छत्तीसगढ़ में लगभग 19 लाख लोगों को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत रोजगार मिला है। यह संख्या देशभर में इस वक्त मनरेगा में लगे कुल मजदूरों का करीब 24 फीसदी है। देश में बहुत कम प्रतिशत ऐसे लोग हैं जो साल भर काम नहीं करेंगे तब भी उनके जीवन में संसाधनों की कमी नहीं होगी लेकिन मनरेगा के माध्यम से उनको आर्थिक रूप से मजबूत किया जो रोज़ कमाते और रोज़ खाते हैं।

बोरा कहते है, “हमारी पूरी कोशिश है कि ज़्यादा से ज़्यादा श्रमिकों को काम मिले ताकि वो सभी आर्थिक रूप से मजबूत हो और इस संकटकाल में भी उन्हें जरुरत की सामग्री उपलब्ध हो जाए।”

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श्रमिकों को खाना परोसते हुए

 
बोरा ने बताया, “लॉकडाउन 1.0 ने मजदूरों में एक घबराहट पैदा कर दी थी, जिसका परिणाम हमने देखा जब देश भर से सैकड़ों किमी पैदल चलते हुए मज़दूरों के फ़ोटो-वीडियो आने लगे। हमने सबसे पहले मजदूरों की कॉउंसलिंग करना प्रारम्भ किया, उन्हें समझाया गया और फ़िर उनतक मदद पहुंचाने कार्यवाही की गई। हेल्पलाइन नम्बर हमने पब्लिक किया और हमारा ध्येय यही था कि कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए। रैपिड एक्शन टीम का गठन हुआ जो गाड़ियों में सूखा राशन एवं पका भोजन दोनों लेकर घूम रही है और जहां जब जैसी ज़रूरत हो राहत पहुंचा रही है।”


इस महामारी में सोनमणि बोरा की प्रशासनिक कुशलता और मानवीय चेहरा एक बड़ा उदाहरण है, न केवल युवा अधिकारियों के लिए बल्कि हम सभी के लिए। सकारात्मक ऊर्जा और इच्छाशक्ति हो तो लाखों लोगों तक मदद पहुंचा भी जा सकता है। छत्तीसगढ़ के श्रम विभाग ने इस कठिन परिस्थिति में इसे साबित कर दिया है।

राहत कार्यों में लगे सभी लोग चाहे सरकारी कर्मचारी हो या सामाजिक कार्यकर्ता, पुलिसकर्मी हो या स्वास्थ्यकर्मी सभी की सबसे बड़ी चुनौती है जरूरतमंदों तक राहत पहुंचाने की और उससे बड़ी चुनौती है इस सब के बीच खुद को सुरक्षित रखना। ऐसे प्रतिकूल समय में भी तमाम चुनौतियों को पछाड़ कर ये सभी सिपाही इस युद्ध में डटे हुए हैं। अपने कार्यों के प्रति समर्पित आईएएस सोनमणि बोरा सहित श्रम विभाग और कोरोना से लड़ रहे सभी वारियर्स को द बेटर इंडिया सलाम करता है।

(द बेटर इंडिया हिंदी के लिए जिनेन्द्र पारख और हर्ष दुबे की रिपोर्ट)

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